भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

( २३ ) भट्ट इन्दुराज आचार्य अभिनवगुप्त के काव्यशास्त्रीय गुरु थे। सम्भवतः आचार्य को इन्होंने ध्वन्यालोक पढ़ाया था और उन्हें अपने विचारों से अवगत किया था। आचार्य ने इनकी अनेक रचनाएँ उद्धृत की हैं और 'लोचन' के आरम्भ में इन्हें सादर स्मरण किया है। आचार्य के अनुसार ये 'विद्वत्कविसहृदयचक्रवर्ती' थे। बूह्लर महाशय को काश्मीर-रिपोर्ट के अनुसार भगवद्गीता की अपनी व्याख्या में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज को कात्यायन गोत्र से सम्बद्ध, सौचुक का पौत्र तथा भूतिराज का पुत्र कहा है। लोचन में 'ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरुभिर्व्याख्यातः', 'इत्याशयोऽत्र ग्रन्थेऽस्मद्गुरुभिर्निरूपितः', 'अस्मद्गुरुवस्त्वाहुः' आदि निर्देशों से विद्वानों का अनुमान है कि आचार्य के गुरु ने कोई ध्वन्यालोक पर व्याख्यान ही लिखा होगा। कुछ विद्वानों ने उद्भट के व्याख्याता प्रतीहारेन्दुराज से इन भट्ट इन्दुराज को अभिन्न समझा है। महामहोपाध्याय काणे महाशय ने इसका खण्डन करते हुए कहा है कि एक तो प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि-सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया है, जब कि भट्टेन्दुराज ध्वनि-सिद्धान्त के व्याख्याता के रूप में 'लोचन' में निर्दिष्ट हैं। दूसरे अपने गुरु भट्ट इन्दुराज के लिए अभिनवगुप्त ने कहीं भी 'प्रतीहार' की उपाधि का प्रयोग नहीं किया है। प्रतीहारेन्दुराज के गुरु मुकुल ('अभिधावृत्तमातृका' के रचयिता) थे। अभिनव ने अपने गुरु के गुरु उत्पलदेव की चर्चा की है किन्तु मुकुल की नहीं की। और भी, प्रतीहारेन्दुराज की टीका में उनका रचित एक श्लोक भी नहीं है, जबकि 'लोचन' में उनके अनेक श्लोक उद्धृत हैं। 'अभिनवभारती' में अभिनवगुप्त ने भट्ट इन्दुराज की गणना वाल्मीकि, व्यास और कालिदास के नामों के साथ की है (भाग २, पृ० २९३)। इस प्रकार प्रती- हारेन्दुराज कोई मात्र आलोचक ही सिद्ध होते हैं, कवि नहीं। आचार्य के दूसरे और एक साहित्यिक गुरु थे भट्ट तौत, जिनसे उन्होंने नाट्यशास्त्र का अध्ययन किया था। 'लोचन' के उल्लेख के अनुसार भट्ट तौत ने 'काव्यकौतुक' नाम का ग्रन्थ लिखा था तथा उस पर व्याख्यान 'विवरण' नाम से आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रस्तुत किया था— 'स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्यकौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृत- निर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना।' पृ० ४३४ 'लोचन' में भट्टतौत के नाम से यह श्लोकार्ध भी उद्धृत है— 'नायकस्य कवेः कर्तुः समानोऽनुभवस्ततः।' पृ० ९२ 'अभिनवभारती' के अन्त में आचार्य कहते हैं— 'द्विजवरतोतनिरूपित-सन्ध्यध्यायार्थतत्त्वघटनेयम् । अभिनवगुप्तेन कृता शिवचरणाम्भोजमधुपेन' ॥ जीवन—आचार्य अभिनवगुप्त, जैसा कि जयरथ ने 'तन्त्रालोक' की टीका में निर्देश किया है, अपने माता-पिता के 'योगिनोभू' पुत्र थे। बाल्यकाल में माता के गत हो जाने, फिर पितृ-वियोग से आचार्य का जीवन अतिशय नीरस हो गया और फलतः वे दार्शनिक हो गए। यह एक बहुत बड़े साधक थे और काश्मीर की किंवदन्ती के अनुसार श्रीनगर और गुलमर्ग के बीच मगम नाम के स्थान से पांच मील की दूरी पर स्थित 'भैरवगुफा' में साधना करते थे। सम्भवतः उन्होंने अन्तिम श्वास भी वहीं ली।

( २४ ) आचार्य अभिनवगुप्त के जीवन, ग्रन्थ आदि विषयों पर विस्तृत मौलिक अनुसन्धान के लिए आकलनीय है डा० कान्तिचन्द्र पाण्डेय का अंग्रेजी में लिखा—'अभिनवगुप्त' (चौखम्बा प्रकाशन ) । 'लोचन'—'ध्वन्यालोक' पर आचार्य अभिनवगुप्त की यह टीका इसी नाम से प्रसिद्ध है, किन्तु विभिन्न पाण्डुलिपियों में इसे सहृदयालोकलोचन और काव्यालोकलोचन भी कहा है। आचार्य को परवर्ती ग्रन्थकारों ने 'लोचनकार' के नाम से स्मरण किया है, स्वयं आचार्य ने 'लोचन' नाम की सार्थकता इन शब्दों में निर्दिष्ट की है— किं लोचनं विनाऽऽलोको भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात् ॥ पृ० १७१ साहित्यशास्त्र में 'लोचन' व्याख्यान का स्थान 'महाभाष्य' के सदृश है। 'लोचन' से पूर्व 'ध्वन्यालोक' पर 'चन्द्रिका' नाम की व्याख्या लिखी गई थी, जैसा कि ऊपर उद्धृत श्लोक में आचार्य ने उसका संकेत किया है—भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । उन चन्द्रिकाकार का उल्लेख 'लोचन' में अनेक स्थलों पर है ( पृ० ४३४; ४५१ ) । चन्द्रिकाकार सम्भवतः अभिनवगुप्त के ही कोई सम्बन्धी थे। 'इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन' कहते हुए कई स्थलों पर लोचनकार ने अपने पूर्व के किसी टीकाकार की आलोचना भी की है। महिमभट्ट ने भी 'व्यक्तिविवेक' में 'चन्द्रिका' व्याख्या की सूचना दी है— ध्वनिवर्त्मन्यतिगहने स्खलितं वाण्याः पदे पदे सुलभम् । रभसेन यत्प्रवृत्ता प्रकाशकं चन्द्रिकाद्यदृष्ट्वैव ॥ 'चन्द्रिका' ईसा की ९००-९५० शती में लिखी गई होगी। कारिकाकार और वृत्तिकार ध्वन्यालोक का कारिकाभाग और वृत्तिभाग भिन्न कर्ताओं द्वारा रचित हैं अथवा दोनों एक कर्ता के निर्माण हैं, इस सम्बन्ध में आधुनिक विद्वानों का बहुत पहले से तीव्र मतभेद है। इस समस्या का श्रीगणेश डॉ० बूहलर ने 'कश्मीर रिपोर्ट' में इन शब्दों में किया था— “From Abhinavagupta's ṭīkā it appears that verses ( कारिका ) are the composition of Some older writer, whose name is not given. But it is remarkable that they contain no मङ्गलाचरण” ( पृ० ६५, श्री विष्णुपद भट्टाचार्य के ध्व० पर introduction से उद्धृत ) । तत्पश्चात् ध्वन्यालोक के काव्यमाला संस्करण ( निर्णयसागर प्रेस, बम्बई ) के सम्पादकों (श्री पं० दुर्गाप्रसाद आदि ) ने भी अपने वक्तव्य में कारिकाभाग का नाम 'ध्वनि' और वृत्तिभाग का नाम 'आलोक' मानते हुए दोनों ग्रन्थों को आचार्य अभिनवगुप्त के 'लोचन' के उल्लेखों के आधार पर भिन्नकर्तृक ही स्वीकार किया है। फिर महामहोपाध्याय (अब भारतरत्न ) श्री पी० वी० काणे महाशय ने अपने सुप्रसिद्ध अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में भिन्नकर्तृकत्व की समस्या उठाई है और अनेक अन्तर्बाह्य प्रमाणों के आधार पर भिन्नकर्तृकत्व के पक्ष का स्थापन किया है। डॉ० सुशीलकुमार डे महाशय ने भी अपने अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में कारिका भाग को

