ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) कार्यभेद—वाच्य का कार्य प्रतीतिमात्र होता है और व्यङ्ग्य का कार्य चमत्कृति है । इन सभी पार्थक्य के हेतुओं को एक कारिका में साहित्य-दर्पणकार ने संगृहीत कर दिया है— बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालनाम् । आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥ यहाँ तक हम ध्वन्यालोक के मुख्य प्रतिपाद्य ध्वनि तत्त्व से सम्बद्ध अनेक तथ्यों से अवगत हो गए । साथ ही ध्वनि, जो स्वरूपतः काव्य में प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य की स्थिति में माना जाता है, हमने यह भी देखा, कि वह केवल वाच्य की कक्ष्या से आगे नहीं, वरन्, तात्पर्य, लक्ष्य की कक्ष्याओं से भी आगे चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाले व्यङ्ग्य अर्थ में सम्पन्न होता है । लोचन में बड़े विस्तार से व्यङ्ग्य अर्थ की चतुर्थकक्ष्याविविष्टता पर आचार्य अभिनवगुप्त ने विचार किया है । व्यङ्ग्य अर्थ के विरोध में उपस्थित तात्पर्यवृत्ति, लक्षणा, अभिहितान्वयवादी, अन्विताभिधानवादी और भट्टनायक के मत का खण्डन तर्कपूर्ण ढंग से किया है ( पृ० ५४-७० ) । हम ऊपर निर्देश कर चुके हैं कि ध्वनिकार ने रस को अलङ्कार के संकीर्ण क्षेत्र से बाहर निकाल कर मुख्यतः काव्य के आत्मा के योग्य आसन पर प्रतिष्ठित किया । किन्तु रसमात्र के ग्रहण से काव्य की उत्तमता का सर्वाङ्गीण संस्पर्श नहीं हो पाता था, क्योंकि ऐसे भी पद्य मिलते हैं जो रस से कुछ न्यून ही सही, अतिशय चमत्कार उत्पन्न करते हैं, इस दृष्टि से आचार्य आनन्द- वर्धन ने ध्वनि के रूप में उन्हें भी संगृहीत किया जिनमें वस्तु और अलङ्कार प्रधान्यतः प्रतीयमान या व्यङ्ग्य होते हैं । और साथ ही, इन ध्वनियों में भी रस-चमत्कार को ही आचार्य ने पार्यन्तिकता दी । इस प्रकार एक ओर रस अनिवार्य भी रह गया और दूसरी ओर अपनी साधारण स्थिति में काव्य की उत्कृष्टता का बाधक भी नहीं हुआ । भारतीय साहित्य-शास्त्र में रस को इस प्रकार विस्तृत भूमि देने का समग्र रूप से एकमात्र श्रेय ध्वनिकार आनन्दवर्धन को है । रस के चमत्कार को ध्वनिकार काव्य की सर्वोत्कृष्ट भूमि मानते हैं, उनके अनुसार क्रौञ्च के जोड़े के वियोग से उत्पन्न वाल्मीकि का ‘शोक’ जो ‘श्लोक’ बन गया वह दुःख की भूमि नहीं वरन् आनन्द की अलौकिक भूमि है, ‘मा निषाद०’ को पढ़कर सहृदय का मन रस की अलौकिक चर्वणा करने लगता है । काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा । क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ १।५ ध्वनि के सम्बन्ध में विरुद्ध आपत्तियां यद्यपि ध्वनिकार स्वयं को ध्वनिसिद्धान्त का पुरस्कर्ता नहीं कहते, बल्कि उनके अनुसार बुधजनों ने जिस ध्वनि को काव्य के आत्मा रूप में पहले से समाम्नात ( समाम्नातपूर्वः, सम्यग् आ समन्तात् म्नातः प्रकटितः ) किया है वह सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिए उसके लक्षण का निरूपण करते हैं । इससे यह लक्षित होता है कि ध्वनि का सिद्धान्त ध्वनिकार से पहले भी प्रचलित था, हां उसे पुस्तक रूप देने का प्रयास सर्वप्रथम ध्वनिकार द्वारा हुआ । जैसा कि लोचन में स्पष्ट निर्देश भी किया है—‘बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाऽभिधानं स्यात्, न तु भूयसां तद् युक्तम् ।