ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) काव्यमाला संस्करण के मूलाधार तीन पाण्डुलिपियों में से दो में यह आर्या नहीं है, जैसा कि वहाँ सम्पादकों का निर्देश है ( इयमार्या क-ख पुस्तकोर्नास्ति ) । म० म० काणे महाशय के अनुसार उन्हें प्राप्त अन्य पाँच पाण्डुलिपियों में यह आर्या नहीं है । इसलिए यह निश्चित ही Spurious है । ध्वन्यालोक का संक्षिप्त विषय-निर्देश ध्वन्यालोक का लक्ष्य ध्वनि का सर्वाङ्गीण प्रतिपादन एवं स्थापना है । प्रथम उद्योत में, ध्वनि के सम्बन्ध में तीन विमतियों की सम्भावना करके उनका निराकरण किया है । वाच्य अर्थ से प्रतीयमान का भेद और प्राधान्य प्रतिपादित करके ध्वनि काव्य का लक्षण प्रस्तुत किया गया है । द्वितीय उद्योत में, ध्वनि काव्य के भेदों का निरूपण है । इसी क्रम में असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के रूप में रसादि ध्वनि की चर्चा की गई है । रसवदलङ्कार से रसध्वनि का भेद-निर्देश किया है एवं गुण और अलङ्कार का लक्षण प्रस्तुत किया है । रस के अनुसार गुणों की व्यवस्था की गई है । रस की दृष्टि से, विशेष रूप से शृङ्गार में रूपक आदि अलङ्कारों के ग्रहण और त्याग की समीक्षा उदाहरणों द्वारा की है । शब्दशक्तिमूलसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के प्रसङ्ग में, श्लेष और शब्दशक्तिमूल ध्वनि का भेद निर्देश किया है । विस्तार से ध्वनि के अन्य भेदों का सोदाहरण प्रतिपादन किया है । तृतीय उद्योत में ध्वनि के द्वितीय उद्योत में व्यङ्ग्य के प्रकार से लक्षित भेदों का व्यञ्जक के प्रकार से सोदाहरण निर्देश किया है । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का वर्ण, पद, पदावयव, वाक्य, सङ्घटना और प्रबन्ध में भी लक्षित होने का निर्देश किया है । सङ्घटना का स्वरूप-निरूपण और गुणों के साथ उसका सम्बन्ध विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है । प्रबन्धरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि के नियोजन का प्रकार रसादि की व्यञ्जकता के अनुसार बताया है । कथा-शरीर के निर्माण में औचित्य के ध्यान की अनिवार्यता का निर्देश करते हुए औचित्यबन्ध का रस का उपनिषद् कहा है और अनौचित्य का रसभङ्ग का प्रकार कारण बताया है । फिर रस के विरोधियों का परिहार बताया है । मीमांसक के साथ वाक्य के व्यञ्जकत्व को लेकर विचार, व्यञ्जकत्व एवं गौणत्व का स्वरूपतः और विषयतः भेद, व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का स्वरूप-विवेक आदि विषयों की विस्तार से चर्चा है । पुनः, काव्य के दूसरे प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य का स्वरूप-निर्देश करते हैं । ध्वनि में व्यङ्ग्य की स्थिति प्राधान्यतः होती है और द्वितीय भेद में गुणीभावतः । इनके अतिरिक्त काव्य का तृतीय भेद है, जो चित्र कहलाता है । चतुर्थ उद्योत में, प्रतिभा के आनन्त्य का विस्तार से निरूपण है । ध्वनि के भेदों के आधार पर प्रतिभावान् कवि प्राचीन अर्थ भाव, उक्ति आदि में नवीन चमत्कार उत्पन्न कर सकता है । इस प्रकार आचार्य ने काव्यक्षेत्र को अनन्तता निर्दिष्ट की है । आनन्दवर्धनाचार्य ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन का समय बहुत कुछ निर्धारित है । 'राजतरङ्गिणी' में कल्हण ने अवन्तिवर्मा के साम्राज्य में प्रसिद्ध होने वाले कवि के रूप में उनका उल्लेख किया है— मुक्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः । प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः ॥ ५।३४