( २५ ) किसी प्राचीन लेखक का निर्माण माना है, जिसकी वृत्ति आनन्दवर्धनाचार्य द्वारा लिखी गई है । और भी, जिन विद्वानों ने कारिका और वृत्ति भागों का भिन्नकर्तृकत्व माना है उनमें प्रसिद्ध हैं— श्री सोवानी ( Sovani ) प्रो० शिव प्रसाद भट्टाचार्य, श्री के० गोडा वर्मा आदि । इसके विपरीत, दोनों भागों को अभिन्नकर्तृक मानने वाले विद्वानों का एक प्रबल दल भी हुआ, जिसमें प्रसिद्ध हैं—स्व० म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री, डॉ० सातकरी मुकर्जी, डॉ० शङ्करन्, डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय, डॉ० कृष्णमूर्ति और प्रो० मनकद् आदि । जैसा कि ऊपर डॉ० बूहलर और काव्यमाला सं० के सम्पादकों का निर्देश किया गया है, इस समस्या का मूल कारण है आचार्य अभिनवगुप्त का ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन’ व्याख्यान, जिसमें अनेक स्थलों में कारिकाकार ( ˚कृत् ) और वृत्तिकार ( ˚कृत् ) को भिन्न रूप में निर्देश किया गया है और साथ ही वृत्तिग्रन्थ के रचयिता को ‘ग्रंथकार’ और कारिकाग्रन्थ के रचयिता को मूलग्रन्थकार ( ˚कृत् ) तथा कारिकाग्रन्थ को ‘मूलकारिका’ कहा गया है । म० म० काणे महाशय ने अपने ‘History of Sanskrit Poetics’ ( तृतीय सं० पृ० १६५ ) में ‘लोचन’ टीका के महत्त्वपूर्ण स्थलों को, जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार का भेद प्रतीत होता है, इस क्रम से उद्धृत किया है— १. ‘अत एव मूलकारिका साक्षात्तन्निराकरणार्था न श्रूयते । वृत्तिकृत्तु निराकृतमपि प्रमेयशय्यापूरणाय कण्ठेन तत्पक्षमनूद्य निराकरोति—येऽपीत्यादिना ।···तत्र ( तेनात्र ) प्रथमोद्योते ध्वनेः सामान्यलक्षणमेव कारिकाकारेण कृतम् । द्वितीयोद्योते कारिकाकारो- ऽवान्तरविभागं विशेषलक्षणं च विदधदनुवादमुखेन मूलविभागं द्विविधं सूचितवान् । तदाशयानुसारेण तु वृत्तिकृदत्रैवोद्योते मूलविभागमवोचत्०’ । पृ० १७० २. ‘न चैतन्मयोक्तम् , अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह तन्नेति । भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः ।’ पृ० १७३ ( इस सं० में काशी चौखम्बा सं० के अनुसार ‘न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्’ पाठ है । ) ३. ‘उक्तमेव ध्वनिस্বরূপं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति ।’ पृ० ३०९ ४. ‘एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ?’ पृ० ३१२ ५. ‘कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु बीभत्सादी कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनुसर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।’ पृ० ३२९ ६. ‘प्रतिपादितमेवैषामलम्बनम्’ ध्व० के इस कथन पर ‘लोचन’ का निर्देश है— ‘अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः ।’ पृ० ३४० ७. ‘एवमादौ विषये यथौचित्यात्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे’ इस ध्व० पर ‘लोचन’ का कथन है—‘दर्शितमेवेति । कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः ।’ पृ० ३४७

( २६ ) ८. 'यद्यप्यर्थानन्त्यमात्रे हेतुर्वृत्तिकारेणोक्तः, तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः।' पृ० ५६५ इनके अतिरिक्त भी 'लोचन' में अनेक स्थल हैं, जिनमें 'वृत्तिकार' शब्द का उल्लेख है, किन्तु उनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भेद का विचार गतिशील नहीं होता, जितना कि इन उद्धरणों से होता है । अपने पक्ष की पुष्टि में इन स्थलों को दोनों दल के पण्डितों ने अपने अनुसार लगाया है । प्रधान रूप से यहाँ भिन्नकर्तृकत्ववादियों में म० म० काणे के अनुसार तथा अभिन्नकर्तृकत्ववादियों में डॉ० सातकरी मुकर्जी के अनुसार हम विचार करेंगे । डॉ० सातकरी मुकर्जी (भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, वर्तमान में डाइरेक्टर, नालन्दा पालि इन्स्टिच्यूट, बिहार) का लेख 'A dissertations on the identity of the author of the Dhvanyaloka' B. C. vol. I Part पृ० १७९ में प्रकाशित है (१९४५) । म० म० काणे के पक्षों का विशेषतः खण्डन करते हुए डॉ० मुकर्जी ने ध्वन्यालोक के कारिका और वृत्ति भागों के अभिन्नकर्तृकत्व पक्ष का बड़ी दृढ़ता से समर्थन किया है, यद्यपि वे अपने पक्ष के समर्थन में 'आग्रह' का अवलम्बन नहीं करते और न कि चाहते हैं कि यह प्रश्न स्थगित हो जाय ( I do not think the question to be a closed one and I propose to record the results of my reflections which may serve to stress the need of re-consideration and re-assessment of the problem with all its relevent issues') । इसी प्रकार म० म० काणे भी अपने पक्ष के विपरीत अभिन्नकर्तृकत्व के प्रमाणित हो जाने पर प्रसन्न होना चाहते हैं ('I should be glad if ultimately it be proved that the same person is the author of both Karikas and Vṛtti') । अस्तु, यह प्रथमतः निर्देश करना आवश्यक है कि भेदवादियों अर्थात् कारिका और वृत्ति के भिन्न- कर्तृकत्ववादियों के पक्ष के मूल में 'लोचन' के भेद-निर्देश के स्थल हैं और अभेदवादियों के पक्ष के मूल में आनन्दवर्धन के परवर्ती ग्रन्थकारों के वक्तव्य हैं, जिनके अनुसार आचार्य आनन्दवर्धन ही 'ध्वनिकार' हैं तथा कारिका और वृत्तिग्रन्थ के प्रणेता हैं। इस प्रकार 'लोचन' के जिस भेद-व्यवहार को म० म० काणे भिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का साधन, समझते हैं उसे डॉ० मुकर्जी 'functional' मानते हैं। 'लोचन' इस निर्णय में इसलिए सबसे अधिक महत्त्व रखता है कि वह 'ध्वन्यालोक' के निर्माण के १५० वर्ष पश्चात् निर्मित हुआ है । म० म० काणे ने सबसे पहले 'लोचन' के उन स्थलों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिनमें वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' निर्देश किया गया है और कारिका के रचयिता के लिए 'मूलग्रन्थकृत' (ऊपर निर्दिष्ट 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता') कहा गया है । ध्वन्यालोक की प्रथम कारिका की वृत्ति में लिखा है—'तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोकः- यस्मिन्नस्ति त वस्तु०' इत्यादि । पृ० २७-२९ इस पर 'लोचन' का निर्देश है—'तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनो- रथनाम्ना कविना ।'

