ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३ ) भट्ट इन्दुराज आचार्य अभिनवगुप्त के काव्यशास्त्रीय गुरु थे। सम्भवतः आचार्य को इन्होंने ध्वन्यालोक पढ़ाया था और उन्हें अपने विचारों से अवगत किया था। आचार्य ने इनकी अनेक रचनाएँ उद्धृत की हैं और 'लोचन' के आरम्भ में इन्हें सादर स्मरण किया है। आचार्य के अनुसार ये 'विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्ती' थे। बूह्लर महाशय को काश्मीर-रिपोर्ट के अनुसार भगवद्गीता की अपनी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज को कात्यायन गोत्र से सम्बद्ध, सौचुक का पौत्र तथा भूतिराज का पुत्र कहा है। लोचन में 'ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरुभिर्व्याख्यातः', 'इत्याशयोऽत्र ग्रन्थेऽस्मद्गुरुभिर्निरूपितः', 'अस्मद्गुरुवस्त्वाहुः' आदि निर्देशों से विद्वानों का अनुमान है कि आचार्य के गुरु ने कोई ध्वन्यालोक पर व्याख्यान ही लिखा होगा। कुछ विद्वानों ने उद्भट के व्याख्याता प्रतीहारेन्दुराज से इन भट्ट इन्दुराज को अभिन्न समझा है। महामहोपाध्याय काणे महाशय ने इसका खण्डन करते हुए कहा है कि एक तो प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि-सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया है, जब कि भट्टेन्दुराज ध्वनि-सिद्धान्त के व्याख्याता के रूप में 'लोचन' में निर्दिष्ट हैं। दूसरे अपने गुरु भट्ट इन्दुराज के लिए अभिनवगुप्त ने कहीं भी 'प्रतीहार' की उपाधि का प्रयोग नहीं किया है। प्रतीहारेन्दुराज के गुरु मुकुल ('अभिधावृत्तमातृका' के रचयिता) थे। अभिनव ने अपने गुरु के गुरु उत्पलदेव की चर्चा की है किन्तु मुकुल की नहीं की। और भी, प्रतीहारेन्दुराज की टीका में उनका रचित एक श्लोक भी नहीं है, जबकि 'लोचन' में उनके अनेक श्लोक उद्धृत हैं। 'अभिनवभारती' में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज की गणना वाल्मीकि, व्यास और कालिदास के नामों के साथ की है (भाग २, पृ० २९३)। इस प्रकार प्रती- हारेन्दुराज कोई मात्र आलोचक ही सिद्ध होते हैं, कवि नहीं। आचार्य के दूसरे और एक साहित्यिक गुरु थे भट्ट तौत, जिनसे उन्होंने नाट्यशास्त्र का अध्ययन किया था। 'लोचन' के उल्लेख के अनुसार भट्ट तौत ने 'काव्यकौतुक' नाम का ग्रन्थ लिखा था तथा उस पर व्याख्यान 'विवरण' नाम से आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रस्तुत किया था— 'स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्यकौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृत- निर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना।' पृ० ४३४ 'लोचन' में भट्टतौत के नाम से यह श्लोकार्ध भी उद्धृत है— 'नायकस्य कवेः कर्तुः समानोऽनुभवस्ततः।' पृ० ९२ 'अभिनवभारती' के अन्त में आचार्य कहते हैं— 'द्विजवरतोतनिरूपित-सन्ध्यध्यायार्थतत्त्वघटनेयम् । अभिनवगुप्तेन कृता शिवचरणाम्भोजमधुपेन' ॥ जीवन—आचार्य अभिनवगुप्त, जैसा कि जयरथ ने 'तन्त्रालोक' की टीका में निर्देश किया है, अपने माता-पिता के 'योगिनोभू' पुत्र थे। बाल्यकाल में माता के गत हो जाने, फिर पितृ-वियोग से आचार्य का जीवन अतिशय नीरस हो गया और फलतः वे दार्शनिक हो गए। यह एक बहुत बड़े साधक थे और काश्मीर की किंवदन्ती के अनुसार श्रीनगर और गुलमर्ग के बीच मगम नाम के स्थान से पांच मील की दूरी पर स्थित 'भैरवगुफा' में साधना करते थे। सम्भवतः उन्होंने अन्तिम श्वास भी वहीं ली।