भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यदा तावत्सामान्यस्याप्रस्तुतस्याभिधीयमानस्य प्राकरणिकेन विशेषेण प्रतीयमानेन सम्बन्धस्तदा विशेषप्रतीतौ सत्यामपि प्राधान्येन तत्सामान्येनाविनाभावात्सामान्यस्यापि प्राधान्यम् । यदापि विशेषस्य सामान्यनिष्ठत्वं तदापि सामान्यस्य प्राधान्ये सामान्ये सर्वविशेषाणा- मन्तर्भावाद्विशेषस्यापि प्राधान्यम् । और जब सामान्य अप्रस्तुत अभिधीयमान का प्राकरणिक विशेष प्रतीयमान के साथ सम्बन्ध होगा तब प्राधान्यतः विशेष की प्रतीति होने पर भी उसका सामान्य से अविनाभाव (व्याप्ति) होने के कारण सामान्य का भी प्राधान्य होगा । जब कि विशेष सामान्यनिष्ठ होगा तब भी सामान्य के प्राधान्य होने पर समस्त विशेषों का (सामान्य में) अन्तर्भाव होने के कारण विशेष का भी प्राधान्य होगा । लोचनम् त्वाद्द्व्यङ्ग्यविशेषवद्वाच्यसामान्यस्यापि प्राधान्यम् , न हि सामान्यविशेषयो- र्युगपत्प्राधान्यं विरुध्यते । यदा तु विशेषोऽप्राकरणिकः प्राकरणिकं सामान्य- माक्षिपति तदा द्वितीयः प्रकारः । यथा— एतत्तस्य मुखात्कियत्कमलिनीपत्रे कणं पाथसो यन्मुक्तामणिरित्यमंस्त स जडः शृण्वन्यदस्मादपि । अङ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रविलयिन्यादीयमाने शनै- स्तत्रोड्डीय गतो हहेत्यनुदिनं निद्राति नान्तः शुचा ॥ अत्रास्थाने महत्त्वसम्भावनं सामान्यं प्रस्तुतम् , अप्रस्तुतं तु जलबिन्दौ मणित्वसम्भावनं विशेषरूपं वाच्यम् । तत्रापि सामान्यविशेषयोर्युगपत्प्राधान्ये न विरोध इत्युक्तम् । एवमेकः प्रकारो द्विभेदोऽपि विचारितः, यदा तावदित्या- प्राधान्य है । न कि सामान्य और विशेष में एक काल में प्राधान्य विरुद्ध है । जब कि विशेष अप्राकरणिक प्राकरणिक सामान्य का आक्षेप करता है तब दूसरा प्रकार है । जैसे— (किसी मूर्ख के वृत्तान्त को कहीं से सुनकर विस्मय से कहते हुए किसी के प्रति किसी का वचन— ) 'उसके मुख से यही कितना सुना ! जो कि उस मूर्ख ने कमलिनी के पत्ते पर स्थित जलकण को मोती समझ लिया । इससे भी ज्यादा और सुनो । जब वह जलकण को मोती समझकर उठाने लगा तब उंगली के स्पर्श होते ही शनैः उस जलकण के विलीन हो जाने पर 'हाय ! हाय ! उड़कर चला गया !' इस अन्तःशोक से वह कई दिनों से नहीं सोता है !' यहाँ अस्थान (बेजगह) में महत्त्व का सम्भावन रूप सामान्य प्रस्तुत है और अप्रस्तुत जलबिन्दु में मणित्व का सम्भावन विशेष रूप वाच्य (या अभिधीयमान) है ।