( २७ ) जाकोबी महाशय ने कारिकाओं के लेखक ध्वनिकार को इस प्रमाण के आधार पर कल्हण की 'राजतरङ्गिणी' (४।४९७ और ६७१) के अनुसार कश्मीर के जयापीड और उसके उत्तराधिकारी ललितापीड (७८०-८१३ ई०) के राज्यकाल में हुए मनोरथ कवि का समसामयिक माना है। 'राजतरङ्गिणी' का श्लोक इस प्रकार है— मनोरथः शङ्खदत्तश्चटकः सन्धिमांस्तथा । बभूवुः कवयस्तस्य वामनाद्याश्च मन्त्रिणः ॥ ४९७ यदि यह विचार मान लिया जाय तो आचार्य आनन्दवर्धन का, जिनका समय नवम शताब्दी के अन्तिम चरण में निश्चित माना गया है, मनोरथ का समकालीन होना असम्भव है। दूसरे यह कि अवन्तिवर्मा के समय आचार्य आनन्दवर्धन कवि के रूप में प्रसिद्ध थे, ध्वन्यालोक उनकी निश्चित रूप से अनेक काव्य-रचनाओं के पश्चात् की कृति है, जैसा कि उसमें उद्धृत उनकी काव्य-रचनाओं के नाम तथा श्लोकों से अवगत होता है। इस प्रकार कितना भी मनोरथ का जीवनकाल अधिक होगा, आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' के निर्माणकाल तक उसे पहुँचाना हास्यास्पद होगा। इस प्रकार जाकोबी महाशय और म० म० काणे के अनुसार वृत्तिकार आनन्दवर्धन के पूर्व किसी ध्वनिकार (मूल कारिकाओं के रचयिता) का होना प्रमाणित होता है। किन्तु 'ध्वन्यालोक' के 'मनोरथ' को जयापीड के समकालिक 'मनोरथ' से अभिन्न स्वीकार करने में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है, बल्कि इसके विपरीत यह तथ्य उद्धृत किया गया है कि प्रायः 'लोचन' में वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' भी कहा गया है१ (और कारिकाकार को मूल ग्रन्थकार), इस स्थिति में जब लोचनकार 'ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' लिखते हैं तब निश्चित ही उनका संकेत वृत्तिकार आनन्दवर्धन से है। इसका स्पष्टीकरण डॉ० सुशीलकुमार डे ने अपने अलङ्कार-शास्त्र के इतिहास के अध्ययन में प्रस्तुत किया है। डॉ० डे के अनुसार इस कठिनाई के निराकरण के लिए दो बातें माननी होंगी—१. कि कल्हण ने, जैसा कि पिशेल तर्क करते हैं, जयापीड-ललितापीड के राज्यकाल में मनोरथ को निर्दिष्ट करते हुए गलती की है, अथवा २. कि अभिनवगुप्त ने कारिकाकार को वृत्तिकार के साथ गड़बड़ा दिया है। अस्तु, कल्हण की मनोरथ के मूल किसी ध्वनिकार के समकालिक होने की कल्पना निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं की जा सकी है। अतः इस आधार को दृढ़ नहीं कहा जा सकता। हम ऊपर कह चुके हैं कि लोचनकार के भेदक उल्लेखों के आधार पर ही ध्वन्यालोक के कारिका भाग को भिन्नकर्तृक समझने का झगड़ा खड़ा हुआ और इसी आधार पर ही यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न म० म० काणे आदि विद्वानों ने किया कि केवल अभिनवगुप्त ही दोनों ग्रन्थों को भिन्न और भिन्नकर्तृक नहीं मानते थे, बल्कि अभिनवगुप्त ने यह भी दिखाने का प्रयत्न किया है कि स्वयं वृत्तिकार भी कारिकाकार को अपने से भिन्न समझ कर लिखते हैं, जब कि सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को आनन्दवर्धनकृत मानने वाले वाले विद्वानों के अनुसार लोचनकार अभिनवगुप्त के भेदसाधक उल्लेख वस्तुतः अपने व्याख्यानों को सुगम करने के लिए हैं ('In order to faciliate १. 'आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम तेन स एवानन्दवर्धनाचार्य एतच्छास्त्रद्वारेण०' (पृ० ४१); 'समासोक्त्याक्षेपयोरेकमेवोदाहरणं व्यतरद् ग्रन्थकृत' (पृ० ११५); 'एवमभिप्रायद्वयमपि साधार- णोक्त्या ग्रन्थकृत्यरूपयत्' (पृ० ११७); 'अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन०' (पृ० १६६)।

(( २८ ))

his coments')। और डॉ० मुकर्जी समझते हैं कि कारिकाकार को वृत्तिकार से भिन्न समझने का विश्वास परम्परागत हो गया है। जो भी हो, ध्वन्यालोक के सम्बन्ध में यह विवाद अब तक किसी उभयसम्मत तर्क के अभाव में समाप्त नहीं हुआ है। (१) म० म० काणे ने 'लोचन' के जिन अंशों को उद्धृत किया उनमें द्वितीय, षष्ठ और सप्तम अंशों को वे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। द्वितीय अंश (पृ० १७३) का प्रसंग यह है कि प्रथम उद्योत में वृत्तिभाग में ध्वनि के दो भेदों (अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य) की चर्चा की गई है (पृ० १४३), कारिका भाग में इनका निर्देश नहीं है। और, द्वितीय उद्योत के आरम्भ में प्रथम कारिका में ध्वनि के प्रथम भेद को दो प्रभेदों में विभक्त किया गया है। अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी अभिनवगुप्त के निरूपण को पृथक् करके, इससे समझते हैं कि कारिका प्रथम उद्योत में दिए गए विभाग को पहले से मानती है और साथ ही मुकर्जी साहब इस अनुमान को स्वाभाविक बताते हैं कि कारिकाकार वृत्तिकार से अभिन्न हैं। दूसरे शब्दों में, ग्रन्थकार वृत्ति और कारिका को एक दूसरे से भिन्न नहीं करते हैं। यही कारण है कि द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका में एकाएक अविवक्षितवाच्य का भेद ही करने लगे, इसके पूर्व कुछ नहीं संकेत किया। यदि हम द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका के अवतरण के रूप में दिए गए आनन्द- वर्धन के निर्देशों की परीक्षा करें तो यह स्पष्ट होगा कि उन्होंने कारिका और वृत्ति को भिन्न नहीं किया है बल्कि प्रथम उद्योत में प्रस्तुत भेद की संगति बैठाते हैं—'इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित (हो चुका) है, उनमें (वहां) अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं (पृ० १७३)।' डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत में 'लोचन' के आधार पर अपने पक्ष की पुष्टि में 'मया वृत्तिकारेण सत्ता' पर अधिक जोर देते हैं और इसका अर्थ करते हैं—'by me in the capacity of वृत्तिकार।' इस प्रकार मुकर्जी साहब के अनुसार आचार्य अभिनवगुप्त 'सत्ता' द्वारा भिन्नकर्तृत्व के बजाय अभिन्नकर्तृत्व का संकेत करते हैं, अन्यथा यह प्रयोग अधिक (redundant) था। इसके विपरीत, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे प्रस्तुत लोचनांश के 'अभिप्राय' और 'कारिका- कार-सम्मत' प्रयोगों को अपने पक्ष की पुष्टि के अनुकूल समझते हैं, उनके अनुसार 'न चैतन्मयोक्तम्, अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह—तत्रेति' इसका अर्थ होगा 'This is not what I, the वृत्तिकार, have stated out of my own head, but I have stated it in accordance with the intention of the author of the Karikas'; 'भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति' (ध्वनि is first of two kinds, and this is also approved of by the कारिकाकार)। यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक हैं तो वृत्तिकार को क्या कहने की आवश्यकता थी कि वे कारिकाकार के अभिप्राय का अनुसरण करते हैं और उन वृत्तिकार ने जो कहा है वह कारिकाकार का सम्मत है। एक ही व्यक्ति जब दो बातें कह रहा है तब 'सम्मति' का प्रश्न नहीं उठता है। इसी प्रकार एक दूसरे प्रसंग में, जहाँ शङ्का होती है कि यदि संघटना गुणों का आश्रय नहीं है तो किस आधार पर ये रहते हैं?, समाधान करते हुए कहा है कि 'प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम्' अर्थात् 'इनका आलम्बन (आश्रय, आधार) प्रतिपादित हो ही चुका है' (पृ० ३४०), इस वृत्ति पर लोचन है 'अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः' अर्थात् (वृत्तिकार का तात्पर्य है

( २६ )

