भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

१२६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अपि च सङ्करालङ्कारेऽपि च क्वचित् सङ्करोक्तिरेव ध्वनि- सम्भावनां निराकरोति । दूसरे यह कि सर्वत्र 'सङ्करालङ्कार' में ( कहीं भी सङ्करालङ्कार में ) 'सङ्कर' यह कथन ही ध्वनि की सम्भावना का निराकरण कर देता है । लोचनम् लङ्कार एवायं न भवति, अपि त्वलङ्कारध्वनिनामायं ध्वनेर्द्वितीयो भेदः । यच्च 'पर्यायोक्ते निरूपितं तत्सर्वमत्राप्यनुसरणीयम् । अथ सर्वेषु सङ्करप्रभेदेषु व्यङ्ग्य- सम्भावनानरासप्रकारं साधारणमाह—अपि चेति । 'क्वचिदपि सङ्करालङ्कारे चे'ति सम्बन्धः, सर्वभेदभिन्न इत्यर्थः । सङ्कीर्णता हि मिश्रत्वं लोलीभावः, तत्र कथमेकस्य प्राधान्यं क्षीरजलवत् । अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः । अप्रस्तुतप्रशंसा सा त्रिविधा परिकीर्त्तिता ॥ 'अपह्नुति' व्यङ्ग्य रूप से प्रधानतया मालूम पड़ते हैं, इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—यदि कहिए कि— । उस सम्बन्ध में उत्तर है—तब वह भी— । सङ्करालङ्कार ही यह नहीं है, अपितु अलङ्कार-ध्वनि नाम का यह 'ध्वनि' का दूसरा भेद है । और पर्यायोक्त के प्रसङ्ग में जो निरूपण किया है वह सब यहाँ अनुसरणीय है । अब, 'सङ्कर' के समस्त प्रभेदों में व्यङ्ग्य की सम्भावना के साधारण निरास का प्रकार कहते हैं—'कहीं भी सङ्करालङ्कार में' यह वाक्य का सम्बन्ध है, अर्थात् सब भेदों से भिन्न ( सङ्कर के किसी भेद में ) । क्योंकि सङ्कीर्णता अर्थात् मिश्रित होना, लोलीभाव ( बिल्कुल एक में मिलकर एकाकार हो जाना ) है । वहाँ क्षीर और जल की भाँति एक ही प्रधानता कैसे होगी ? 'अधिकार ( प्रस्तुतत्व ) से रहित ( अप्रस्तुत ) अन्य वस्तु की जो स्तुति ( कथन या वर्णन ) होती है उसे 'अप्रस्तुत' प्रशंसा' कहते हैं, वह तीन प्रकार की कही जाती है ।' यहाँ प्रसिद्धि के पक्षपाती खलजनों का गुणों में अनुराग नहीं होता इस सामान्य अर्थ का समर्थन 'चन्द्रकान्त चन्द्र के दिखने पर पिघलता है, प्रियामुख के नहीं' इस विशेष अर्थ द्वारा समर्थन अभिहित हुआ है । इससे 'प्रियामुख चन्द्र से भी ज्यादा सुन्दर है' यह 'व्यतिरेक' तथा यह चन्द्र नहीं है प्रियामुख ही चन्द्र है यह 'अपह्नुति' व्यंग्य प्राधान्यतः प्रतीत होता है । १. अप्रस्तुत प्रशंसा अर्थात् अप्रस्तुत से प्रस्तुत का आक्षेप । तात्पर्य यह कि अप्रस्तुत अभिधीय- मान होता है और प्रस्तुत प्रतीयमान । किन्तु इतने से 'ध्वनि' का प्रसंग उपस्थित नहीं होता, बल्कि अभिधीयमान से प्रतीयमान में अधिक चारुत्व होना चाहिए, तत्प्रयुक्त प्राधान्य होना चाहिए । अप्रस्तुत प्रशंसा के तीन भेद हैं—सामान्यविशेषभावमूलक, कार्यकारणभावमूलक ( निमित्तनिमित्तिभावमूलक ) और सादृश्यमूलक । पहले दो भेदों के दो-दो रूप हैं—अप्रस्तुत सामान्य से प्रस्तुत विशेष का आक्षेप और अप्रस्तुत विशेष से प्रस्तुत सामान्य का आक्षेप तथा अप्रस्तुत कारण से प्रस्तुत कार्य का आक्षेप और अप्रस्तुत कार्य से प्रस्तुत कारण का आक्षेप । ये चार

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 186, कुल 680 में से · BharatKosha