ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१ ) येनानन्दकथायां त्रिदशानन्दे च ललिता वाणी । तेन सुदुष्करमेतत् स्तोत्रं देव्याः कृतं भक्त्या ॥ ‘काव्यानुशासनविवेक’ में हेमचन्द्र ने भी आनन्दवर्धन के ‘देवीशतक’ का उद्धरण देते हुए उन्हें ‘नोणसुत’ कहा है (पृ० २२५) । श्री विष्णुपद भट्टाचार्य के अनुसार ‘India office Library' की पाण्डुलिपि की तृतीय उद्योत के अन्त की पुष्पिका में आनन्दवर्धन के पिता नोण या नाणोपाध्याय प्रमाणित होते हैं, और चतुर्थ उद्योत की भूमिका में ‘जोणोपाध्याय’ नाम मिलता है । आनन्दवर्धन के ग्रन्थ—देवीशतक, विषमबाणलीला, अर्जुनचरित ये तीन काव्यग्रन्थ हैं । अन्तिम दो का उल्लेख ‘ध्वन्यालोक’ में मिलता है (२।१, २।२७; पृ० ३८८) । देवीशतक के अन्तिम उपर्युक्त श्लोक के व्याख्यान में कैयट ने भी आनन्दवर्धन की विषमबाणलीला और अर्जुन- चरित, दोनों कृतियों का निर्देश किया है । तथा पीटर्सन की द्वितीय रिपोर्ट के अनुसार, जैसा कि श्री विष्णुपद भट्टाचार्य ने लिखा है, ‘सारसमुच्चय’ नामक ग्रन्थ में आनन्दवर्धन की ‘विषमबाणलीला’ का उल्लेख है । आनन्दवर्धन के दार्शनिक निर्माणों का सङ्केत वृत्तिग्रन्थ एवं उस पर लोचन से मिलता है । जैसा कि आचार्य आनन्दवर्धन ने ध्वनि की अनिर्वचनीयता मानने वालों (‘केचिद् वाचां स्थितम- विषये तत्त्वमूचुस्तदीयम्’) को उत्तर देते हुए लिखा है—‘यत्तु अनिर्देश्यत्वं सर्वलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तत्तन्मतपरीक्षायां ग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः’ (पृ० ५५५) । इस पर लोचनकार लिखते- हैं—‘ग्रन्थान्तर इति विनिश्चयटीकायां धर्मोत्तर्यां या वृत्तिरमुना ग्रन्थकृता कृता तत्रैव तद्व्याख्यातम् ।’ इससे निश्चित होता है कि आचार्य ने बौद्धदार्शनिक आचार्य धर्मोत्तर की ‘विनिश्चयटीका’ पर ‘वृत्ति’ रूप से व्याख्यान प्रस्तुत किया था । ‘प्रमाणविनिश्चय’ आचार्य धर्मकीर्ति द्वारा लिखित बौद्धन्याय का एक ग्रन्थ है, और आचार्य धर्मोत्तर ने उस पर ‘प्रमाणविनिश्चयटीका’ लिखी थी । आचार्य धर्मोत्तर का समय म० म० सतीशचन्द्र विद्याभूषण के अनुसार ४४७ ई० है । आचार्य धर्मकीर्ति का उल्लेख ध्वन्यालोक में मिलता है—‘लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः...तथा चायं धर्मकीर्तेः श्लोक इति प्रसिद्धिः । सम्भाव्यते च तस्यैव । यस्मात् अनध्यवसितावगाहन०’ (पृ० ५२१) । इसके अतिरिक्त, जैसा कि आचार्य अभिनवगुप्त ने निर्देश किया है, आनन्दवर्धन का एक और दार्शनिक ग्रन्थ ‘तत्त्वालोक’ था, जो अद्वैतसिद्धान्तसम्बन्धी निर्माण लगता है—‘तदुत्तीर्णत्वे तु सर्वं परमेश्वराद्वयं ब्रह्मेत्यस्मच्छास्त्रकारेण न न विदितं तत्त्वालोकग्रन्थं विरचयतेत्यास्ताम् । (पृ० ६७); ‘एतच्च ग्रन्थ- कारेण तत्त्वालोके वितत्योक्तमिह त्वस्य न सुहृद्योऽवसर इति नास्माभिर्दर्शितम्’ (पृ० ५३३) । इस प्रकार यह अत्यन्त विलक्षण बात है कि हमारे आचार्य कवि-आलोचक के साथ प्रथम श्रेणी के दार्शनिक भी थे । यह बात स्वयं उनके इस पद्य से भी पूर्णतः प्रमाणित होती है— यथा ममैव— ‘या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा, दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती । ते द्वे अप्यवलम्ब्य विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं श्रान्ता नैव च लब्धमब्धिशयन, त्वद्भक्तितुल्यं सुखम् ॥ पृ० ५४१