ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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बूह्लर और जैकोबी के अनुसार अवन्तिवर्मा का राज्यकाल ८५५-८८३ ई० था । अब कुछ विद्वानों ने अवन्तिवर्मा के पुत्र शङ्करवर्मा ( ८८३-९०२ ई० ) के साथ भी आनन्दवर्धन की समसामयिकता सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । क्योंकि आनन्दवर्धन के जीवनकाल का ठीक सङ्केत प्राप्त नहीं । वह तो अवन्तिवर्मा के राज्यकाल के आधार पर निश्चित होता है । कवि के रूप में आनन्दवर्धन ने प्रसिद्धि अवन्तिवर्मा के राज्यकाल में प्राप्त की थी । और जब उन्होंने ध्वन्यालोक का निर्माण किया तब निश्चित ही वह प्रौढ़ एवं वयःप्राप्त हो चुके होंगे, क्योंकि उन्होंने अपने सभी काव्य-निर्माणों का उल्लेख ‘ध्वन्यालोक’ में किया है । इसलिए उनका शङ्करवर्मा के काल में भी विद्यमान रहना युक्तिसङ्गत है । और भी, जैसा कि आनन्दवर्धन ने राजा यशोवर्मा द्वारा रचित ‘रामाभ्युदय’ नाटक का उल्लेख एवं उसके एक पद्य ‘कृतककुपितैः०’ का उल्लेख किया है ( पृ० ३३३ ), और यशोवर्मा को विद्वानों ने शङ्करवर्मा से अभिन्न माना है । न्यायमञ्जरी के रचयिता भट्टजयन्त शङ्करवर्मा के समसामयिक थे । जयन्तभट्ट ने आनन्दवर्धन के ध्वनिसिद्धान्त का खण्डन ‘न्यायमञ्जरी’ में किया है— एतेन शब्दसामर्थ्यमहिम्ना सोऽपि वारितः । यमन्यः पण्डितंमन्यः प्रपेदे कञ्चन ध्वनिम् ॥ विधेर्निषेधावगतिर्विधिबुद्धिर्निषेधतः । यथा— 'भम धम्मिअ वीसत्थो मा स्म पान्थ गृहं विश । मानान्तरपरिच्छेद्यवस्तुरूपोपदेशिनाम् ॥ शब्दानामेव सामर्थ्यं तत्र तत्र तथा तथा । अथवा नेदृशी चर्चा कविभिः सह शोभते । विद्वांसोऽपि विमुह्यन्ति वाक्यार्थगहनेऽध्वनि ॥ पृ० ४५ यह सम्भव है कि आनन्दवर्धन जयन्त के पहले, किन्तु समकालिक थे और साथ ही शङ्करवर्मा के भी समकालिक थे । इस प्रकार आनन्दवर्धन का समय ९०२ ई० माना जा सकता है ( दे० ध्व० प्रथम उद्योत, विष्णुपद भट्टाचार्य की भूमिका ) । और भी, ध्वन्यालोक में उद्भट का उल्लेख है जिनका समय ८०० ई० माना जाता है, तथा आनन्दवर्धन का राजशेखर ( लगभग ९००-९२५ ) ने उल्लेख किया है । इस प्रकार उनके साहित्यिक निर्माणों का समय ८६०-८९० ई० के बीच होना चाहिए ( दे० म० म० काणे, History of Sanskrit poetics तु० सं०, पृ० २०२ ) । आनन्दवर्धन के वंश के सम्बन्ध में कुछ भी विदित नहीं है । केवल ‘देवीशतक’ के अन्त में उल्लेख है कि वह ‘नोण’ के पुत्र थे, वह स्वयं लिखते हैं— देव्या स्वमोद्गमादिष्टदेवीशतकसंज्ञया । देशितानुपमामाधात्ततो नोणसुतो नुतिम् ॥ का० मा० नवम : निर्णय सा० ‘देवीशतक’ की रचना उन्होंने ‘विषमबाणलीला’ और ‘अर्जुनचरित’ के बाद में की थी, जैसा कि इस पद्य से विदित होता है—