कि) 'हमारे मूल ग्रन्थ के रचयिता द्वारा (प्रतिपादित हो चुका है)।' यहाँ यदि वृत्तिकार कारिका- कार भी होते तो कहते 'मत्कृतकारिकायां०' अर्थात् मेरी कारिका में यह प्रतिपादित हो चुका है । अपने इस मन्तव्य की पुष्टि में म० म० काणे महाशय लोचन के उन स्थलों को उद्धृत करते हैं जिनमें वृत्तिकार ने अपने कहे हुए के सम्बन्ध में 'मया' का प्रयोग किया है, (जैसे, 'उक्तमिति, मयैवेत्यर्थः' पृ० ५२८; 'उक्तमिति संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थः' पृ० ५५५) । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी कारिकाकार से अभिन्न वृत्तिकार को 'मत्कृतकारिकायां' लिखना चाहिए था । अपने निबन्ध में डॉ० मुकर्जी ने विस्तार के साथ यह सिद्ध किया है कि 'लोचन' में जो कारिकाकार और वृत्तिकार को पृथक् निर्देश किया गया है वह एक नियम का विषय है, जिससे च्युत होना अक्षम्य अपराध माना जाता था। म० म० काणे जानना चाहते हैं कि यह नियम उन्होंने कहाँ पाया, जिसे वे इतनी सशक्त भाषा में प्रस्तुत करते हैं। डॉ० कृष्णमूर्ति डॉ० मुकर्जी के विचार से पूर्णतया सहमत हैं। इन दोनों डॉक्टरों से काणे महोदय यह प्रार्थना करते हैं कि वे अपने विस्तृत अध्ययन से कम से कम एक भी स्थल निर्देश करें जहाँ सूत्र या कारिका तथा उस पर वृत्ति एक ही व्यक्ति द्वारा लिखे गए हैं और टीकाकार 'प्रतिपादितमिवैषामालम्बनं' जैसे वृत्ति-ग्रन्थ का व्याख्यान 'अस्मन्मूल- ग्रन्थकृता' से करता है। म० म० काणे इस 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता' के निर्देश को एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक अंश मानते हैं, क्योंकि 'लोचन' में कहीं भी 'ग्रन्थकृत' शब्द का प्रयोग कारिकाकार के लिए असन्दिग्ध रूप से नहीं हुआ है। मेरे विचार में यद्यपि इस विवाद का इतने निर्देश मात्र से निराकरण नहीं होता है, क्योंकि अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी जिस भेद को 'Matter of form' समझते हैं, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे उसे ही अपना साधक प्रमाण समझते हैं, फिर भी 'लोचन' का 'अस्मत्' प्रयोग एक निर्णय की ओर अवश्य अनुधावन करता है और यह सही है कि 'ग्रन्थकार' का प्रयोग 'लोचन' में केवल वृत्तिकार के लिए आया है। ('ग्रन्थकृत्समकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' इस अंश में प्रयुक्त 'ग्रन्थकार' शब्द सन्दिग्ध है, क्योंकि 'मनोरथ' कवि को निश्चित रूप से नहीं कहा जा सका है कि वह जयापीड़-ललितापीड़ के समय का मनोरथ था) । म० म० काणे अपने पक्ष के साधक प्रमाण के रूप में ध्व० के मंगल-श्लोक 'स्वेच्छाकेसरिणः०' को उद्धृत करते हैं, जिसे 'लोचन' में 'वृत्तिकार' का कहा गया और प्रथम कारिका 'काव्यस्यात्मा०' को 'आदिवाक्य' कहा गया है। काणे महाशय के अनुसार यदि कारिका और वृत्तिग्रंथ का कर्ता एक है तो 'लोचन' ने मङ्गल-श्लोक को 'कारिकाकार' अथवा 'ग्रंथकार' शब्द के साथ क्यों नहीं सूचित किया ? और यह अनेक स्थलों से विदित होता है कि 'ग्रंथकार' शब्द से लोचनकार का अभिप्राय वृत्तिकार से है और वह भी आनन्दवर्धनाचार्य से (आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम । तेन स आनन्द- वर्धनाचार्य एतच्छास्त्र०, पृ० ४१) । (२) सप्तम अंश 'दर्शितमेवाग्रे०' (पृ० ३४७) है, इसे आचार्य आनन्दवर्धन ने 'औचित्य के (अ) त्याग' के सम्बन्ध में विचार करते हुए लिखा है। तात्पर्य यह कि 'इसे आगे (ऊपर) दिखा चुके हैं' (Has been dealt with), इस पर व्याख्यान करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं 'कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः' अर्थात् कारिकाकार ने इसे दिखा दिया है, इसी कारण यहाँ 'भूतकाल' का प्रयोग है, (भविष्य का नहीं)। काणे महाशय का कहना है कि यदि कारिका और वृत्ति दोनों ग्रन्थ एक ही व्यक्ति की कृतियाँ होतीं तो 'दर्शितं' के स्थान पर वृत्तिकार को 'दर्शयिष्यते'

( ३० ) लिखना चाहिए था, क्योंकि आगे 'विभावभावानुभाव०' ( ३।१० ) इत्यादि कारिकाओं में उक्त विषय की चर्चा मिलती है। किन्तु यहाँ 'भूतकाल' के प्रयोग से यही विदित होता है कि कारिकाएँ अन्य प्राचीन की रचना हैं और ठीक ही वृत्तिकार के पहले की हैं। काणे महोदय की इस व्याख्या से डॉ० मुकर्जी बिलकुल सहमत नहीं हैं, क्योंकि जब वृत्तिकार व्याख्यान के नियमानुसार स्वयं भिन्न रूप से निर्देश करते हैं तो काणे महोदय का यह कहना कि दोनों के अभिन्न होने की स्थिति में भविष्यत्काल 'दर्शयिष्यते' का प्रयोग होता, प्रमाणित न करने योग्य (unjustifiable) है। काल के प्रयोग पर आधारित तर्क पूर्णरूप से अनिर्णायक है ( absolutely incon- clusive )। डॉ० मुकर्जी का विचार है कि आनन्दवर्धन ने अनेक स्थलों में भविष्यत्काल का प्रयोग किया है, जो कि आगे की कारिका में कहा गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह निर्देश वृत्तिग्रन्थ के लिए है, कारिका के लिए नहीं। डॉ० मुकर्जी ने वृत्तिग्रन्थ के भविष्यत्काल के अनेक प्रयोगों को उद्धृत किया है—( १ ) स ह्यर्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तं वस्तुमात्रमलङ्काररसादयश्चेत्य- नेकप्रभेदप्रभिन्नो दर्शयिष्यते ( पृ० ५१ ); ( २ ) द्वितीयोऽपि प्रभेदो वाच्याद्विभिन्नः सप्रपञ्चमग्रे दर्शयिष्यते ( पृ० ७६ ); ( ३ ) वाच्येन त्वस्य सहैव प्रतीतिरित्युग्रे दर्शयिष्यते ( पृ० ८४ ); ततो- ऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः ( पृ० १०५ )। 'दर्शयिष्यामः' यह उत्तमपुरुष का प्रयोग महत्त्व का है। किन्तु म० म० काणे महाशय ने इन स्थलों को आगे के वृत्तिग्रन्थ के लिए ही निर्देश के रूप में समझाने का प्रयत्न किया है, जैसा कि प्रथम उद्धरण किसी कारिका के निर्देश के रूप में नहीं है, क्योंकि ऐसी कोई भी कारिका नहीं जो ध्वनि को वस्तु आदि तीन भागों में विभक्त करती हो। दूसरा उद्धरण भी वृत्तिग्रन्थ के लिए ही है, जैसा कि 'सप्रपञ्चं' शब्द स्पष्ट करता है। तृतीय उद्धरण का भी, ३।४१, ४२ कारिकाओं की वृत्ति के रूप में विस्तार से व्याख्यान है और वृत्तिकार ने वहाँ स्वयं कुछ अपने श्लोक दिए हैं। डॉ० मुकर्जी का पक्ष यहां उनके बहुत कुछ निर्णीत सिद्धान्त, कि कारिका और वृत्ति का पृथक्करण 'Formal' है, पर आधारित है, किन्तु यहां काणे महाशय युक्तिसंगत तर्क देते हुए प्रतीत होते हैं। किन्तु ऐसा क्या सम्भव नहीं कि आनन्दवर्धन ने कारिकाओं का निर्माण करने के पश्चात् उस पर वृत्ति लिखी और इस प्रकार 'दर्शितमेवाग्रे' का भूतकालिक प्रयोग किया ? डॉ० मुकर्जी ने अपने निबन्ध में 'न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्' ( लो० पृ० १७३ ) पर विचार करते हुए 'उत्सूत्रव्याख्यान' की चर्चा की है, उनके अनुसार 'वृत्ति' का तरीका यह है कि जो कुछ मूल ग्रन्थ में बिना सन्देह के कहा है उसका व्याख्यान करना और मूल के विरुद्ध वस्तु सूचित करना भाष्य के नियमों के अपराध ( offence ) है। इस 'अपराध' को पारिभाषिक रूप से 'उत्सूत्रव्याख्यान' कहा जाता है। यह अपराध वृत्तिकार के लिए अक्षम्य माना जाता है। मूलकार और वृत्तिकार दोनों भिन्न हों अथवा अभिन्न, सूत्र या कारिका के अनुसार ही वृत्तिग्रन्थ को होना चाहिए। 'यो हि उत्सूत्रं कथयेन्नादो गृह्येत' ( महाभाष्य ), 'सूत्रेष्वेव हि तत्सर्वं यद् वृत्तौ यच्च वार्तिके' ( नागेश ), इनसे भी 'उत्सूत्रव्याख्यान' अपराध प्रमाणित होता है। भाष्य या वृत्तिग्रन्थ को अधिकार नहीं, कि वह उन तत्त्वों का भी निरूपण करे जो सूत्र या कारिका से सम्बन्ध नहीं रखते। मुकर्जी साहब के अनुसार यदि वृत्ति का कर्ता मूल ग्रन्थ के कर्ता से अभिन्न होता है, तो वह स्वयं को मूलकार से भिन्न व्यक्ति के रूप में निश्चित रूप से प्रकट करता

