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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( २२ ) लोचनकार आचार्य अभिनवगुप्त जिस अभिनवगुप्त को यहाँ हम चर्चा करने जा रहे हैं उन्हें माधवाचार्य के 'शङ्कर-दिग्विजय' में निर्दिष्ट किसी शाक्त भाष्यकार अभिनवगुप्त नामक व्यक्ति से भिन्न समझना चाहिए, जिनका शास्त्रार्थ शङ्कराचार्य से हुआ था और वह पराजित हुए थे । १ वह कामरूप (आसाम) के निवासी थे। हमारे लोचनकार एवं अभिनवभारतीकार आचार्य अभिनवगुप्त काश्मीरनिवासी तथा शैव थे। विद्वानों ने अनेक प्रामाणिक परिशीलनोँ के पश्चात् काश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त का काल ९५० ई० से लेकर १०२५ ई० तक निश्चित किया है। कहा जाता है कि 'अभिनवगुप्त' नाम उनका गुरुओं का दिया हुआ है, अपना नाम कुछ और ही था। इस सम्बन्ध में कुछ आख्यान भी बताये जाते हैं। आचार्य मम्मट ने इन्हें 'श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादाः' कहा है। इस पर काव्यप्रकाश की 'बालबोधिनी' टीका में वामनाचार्य ने एक आख्यान भी दिया है (उस व्याख्यान का आधार कोई प्राप्त नहीं है)। यद्यपि यह बात बहुत कुछ मान्य है कि आचार्य का नाम 'अभिनवगुप्त' उनके गुरुओं द्वारा प्रदत्त होगा, जैसा कि वे 'तन्त्रालोक' में लिखते हैं— “अभिनवगुप्तस्य कृतिः सेयं यस्योदिता गुरुभिराख्या ॥” १-१५० दक्षिण-भारत के नृत्य-शास्त्रियों में 'गुप्तपाद' (सर्प) के आधार पर आचार्य को 'शेषावतार' समझा जाता है। पूर्वज—आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्वज मूलतः काश्मीर के निवासी न थे। इनके जन्म से प्रायः २०० वर्ष पूर्व अर्थात् अष्टम शताब्दी में कन्नौज से वहाँ गये थे। यशोवर्मा (७३०-७४०) अष्टम शताब्दी में कन्नौज का और ललितादित्य (७२५-७६१) काश्मीर का, समकालीन शासक थे। जैसा कि 'राजतरङ्गिणी' में वर्णन है, दोनों में युद्ध हुआ था और यशोवर्मा पराजित हुआ था। अन्तर्वेदी (गङ्गा-यमुना के बीच के प्रदेश) के विद्वान् अत्रिगुप्त की विद्वत्ता से प्रभावित होकर ललितादित्य ने उन्हें काश्मीर में बसाया। अन्तर्वेदी के अन्तर्गत ही कन्नौज का राज्य था। २ फिर आचार्य अभिनवगुप्त ने अन्य पूर्वजों का निर्देश न कर अपने पितामह वराहगुप्त का उल्लेख किया है। वराहगुप्त के पुत्र एवं अभिनवगुप्त के पिता नृसिंहगुप्त थे, जिन्हें लोग 'चुखुलक' भी कहते थे। चाचा थे वामन गुप्त (इनका उल्लेख 'अभिनवभारती' में इनके रचित एक श्लोक के साथ किया है)। क्षेमगुप्त, उत्पलगुप्त, अभिनवगुप्त, चक्रकगुप्त और पद्मगुप्त ये चचेरे भाई थे। गुरु—आचार्य ने अपने विभिन्न शास्त्र के विभिन्न गुरुओं का स्मरण अतिशय श्रद्धापूर्वक अपने ग्रन्थों में किया है। कुछ उनके प्रसिद्ध गुरुओं के नाम इस प्रकार हैं—१. नृसिंहगुप्त (पिता, व्याकरणशास्त्र के गुरु), २. वोमनाथ (द्वैताद्वैत तन्त्र के गुरु), ३. भूतिराजतनय (द्वैतवादी शैव सम्प्रदाय के गुरु), ४. लक्ष्मणगुप्त (प्रत्यभिज्ञा, क्रम तथा त्रिक दर्शन के गुरु), ५. भट्ट इन्दुराज (ध्वनि-सिद्धान्त के गुरु) ६. भूतिराज (ब्रह्मविद्या के गुरु), ७. भट्टतोत (नाट्यशास्त्र के गुरु)। १. तदनन्तरमेष कामरूपानधिगत्याभिनवोपशब्दगुप्तम् । अजयत् किल शाक्तभाष्यकारं स च भग्नॊ मनसेदमालुलोचे ॥ 'शङ्करदिग्विजय' १५।१५८ २. अन्तर्वेद्यामत्रिगुप्ताभिधानः प्राप्योत्पत्तिं प्राविशत् प्राग्द्यजन्मा । श्रीकाश्मीरांश्र्वन्द्रचूड़ावतंसैरैभिःसंख्याकैः पावितोपान्तमागान् ॥ परात्रिंशिका विवरण, २८०