भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( १५ ) प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रह्णानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ वाक्यपदीय, १।८४ इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ के व्यञ्जक शब्द-अर्थ भी प्रस्तुत काव्य-सिद्धान्त में ‘ध्वनि’ शब्द से अभिहित हैं । फिर ऐसा होता है कि वर्णों के परिमित होने से अल्पतर यत्न से उच्चारित शब्द को जब बुद्धि नहीं ग्रहण कर पाती, उस स्थिति में वक्ता का जो प्रसिद्ध उच्चारण-व्यापार से अधिक द्रुत, विलम्बित आदि वृत्तियों का भेदरूप व्यापार है उसे भी ध्वनि कहते हैं— शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे तु वैकृताः । ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ वाक्यपदीय, १।७८ कहा जा चुका है कि ये वृत्तियां वैकृत ध्वनि में होती हैं और उच्चारण-व्यापार से ये अतिरिक्त व्यापार हैं । इसी आधार पर प्रस्तुत में ध्वनिकार ने प्रसिद्ध अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा व्यापारों से अतिरिक्त व्यञ्जना व्यापार को भी ‘ध्वनि’ कहा है । और व्यङ्ग्य अर्थ, व्यञ्जक शब्द और अर्थ, व्यञ्जना-व्यापार ये चार ध्वनि हैं तो इनके योग से समुदायरूप काव्य भी ‘ध्वनि’ पदवाच्य होता है । वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर ध्वनिकार ने स्वयं वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ का अन्तर स्पष्ट करते हुए जिन भेदों का निर्देश किया है वे क्रमशः इस प्रकार हैं— स्वरूपभेद—इसके कारण जो वाच्य और व्यङ्ग्य का भेद है वह यह है कि कहीं वाच्य विधिरूप है तो व्यङ्ग्य निषेधरूप ( उदाहरण, पृ० ५२ ) ; कहीं वाच्य प्रतिषेधरूप है तो व्यङ्ग्य विधिरूप ( पृ० ७१ ) इत्यादि । विधि और प्रतिषेध के भिन्न होने में किसको संशय हो सकता है ? विषयभेद—वाच्य अर्थ का विषय एक व्यक्ति होता है तो व्यङ्ग्य अर्थ का विषय उससे भिन्न व्यक्ति ( उदा० पृ० ७६ ) । भिन्नसामग्रीवेद्यत्व ( निमित्तभेद )—वाच्य अर्थ को शब्द-अर्थ के नियमों के ज्ञानमात्र से, कोश-व्याकरणादि के परिचय रखने मात्र से प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है और व्यङ्ग्यार्थ को काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ ही, अर्थात् सहृदयजन ही जान सकते हैं । इनके अतिरिक्त ‘काव्यप्रकाश’ के पञ्चम उल्लास में आचार्य मम्मट ने अनेक कारणों का इस सन्दर्भ में निर्देश किया है, जैसे— संख्याभेद—वाच्य सभी व्यक्तियों के प्रति एकरूप होने से नियत है । किन्तु व्यङ्ग्य अर्थ नानाविध होता है, अतः अनियत है । कालभेद—पहले वाच्य अर्थ अवगत होता है पश्चात् व्यङ्ग्य अर्थ । आश्रय—वाच्य शब्द पर आश्रित है, व्यङ्ग्य शब्द, शब्द के एकदेश, उसके अर्थ, वर्ण, संघटना पर आश्रित है ।