( ३१ )

है और मूलकार को 'अन्य पुरुष' (Third person) में सूचित करता है। इस प्रकार प्रस्तुत आलोच्य ग्रन्थ ध्वन्यालोक में भी कारिकाकार और मूलकार के अभिन्न होने की स्थिति में भी 'उत्सूत्रव्याख्यान' से बचने का निर्देश 'लोचन' में आचार्य अभिनवगुप्त ने वृत्तिकार के अभिप्राय से किया है। इस प्रकार डॉ० मुकर्जी के अनुसार वे सभी अन्तःप्रमाण, जो मूल या वृत्ति में व्यक्तिगत (Personal) भेद के तात्पर्य के हैं इन rules of the game के विरुद्ध एक 'अपराध' समझे जायेंगे। किन्तु म० म० काणे महाशय इस कथन के सर्वथा भिन्न विचार प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि 'वृत्तिकार' के लिए ऐसा कोई प्राचीन नियम नहीं है जिसका उल्लङ्घन एक 'अपराध' हो। जैसा कि ध्वन्यालोक के लगभग सौ वर्ष पूर्व वामन ने कहा है कि उन्होंने सूत्र और वृत्ति दोनों लिखे हैं। हेमचन्द्र ने भी ऐसा ही किया है। 'कौटिलीय' के अन्त में यह प्रसिद्ध है—'स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ।' इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ग्रन्थकार के विरुद्ध कोई ऐसी मनाही नहीं है कि वह कहे कि स्वयं उसने सूत्र और वृत्ति दोनों को निबद्ध किया है, जब कि वह स्वयं को वृत्ति में 'अन्यपुरुष' में कहता है तो, भिन्न व्यक्ति (जैसे अभिनवगुप्त) को क्यों यह कहने से रुकावट होगी कि कारिका और वृत्ति के कर्ता भिन्न हैं अथवा अभिन्न ? इस प्रकार काणे महाशय के विचार में यह सब कुछ आधारहीन है, क्योंकि उनकी दृष्टि में 'rules of the game' कोई हैं ही नहीं जिनके आधार पर भिन्न प्रतीत होते हुए कारिका और वृत्ति के कर्ताओं को अभिन्न समझा जाय। जिस प्रकार वामन, हेमचन्द्र, कौटिलीय से सिद्ध हो जाता है कि उनके मूलकार और वृत्तिकार एक हैं वैसी स्थिति यहां नहीं है, लोचन ने तो सर्वत्र दोनों को भिन्न ही प्रतिपादित किया है। डॉ० के० सी० पाण्डेय का मत है कि नवीं शताब्दी में कश्मीर में ऐसा चल पड़ा था कि एक ही व्यक्ति कारिका और उस पर वृत्ति का कर्ता हुआ करता था। इस विचार से भी काणे महाशय सहमत नहीं, क्योंकि ध्वन्यालोक में दोनों के अभिन्नकर्तृत्व का निर्देश हुआ होता, जैसा कि अन्यत्र स्पष्ट शब्दों में प्राप्त होता है। फिर प्रश्न उठता है कि क्यों लोचनकार ने आरम्भ में ही नहीं निर्देश किया कि कारिकाकार और वृत्तिकार एक हैं, जब कि उन्होंने 'विमर्शिनी' में ऐसा किया है? इससे निश्चित है कि यदि ऐसी परिस्थिति होती कि दोनों एक हैं तो पहले ही यह स्पष्ट कर देते ताकि शिष्यों को भ्रम न हो। ऊपर उद्धृत तृतीय अंश 'उक्तमेव ध्वनिस्वरूपं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदती- त्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति' (पृ० ३०९) को ध्वन्यालोक के भिन्नकर्तृत्व की सिद्धि में विशेष सहायक समझा गया है, क्योंकि वृत्तिकार, लोचन के अनुसार 'यतश्च' के द्वारा इस अभिप्राय से उपस्कार (Supplement or embelishment) देते हैं कि कारिकाकार... अनुवाद करते हैं। यदि वृत्तिकार कारिकाकार से अभिन्न होते तो कारिकाकार के कथन का उपस्कार देने की उन्हें आवश्यकता क्यों होती। अभेदवादी विद्वान् कहते हैं कि ग्रन्थकार ने कारिकाओं के आरम्भ में मङ्गल-श्लोक नहीं लिखा और वृत्ति का आरम्भ करते हुए लिखा, इससे यही लगता है कि जब वृत्तिग्रन्थ में मङ्गल सम्पन्न हो गया तब कारिकाग्रन्थ में उसकी आवश्यकता न हुई, यदि वृत्तिकार से कारिकाकार कोई भिन्न व्यक्ति था तो अवश्य ही वह कारिकाओं का आरम्भ करते हुए मङ्गल-श्लोक लिखता !

इस तर्क के विरुद्ध म० म० काणे का कहना है कि प्राचीन ग्रन्थकारों के यहाँ मङ्गल की प्रथा नित्यरूप से मान्य नहीं थी, जैसा कि जैमिनि-सूत्रोंपर शाबर के भाष्य के आरम्भ में, वेदान्त-सूत्रों पर शङ्कराचार्य के भाष्य के आरम्भ में, नाट्य-सूत्रों पर वात्स्यायन के भाष्य में और उद्योतकर के न्याय- वार्तिक में मङ्गल नहीं है। जहाँ एक ही व्यक्ति सूत्र या कारिका और वृत्ति का कर्ता है वहाँ यह प्रवृत्ति अधिक है । वामन ने अपने सूत्रों में मङ्गल नहीं किया, किन्तु वृत्ति के आरम्भ में किया ! मम्मट ने काव्यप्रकाश के आरम्भ में मङ्गल-कारिका रखी, किन्तु वृत्ति में नहीं । उद्भट ने अपना अलङ्कार-ग्रन्थ बिना मङ्गल के आरम्भ किया है । अलङ्कारसर्वस्व में सूत्रों में मङ्गल नहीं है, किन्तु वृत्ति में है। हेमचन्द्र ने अपने सूत्र और अपनी वृत्ति सौदामिनी दोनों में मङ्गल रखा है। कोई विशेष नियम उल्लिखित नहीं है। जैसा कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी के आरम्भ में प्रथम सूत्र में ‘वृद्धि’ का प्रयोग किया उसी प्रकार यहाँ ‘काव्यस्यात्मा’ का प्रयोग करते हुए मङ्गल किया गया है। हम समझते हैं कि मङ्गलश्लोक के होने या न होने के आधार पर कारिकाकार और वृत्तिकार के भेदाभेद- निर्णय को कोई गति नहीं मिलती है।

