भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 680 में से

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पृष्ठ 187

प्रथम उद्योतः १२७ ध्वन्यालोकः अप्रस्तुतप्रशंसायामपि यदा सामान्यविशेषभावान्निमित्तनिमित्ति- भावाद्वा अभिधीयमानस्याप्रस्तुतस्य प्रतीयमानेन प्रस्तुतेनाभिसम्बन्ध- स्तदाभिधीयमानप्रतीयमानयोः सममेव प्राधान्यम् । 'अप्रस्तुतप्रशंसा' में भी जब सामान्य विशेष भाव से अथवा निमित्त-निमित्तिभाव से अभिधीयमान अप्रस्तुत का प्रतीयमान प्रस्तुत से सम्बन्ध होता है तब अभिधीय- मान और प्रतीयमान का प्राधान्य सम ( बराबर ) ही होता है । लोचनम् अप्रस्तुतस्य वर्णनं प्रस्तुताक्षेपिण इत्यर्थः । स चाक्षेपस्त्रिविधो भवति— सामान्यविशेषभावात्, निमित्तनिमित्तिभावात्, सारूप्याच्च । तत्र प्रथमे प्रकार- द्वये प्रस्तुताप्रस्तुतयोस्तुल्यमेव प्राधान्यमिति प्रतिज्ञां करोति-अप्रस्तुतेत्यादिना प्राधान्यमित्यन्तेन । तत्र सामान्यविशेषभावेऽपि द्वयी गतिः—सामान्यमप्राकर- णिकं शब्देनोच्यते, गम्यते तु प्राकरणिको विशेषः स एकः प्रकारः । यथा— अहो संसारनैर्घृण्यमहो दौरात्म्यमापदाम् । अहो निसर्गजिह्मस्य दुरन्ता गतयो विधेः ॥ अत्र हि दैवप्राधान्यं सर्वत्र सामान्यरूपमप्रस्तुतं वर्णितं सत्प्रकृते वस्तुनि क्वापि विनष्टे विशेषात्मनि पर्यवस्यति । तत्रापि विशेषांशस्य सामान्येन व्याप्त- अर्थात् प्रस्तुत का आक्षेप करने वाले अप्रस्तुत का वर्णन । वह 'आक्षेप' तीन प्रकार का होता है—सामान्यविशेषभाव से, निमित्तनिमित्तिभाव से और सारूप्य से । उनमें प्रथम दो प्रकारों में प्रस्तुत और अप्रस्तुत का प्राधान्य तुल्य ( बराबर ) ही है, यह प्रतिज्ञा करते हैं—अप्रस्तुत से लेकर प्राधान्य—इस अन्त तक । उनमें, सामान्य- विशेषभाव में भी दो अवस्थाएं हैं—जहाँ सामान्य अप्राकरणिक है और शब्द से कहा जाता है, तथा विशेष प्राकरणिक है और व्यञ्जित होता है, वह एक प्रकार है । जैसे— 'उफ, संसार की यह कितनी कठोरता है, उफ, आपत्तियों की यह कितनी क्रूरता है, उफ, स्वभावतः कुटिल दैव की गतियों का पार पाना कितना कठिन है !' यहाँ दैव ( विधाता ) का प्राधान्य सामान्यरूप अप्रस्तुत कहा जाता हुआ किसी प्रकृत विनष्ट वस्तु के विशेष रूप में पर्यवसन्न होता है । वहाँ भी विशेष अंश के सामान्य से व्याप्त होने के कारण व्यङ्ग्य विशेष की भाँति वाच्य सामान्य का भी भेद तथा एक सादृश्यमूलक भेद मिलकर अप्रस्तुतप्रशंसा पाँच प्रकार की होती है । सादृश्यमूलक के भी तीन प्रभेद किए गए हैं—श्लेषनिमित्तक, समासोक्तिनिमित्तक एवं सादृश्यमात्रनिमित्तक । इनमें सादृश्यमूलक भेद को छोड़कर अन्य चार भेदों में अप्रस्तुत (वाच्य) और प्रस्तुत (प्रतीयमान) दोनों सम-प्राधान्य होते हैं । इसलिए उनमें ध्वनि का अवसर ही नहीं । किन्तु सादृश्यमूलक भेद में जब अभिधीयमान अप्रस्तुत का अप्राधान्य और प्रतीयमान प्रस्तुत का प्राधान्य विवक्षित होगा तब अलङ्कारध्वनि का प्रसंग होगा और यदि विवक्षित नहीं होगा तब केवल अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार होगा ।