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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( २७ ) तेन बुधैरिति बहुवचनम् । तदेव व्याचष्टे—परम्परयेति । अविच्छिन्नेन प्रवाहेण तैरेतदुक्तं विनाऽपि विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनादित्यभिप्रायः ।' (पृ० ११) इससे सम्भावित किया जा सकता है कि जब ध्वनिकार से पूर्व ध्वनि की मौखिक रूप में स्थिति थी तब उसका विरोध भी अवश्य रहा होगा । जैसा कि ध्वनिकार के समानकालिक मनोरथ कवि का ध्वनि-विरोधी श्लोक भी (पृ० २९) प्राप्त होता है। ध्वनिकार ने प्रथम कारिका में ध्वनि के विरोध में प्रचलित तीन विमतियों का निर्देश किया है—अभाववाद, भाक्तवाद और अनिर्वचनीयतावाद । अभाववाद सर्वथा सम्भावना पर आधारित है, अर्थात् ध्वनिकार ने ध्वनि के सम्बन्ध में अभाववादियों की सम्भावना करके इसका निर्देश किया है । दूसरा भाक्तवाद प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित है; यद्यपि किसी प्राचीन आचार्य ने ध्वनि को मान कर भक्ति या लक्षणा का अवलम्बन नहीं किया है, फिर भी काव्य में अमुख्य वृत्ति से व्यवहार का निर्देश किया है । तीसरा अनिर्वचनीयतावाद एक रूप से ध्वनि की स्वीकृति ही है, इसलिए यह कोई प्रबल विरोधी वाद नहीं कहा जा सकता । ध्वन्यालोक में प्रथम अभाववाद को तीन रूपों में विभक्त किया है, तदनुसार अभाववादियों के प्रथम पक्ष का कहना है कि शब्द-अर्थ रूप काव्य के चारुत्वाधायक अनुप्रास-उपमा आदि अलङ्कार और माधुर्य आदि गुण तथा इन गुणों से अभिन्न वृत्तियां एवं रीतियां प्रसिद्ध हैं । इनके अतिरिक्त ध्वनि कुछ भी नहीं है । दूसरे पक्ष का कहना है कि यदि मान भी लिया जाय कि कोई ध्वनि है तो वह निर्दिष्ट प्रस्थानों में किसी रूप में अन्तर्गत है न कि इनसे सर्वथा भिन्न रूप । इसी क्रम में तृतीय अभाववादियों का कहना है यह स्वीकार करते हुए भी कि ध्वनि किसी निर्दिष्ट अलङ्कार या गुण आदि के अन्तर्गत नहीं है, तो क्यों नहीं ऐसा समझा जाय कि ध्वनि कोई ऐसा अलङ्कार आदि था जिस पर किसी का अब तक ध्यान नहीं गया । वाग्विकल्प अनन्त हैं, फिर किसी तत्त्व का अनिर्दिष्ट रह जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं । इस प्रकार तीनों अभाववादियों के अनुसार ध्वनि कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । भाक्तवाद में भक्ति या लक्षणा शब्द का अमुख्य व्यापार मानी जाती है । गुणवृत्ति भी इसे कहते हैं । ध्वनि को ये लोग लक्षणा या भक्ति से अभिन्न मानते हैं और ध्वन्यर्थ को लक्ष्यार्थ की कोटि में लाते हैं । ये दूसरे विरोधी ध्वनि के विरोधी नहीं, ध्वनि के लक्षण के विरोधी हैं । इनके अनुसार ध्वनि का लक्षण भक्ति या लक्षणा के लक्षण से भिन्न नहीं । तृतीय विरोधी जो अनिर्वचनीयतावादी हैं उनके अनुसार ध्वनि कोई विलक्षण पदार्थ है । ध्वनि की स्थापना करते हुए इन तीनों विरोधों का ध्वनिकार ने प्रबल तर्कों द्वारा युक्तिसङ्गत खण्डन प्रस्तुत किया है । सबसे पहले ध्वनिकार ने प्रतीयमान व्यङ्ग्य अर्थ को वाच्य अर्थ में, अङ्गनाओं में लावण्य की भांति, सहृदय जनों के लिये आनन्ददायक निर्देश किया, तत्पश्चात् वह किस प्रकार वाच्य से भिन्न एवं उत्कृष्ट है इसका निर्देश स्वरूपभेद, विषयभेद आदि युक्तियों से किया । तब ध्वनि का लक्षण किया— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥ १।१३ पृ० १०२ जैसा कि अभाववादियों का कहना था कि जब ध्वनि कमनीयता की दृष्टि से कोई अतिरिक्त नहीं तो वह उक्त अलङ्कारों में ही अन्तर्भूत हो जाता है, इसके उत्तर में आनन्दवर्धन ने कहा कि २ ध्व० भू०