मुकुलभट्ट और प्रतीहारेन्दुराज के प्रमाणों के आधार पर म० म० काणे का निर्णय है कि 'सहृदय' नाम के किसी व्यक्ति ने ध्वनि-कारिकाओं का निर्माण किया था, जिस पर आनन्दवर्धन ने वृत्ति लिखी । 'अभिधावृत्तमातृका' में मुकुल लिखते हैं—'लक्षणामागौवगाहित्वं तु ध्वनेर्नूतनतयो- पर्वाणितस्य विद्यत इति दिशमुन्मीलयितुमिदमत्रोक्तम्' (पृ० २१); 'तथा हि तत्र विवक्षितान्यपरता सहृदयैः काव्यवर्त्मनि निरूपिता' (पृ० १९)। मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज कहते हैं—'ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्लादिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दव्यापारास्पृष्टत्वेन प्रतीयमानैकरूपस्यार्थस्य सद्भा- वस्त्रत्र तथाविधार्थाभिव्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृदयैर्ध्वनिनाम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः' इन उद्धरणों के सम्बन्ध में अभिन्नकर्तृकत्ववादी पण्डितों का कहना है कि 'सहृदय' प्रयोग व्यक्तिपरक नहीं है, बल्कि ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन को सूचित करता है, क्योंकि लोचनकार ने भी आनन्दवर्धन को 'सहृदयचक्रवर्ती' कहा है (पृ० ४२)। किन्तु अपने मन्तव्य की पुष्टि में म० म० काणे महाशय लिखते हैं कि ऐसी प्रवृत्ति मालूम होती है कि प्राचीन ग्रन्थकारों को एकवचन में निर्देश किया गया है जब कि समसामयिक अथवा कुछ पूर्व के ग्रन्थकारों का निर्देश बहुवचन में किया गया है। उदाहरण के लिए, मम्मट ने भरत (मुनि), रुद्रट और ध्वनिकार को प्रथमपुरुष में निर्देश किया है जब कि अभिनवगुप्त को बहुवचन में करते हैं। इसी आधार पर मुकुल, जो आनन्द के बाद के हैं, किन्हीं 'सहृदय' को बहुवचन में निर्देश करते हैं। स्वयं आनन्दवर्धन ने उद्भट आदि को, जिनसे काव्य के आत्मा के सम्बन्ध में उनका पूर्ण मतभेद था, बहुवचन में सम्मानित किया है (तत्रभवद्भिर्भट्टोद्भटादिभिः, २।२६)। किन्तु काणे महाशय का यह पक्ष अपने आप में सर्वथा दुर्बल है, क्योंकि यह बिलकुल सम्भावना पर आधारित है। मुकुल ने अथवा प्रतीहारेन्दुराज ने कारिकाकार को ही 'सहृदय' कहा है, आनन्दवर्धन को नहीं (जब कि लोचन के अनुसार आनन्दवर्धन भी सहृदय-चक्रवर्ती थे), इसमें कोई विनिगमक प्रमाण नहीं है, साथ ही, लोचन में आनन्दवर्धन को 'शास्त्रकार' भी कहा गया है (पृ० ६७), इसका संकेत यही है कि ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन ही ध्वनिशास्त्र के प्रवर्तक हैं। पण्डितराज ने भी ध्वनिकार को 'आलङ्कारिकसरणिव्यवस्थापक' कहा है। और बहुवचन प्रयोग से ऐसा भी

( ३३ ) अनुमान लगाना युक्तिसंगत नहीं कि सहृदयों की मण्डली (circle) ने कारिकाओं का निर्माण किया था । डॉ० कृष्णमूर्ति ने लोचन से उन अंशों को उद्धृत किया है जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार का अभेद प्रतीत होता है—(१) ‘एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं प्रपञ्च- यितुमाह यस्त्विति’ (पृ० ३२७); (२) ‘एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं तत्र का वार्तेति निरूपयितुमाह प्रधानेत्यादिना कारिकाद्वयेन’ (पृ० ५२५) । इन दोनों स्थलों में क्रमशः ‘व्याख्याय’ और ‘निरूप्य’ ये ल्यबन्त प्रयोग कारिकाकार और वृत्तिकार के अभिन्न होने का निर्देश करते हैं । क्योंकि जिस व्यक्ति ने कारिका का व्याख्यान किया उसने ही कारिका में असंगृहीत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का प्रपञ्च करने के लिए कहा—‘यस्तु०’ इत्यादि । दूसरे उद्धरण की भी यही स्थिति है । परन्तु म० म० काणे का कहना है कि यहाँ, कारिका वृत्ति का भाग हो गई है तथा ‘व्याख्याय’ और ‘निरूप्य’ शब्द वृत्तिकार को सूचित करते हैं तथा ‘आह’ भी उन्हें ही सूचित करता है, क्योंकि वृत्तिकार ने ‘यस्तु०’ कारिका के प्रमाण एवं व्याख्यान द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का निरूपण आरम्भ किया है । दूसरे यह कि कोई यह नित्य नियम नहीं है कि एक वाक्य में ल्यबन्त का और प्रधान क्रिया का कर्ता एक ही होना चाहिए । जैसा कि महाकवि कालिदास आदि ने इस नियम को नहीं माना है—‘अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति । मत्प्रसूतिमनाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा ॥’ (रघु० १।७७); किरातार्जुनीय ३।२१, तीसरे यह कि जब कि ऊपर निर्दिष्ट आठ अंश भिन्नकर्तृकत्व सिद्ध कर चुके हैं तब ये दो अंश उस प्रकार अभेद सिद्ध नहीं करते हैं । अन्त में, कारिकाकार और वृत्तिकार अभिनवगुप्त से पहले पहचाने जा चुके हैं, ऐसी स्थिति में अभिनवगुप्त ने दोनों के भेद के बारे में बात दुहराई नहीं है । हम मानते हैं कि काणे महाशय का मत बहुत अंश में तर्कसमन्वित है, किन्तु जिनके विचार से दोनों का लोचन में भेद formal अथवा व्याख्यान के स्पष्टीकरणार्थ है उनके लिए ये दोनों उद्धरण अपने स्वाभाविक अर्थ में अनुपेक्षणीय नहीं हैं । अभिन्नकर्तृकत्ववादी विद्वान् अभिनवगुप्त की भरत मुनि के नाट्यशास्त्र पर लिखी व्याख्या ‘अभिनवभारती’ से कुछ अंश अपने मत की पुष्टि में उद्धृत करते हैं, जैसा कि अभिनवगुप्त ने वहाँ लिखा है— “स्वशब्दानभिधेयत्वं हि रसादीनां ध्वदिकारादिभिर्दर्शितम् । तच्च मदीयादेव तद्- विवरणात् सहृदयालोकलोचनादवधारणीयमिह तु यथावसरं वक्ष्यत एव” (भरत, अध्याय ७, भाग १ पृ० ३४४); “एतमेवार्थं सम्यगानन्दवर्धनाचार्योऽपि विविच्य न्यरूपयत् । ‘ध्वन्यात्मभूते०’ (ध्व० २।१७) इत्युक्त्वा क्रमेण ‘विवक्षा तत्परत्वेन०’ (ध्व० २।१८) इत्यादिना ग्रन्थसन्दर्भेण सोदाहरणेन । तच्चास्माभिः सहृदयालोकलोचने तद्विवरणे विस्तरतो व्याख्यातमिति ।” (भरत, १६, भाग २. पृ० २९९-३००) इन अंशों में प्रथम में वृत्तिग्रन्थ के रचयिता को ‘ध्वनिकार’ कहा गया है और ध्वन्यालोक का प्राचीन नाम ‘सहृदयालोक’ अवगत होता है । कुछ पाण्डुलिपियों की पुष्पिकाओं में तथा राघवभट्ट ३ ध्व० भू०

