ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) उक्त अलङ्कार तो वाच्य-वाचक मात्र पर आश्रित हैं और ध्वनि व्यङ्ग्य व्यञ्जकभाव पर, ऐसी स्थिति में कैसे अन्तर्भाव हो सकता है, साथ ही वे अलङ्कार आदि तो वाच्य और वाचक के चारुत्वहेतु होने के कारण उस ध्वनि के अङ्गभूत हैं और यह अङ्गी है । लक्ष्यार्थ को ध्वन्यर्थ मानने वाले भाक्तवादियों का खण्डन करते हुए ध्वनिकार का पक्ष है कि जिस प्रकार वाच्यार्थ नियत होता है उस प्रकार लक्ष्यार्थ भी एक सीमा में होता है, जब कि ध्वन्यर्थ के लिए कोई नियमन अनिवार्य नहीं। तात्पर्य यह कि लक्ष्यार्थ जब भी होगा वाच्यार्थ से सम्बद्ध होगा। गङ्गा का लक्ष्यार्थ तट अवश्य ही प्रवाहरूप वाच्यार्थ से सम्बद्ध होना चाहिए। इस प्रकार लक्ष्यार्थ भी एक होता है, जब कि व्यङ्ग्यार्थ अनेक भी हो सकता है। दूसरे यह कि (प्रयोजनवती ) लक्षणा में प्रयोजन का अंश सर्वथा व्यङ्ग्य ही होता है, यदि उसे भी लक्ष्य मान लिया जाय तो उसका प्रयोजन क्या होगा ? अनवस्था होगी । तीसरे यह कि रसादि किसी स्थिति में लक्ष्य नहीं हो सकते, क्योंकि मुख्यार्थ की बाधा में लक्षणा होती है। रसादि वाच्यार्थ के अवगत होने के पश्चात् मुख्यार्थबाध के अभाव में भी वाच्यार्थ से भिन्न रूप में व्यञ्जित होने के कारण सर्वथा व्यङ्ग्य ही होते हैं, ऐसी स्थिति में सर्वथा लक्ष्य अर्थ से नहीं काम चल सकता । व्यङ्ग्य अर्थ और उसके लिए व्यञ्जना शक्ति अवश्य स्वीकार करनी होगी । इस प्रकार ये तीन पक्ष ध्वनि के विरोध में ध्वन्यालोक में ही निर्दिष्ट हैं। किन्तु ध्वन्यालोक के निर्माण के पश्चात् भी उसका प्रबल विरोध हुआ । फिर भी आचार्य आनन्दवर्धन का प्रभाव परवर्ती शास्त्रीय विचारधारा पर अप्रतिहत रूप से लक्षित होता है, यह उनकी स्थापनाओं की सर्वाङ्गपूर्णता का ही ज्वलन्त प्रमाण है। आगे हम ध्वनि के विरोधी आचार्यों, की चर्चा करेंगे । ध्वन्यालोक : स्वरूपस्थिति ध्वन्यालोक तीन भागों में विभक्त है—कारिका, वृत्ति और उदाहरण । काव्यमाला प्रथम सं० के अनुसार कारिकाएँ १२६ हैं, किन्तु काशी चौखम्बा संस्करण के अनुसार उनकी व्यवस्थित संख्या ११६ है । कारिकाओं के व्याख्यान रूप में वृत्ति-भाग है जो गद्य में है, कहीं-कहीं वृत्ति में परिकर-श्लोक, संक्षेप-श्लोक, संग्रह-श्लोक भी हैं। उदाहरण भाग पूर्ववर्ती कवियों के ग्रन्थों से उद्धृत और आनन्दवर्धन के स्वनिर्मित ग्रन्थों के पद्यों का है। सम्पूर्ण ग्रन्थ चार उद्योतों में विभक्त है । प्रथम उद्योत की प्रथम कारिका मन्दाक्रान्ता में, चतुर्थ और षष्ठ उपजाति में, त्रयोदश आर्या में है; तृतीय उद्योत में चार आर्याएँ हैं। इनके अतिरिक्त प्रथम तीन उद्योतों में श्लोक छन्द है । किन्तु चतुर्थ उद्योत की १७ कारिकाओं में अन्तिम तीन पद्य क्रमशः रथोद्धता, मालिनी और शिखरिणी-छन्दों में हैं । अब भी मूल ध्वन्यालोक, उसकी कारिका और वृत्ति के शुद्ध पाठों के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद बना हुआ है, जैसा कि प्रो० शिवप्रसाद भट्टाचार्य ने चतुर्थ उद्योत की कारिकाओं को बाद का निर्माण बताया है तथा और अनेक अटकल लगाये हैं । काव्यमाला संस्करण के पृ० १४४ (अथवा १७८) पर वृत्ति ग्रन्थ में यह आर्या मुद्रित है— 'इति काव्यार्थविवेको योऽयं चेतश्चमत्कृतिविधायी । सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो न विस्मार्यः ॥' इति ।