( ३४ ) द्वारा ध्वन्यालोक का नाम 'सहृदयहृदयालोक' भी निर्देश किया गया है। दूसरे अंश में स्पष्ट ही आनन्दवर्धनाचार्य का नाम लेकर कारिकाग्रन्थ को उनके कथन के रूप में निर्देश किया गया है। इस पर भिन्नकर्तृत्व पक्ष से म० म० काणे महाशय का कहना है कि जैसा कि उपर्युक्त अंश से विदित होता है अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती को लोचन के पश्चात् लिखा था। लोचन में अभिनवगुप्त के मान्य गुरु थे इन्दुराज, जिनकी व्याख्याओं का लोचनकार ने पूर्ण रूप से अनुसरण किया है तथा नाट्यशास्त्र का अध्ययन उन्होंने भट्टतौत से किया था, जैसा कि अभिनवभारती की प्रस्तावना के पद्य से एवं और भी स्थलों से प्रतीत होता है तथा अभिनवगुप्त ने भट्टतौत-रचित 'काव्यकौतुक' नाम के ग्रन्थ पर 'विवरण' लिखा था, यह लोचन से विदित होता है (पृ० ४३४)। इसलिए यह सम्भव है कि अभिनव कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में अपने गुरु भट्टतौत का विचार साधारणतः प्रस्तुत किया है, क्योंकि बाद के सभी ग्रन्थकारों ने कारिकाकार और वृत्ति- कार को अभिन्न समझा है। म० म० काणे का पक्ष यहाँ कुछ दुर्बल लगता है, क्योंकि वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि ध्वन्यालोक की कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में विवाद अभिनवगुप्त के पहले से चल रहा है, किन्तु मैं नहीं समझता कि यह विवाद प्राचीन है, बल्कि जब से डॉ० वूहलर ने लिखा और काव्यमाला के सम्पादकों ने दोनों को भिन्न मान लिया तभी से यह विवाद चल पड़ा है। 'मया वृत्तिकारेण सता' (लो० पृ० १७३) इस अंश पर डॉ० मुकर्जी के अनुसार काणे महाशय ने ठीक ध्यान नहीं दिया है। डॉ० मुकर्जी ने इसका अनुवाद किया है 'by me, in the capacity of vṛttikār'। काणे महाशय का कहना है कि यदि कोई अपना दिमाग पूर्ण रूप से बना ले कि कारिका और वृत्ति के कर्ता अभिन्न हैं, तब केवल यह अनुवाद ठीक हो सकता है। (capacity) के लिए मूल में कोई शब्द नहीं है। शाब्दिक अनुवाद (Literal trans- lation) है—'by me who am वृत्तिकार'। म० म० काणे महाशय प्रस्तुत प्रकरण के 'अभिप्राय' और 'सम्मत' प्रयोगों पर विशेष ध्यान देते हैं और इन्हें अपने पक्ष भिन्नकर्तृत्व के अनुकूल मानते हैं। (चौ० काशी संस्करण में 'न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्' पाठ है, किन्तु इस काव्य- माला सं० में 'उत्सूत्रं' का प्रयोग नहीं मिलता, जो तीन प्रतियों पर आधारित है, काशी संस्करण का आधार विदित नहीं)। तृतीय उद्योत के आरम्भ का वृत्तिग्रन्थ इस प्रकार है—"एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जकमुखेन तत्प्रकाश्यते।" इस पर लोचन का अंश है—"यस्तु व्याचष्टे व्य- ङ्ग्यानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन' इति स एवं प्रष्टव्यः—एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम्। वृत्तिकारेण तु दर्शितम्। न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति। ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृता भवति। अविवक्षितवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनसगोत्रैः साकं विवादेन।" (पृ० ३१२) वृत्तिग्रन्थ में यह कहा गया है कि व्यङ्ग्य के प्रकार से (व्यङ्ग्यमुखेन) ध्वनि का प्रभेदों- सहित स्वरूप दिखाया जा चुका, फिर व्यञ्जक के प्रकार से (व्यञ्जकमुखेन) उसे प्रकाशित करते हैं। लोचन के अनुसार लोचन के पहले लिखी हुई 'चन्द्रिका' व्याख्या में 'व्यङ्ग्यमुखेन' का अर्थ

( ३५ )

किया है, वस्तु, अलङ्कार और रस इन तीन व्यङ्ग्यों के प्रकार से । लोचनकार इस व्याख्यान पर आपत्ति करते हैं तथा प्रश्न करते हैं कि इन तीन भेदों को वृत्तिकार ने निर्देश किया है, कारिकाकार ने नहीं । फिर अब वृत्तिकार भेद का प्रकाशन नहीं कर रहे हैं । जब कि कर्ता का भेद है (कारिका- कार और वृत्तिकार को भिन्न मानते हैं) तो यह कहने में क्या सङ्गति है 'कि (वृत्तिकार) यह कर चुके हैं और (कारिकाकार) यह कर रहे हैं ? म० म० काणे को यह स्पष्ट है कि चन्द्रिकाकार कर्तृभेद का विचार रखते थे, और लोचन का कहना है कि 'व्यङ्ग्यमुखेन' का जो व्याख्यान 'चन्द्रिका' ने किया है उसकी सङ्गति नहीं बैठती । जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या नहीं मिल जाती, इसे स्पष्ट रूप से कहना सम्भव नहीं कि चन्द्रिका- कार कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानते थे अथवा अभिन्न । डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत वृत्तिग्रन्थ के लोचन व्याख्यान को क्लिष्ट एवं गलत समझते हैं और 'चन्द्रिका' के व्याख्यान को बहुत कुछ सन्तोषजनक एवं दृढ़ (consistent) मानते हैं । क्योंकि ऐसा नहीं कि वस्तु, अलङ्कार और रस का विभाग कारिका में नहीं हुआ है, बल्कि २।३ कारिका में रस ध्वनि का निर्देश है, २।२१ में शब्दशक्त्युद्भव पर आधारित अलङ्कारध्वनि पर विचार किया है, २।२२-२४ कारिकाओं में वस्तु- ध्वनि का निरूपण किया गया है । ऐसी स्थिति में अभिनवगुप्त का यह कहना कि ये तीनों व्यङ्ग्यभेद केवल वृत्तिकार ने किया है, कारिकाकार ने नहीं, सङ्गत नहीं । और, डॉ० मुकर्जी के अनुसार अभिनवगुप्त यह भूल गए हैं कि वृत्तिकार एक भी वस्तु प्रस्तुत नहीं कर सकते जो कारिकाकार की अभिप्रेत अथवा उनकी पोषित नहीं है । अन्यथा व्याख्यान 'उत्सूत्र' होगा । डॉ० मुकर्जी के इस विचार से डॉ० कृष्णमूर्ति सहमत नहीं हैं । यद्यपि डॉ० मुकर्जी ने अपने निबन्ध में 'कर्तृभेदे' के कर्ता को ग्रन्थकार ही माना था किन्तु अब उन्होंने 'Indian Culture' (भाग १२, पृ० ५७- ६०) में दूसरी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसमें कर्तृ का अर्थ है केवल कर्ता (grammatical agent of an action), न कि ग्रन्थ का कर्ता । अस्तु, यह मानते हुए कि 'कर्तृभेदे' का अर्थ अभी तक कोई स्थिर रूप से नहीं प्रस्तुत किया जा सका है, फिर हम विद्वानों पर ही इसका निर्णय छोड़ते हैं । वृत्तिग्रन्थ में 'परिकरश्लोक', 'संग्रहश्लोक' और 'संक्षेपश्लोक' के साथ और 'तदयमत्र परमार्थः', 'तदिदमुक्तं', और 'तदिदमुच्यते' के साथ अनेक श्लोकों को प्रस्तुत किया गया है । जिनमें बहुत से श्लोक कुछ कारिकाओं से अधिक अर्थगर्भित हैं । म० म० काणे महाशय का कहना है कि यदि दोनों (कारिकाकार और वृत्तिकार) अभिन्न हैं तो क्यों उस व्यक्ति ने उन उत्तम श्लोकों को कारिकाओं में न रख कर वृत्ति में अप्रधान स्थिति में रखा ? काणे महाशय के अनुसार अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी, डॉ० कृष्णमूर्ति और डॉ० के० सी० पाण्डेय में किसी ने इसका सन्तोषजनक व्याख्यान नहीं किया है । आचार्य मम्मट ने जो अपने काव्यप्रकाश के कारिकाकार और वृत्तिकार भी हैं इसी प्रकार वृत्ति में परिकरश्लोक अथवा संग्रहश्लोक क्यों नहीं दिया ? डॉ० कृष्णमूर्ति के अनुसार आनन्दवर्धन ने पहले कारिकाएं लिखीं और अपने शिष्यों को उन्हें पढ़ाया, तब कुछ समय बाद वृत्ति का निर्माण किया । काणे महाशय इसे नहीं मानते, क्योंकि यदि यह माना भी जाय तो लेखक को क्या बाधक हुआ कि उसने इन पद्यों को कारिकाओं के रूप में नहीं लिखा ।

( ३६ ) लोचन के इस वाक्य को भी अभिन्नकर्तृत्व की सिद्धि में उपस्थापित किया जाता है—'प्रक्रा- न्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याशयेन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति' (पृ० २७१)। म० म० काणे इसे भी अभिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि यहाँ भी कारिका वृत्ति का भाग बन गई है। यहाँ लोचन कहता है कि कारिका (२।२३) ने दो प्रकारों (varieties) का निर्देश किया है और वृत्ति ने तृतीय को भी संलग्न कर दिया है। यदि अभिन्नकर्तृकत्व है तो कारिका में क्यों नहीं तीनों का निर्देश किया गया और क्यों वृत्ति उत्सूत्र व्याख्यान के अपराध से युक्त हुई ? किन्तु यदि विचार किया जाय तो यह लगता है कि एक ही कारिका वाक्य से दो प्रकारों का उपसंहार और तृतीय प्रकार का सूचन करता हूँ इस आशय से वृत्तिकार साधारण रूप से अवतरण देते हैं—'तथा च'। अर्थात् 'तथा च' यह वृत्तिग्रन्थ कारिकाग्रन्थ को अपनी कुक्षि में ले लेता है, इसे ही म० म० काणे कारिका का वृत्ति का भाग हो जाना कहते हैं। इतने मात्र से अभिन्नकर्तृकत्व का पक्ष निराकृत नहीं हो जाता है। डॉ० के० सी० पाण्डेय ने प्रश्न उठाया है कि लोचन केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान है अथवा कारिका और वृत्ति दोनों का। इस प्रकार यदि यह सिद्ध हो जाता है कि लोचन दोनों का व्याख्यान है तब दोनों के एककर्तृक मानने में आपत्ति नहीं होगी। किन्तु म० म० काणे लोचन को केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान सिद्ध करते हैं, क्योंकि 'काव्यालोक', जिसके व्याख्यान के लिए लोचनकार प्रवृत्त हैं वह वृत्तिग्रन्थ है न कि कारिकाग्रन्थ। कारिकाग्रन्थ को केवल ध्वनिकारिका या ध्वनि कहते थे। यही कारण है कि लोचनकार ने आरम्भ में वृत्तिग्रन्थ के मङ्गलाचरण के व्याख्यान से 'लोचन' का आरम्भ किया और 'आदिवाक्य' के रूप में प्रथम कारिका का निर्देश मात्र करके उस पर के वृत्तिग्रन्थ के व्याख्यान में लग जाते हैं। हाँ, जहाँ कारिकाग्रन्थ पर वृत्ति बहुत संक्षिप्त है वहाँ लोचन कारिका के कुछ शब्दों का व्याख्यान करता है, किन्तु ऐसे स्थल बहुत कम हैं। साथ ही, काणे महाशय का यह भी तर्क है कि यदि कारिका और वृत्ति एक ही व्यक्ति की रचनाएं हैं तो कारिकाओं के टुकड़े और उनमें वृत्ति का छिटफुट नियोजन समान रूप से होना चाहिए था, किन्तु ऐसी समानता नहीं है, वृत्ति की किसी पाण्डुलिपि में कारिकाएं टुकड़ों में पढ़ी गई हैं और किसी में पूरी कारिकाएँ पढ़ी गई हैं। यद्यपि 'काव्यप्रकाश' में कारिकाएं तोड़-तोड़ कर बीच में वृत्ति के साथ भी रखी गई हैं, तथापि वहाँ ऐसी अव्यवस्था नहीं है। ध्वन्यालोक के अन्त में दो पद्य हैं—'इत्यक्लिष्ट०' और 'सत्काव्यतत्त्व०'। 'इति' पर टिप्पणी करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं—'इतीति कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः', अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। डॉ० मुकर्जी के अनुसार यह टिप्पण सूचित करता है कि अभिनवगुप्त कारिका और वृत्ति को एक व्यक्ति की रचना मानते हैं। दूसरा श्लोक आनन्द- वर्धन को सुधियों के मन में काव्य के चिरप्रसुप्तकल्पतत्त्व को प्रवृत्त करने वाला बताता है, इसका अर्थ है कि आनन्दवर्धन ने ही पहले पहल ध्वनिमार्ग का आलोकन कारिका और वृत्ति द्वारा किया, और भी, ठीक इसी प्रकार तृतीय उद्योत की ४६वीं कारिका के अनुसार जो यह काव्यतत्त्व अस्फुट रूप से स्फुरित था उसका व्याख्यान करने में असमर्थ लोगों ने रीतियों का मार्ग प्रवर्तित किया, दोनों

१. प्रथम उद्योत: ध्वनि-लक्षण, वाच्यार्थ-व्यङ्ग्यार्थ विवेक एवं अभाववाद खण्डन

( ३७ ) बातें सिद्ध करती हैं कि कारिकाकार और वृत्तिकार एक व्यक्ति है और वह हैं आचार्य आनन्दवर्धन । किन्तु म० म० काणे महाशय को भाण्डारकर संस्थान की सभी प्रतियों तथा ध्वन्यालोक के प्राप्त तीनों संस्करणों में 'इत्यक्लिष्ट०' के स्थान पर 'नित्याक्लिष्ट०' मिलता है, जबकि डॉ० डे द्वारा प्रकाशित चतुर्थ उद्योत के लोचन में 'इति' पर टिप्पण मिलता है तब वही सबसे अधिक प्रामाणिक पाठ मानने योग्य है । फिर भी म० म० काणे डॉ० मुकर्जी के विचारों से सहमत नहीं। उनके अनुसार आनन्दवर्धन ने प्राचीन कारिकाग्रन्थ का व्याख्यान किया है, इसका निर्देश 'व्याकरोत्' शब्द ( तद् व्याकरोत् सहृदयोदयलाभहेतोः ) सूचित करता है । कारिका २।५ में 'मे मतिः' की वृत्ति है—'मामकीनः पक्षः' इस पर भी अभिन्नकर्तृकत्ववादियों और भिन्नकर्तृकत्ववादियों का विचार-वैषम्य है। प्रथम के अनुसार यदि कारिकाकार और वृत्तिकार भिन्न होते तो 'मे मतिः' का व्याख्यान 'मामकीनः पक्षः' न करके कुछ भिन्न ही करते, इसके विपरीत दूसरे पक्ष का कहना है कि वृत्तिकार ने केवल यहाँ व्याख्यान के रूप में 'मामकीनः पक्षः' लिखा है, इससे दोनों का अभेद सिद्ध नहीं होता । न्यायमञजरी के रचयिता जयन्तभट्ट ने ध्वनिसिद्धान्त की आलोचना की है । जयन्त अवन्तिवर्मा के, जिनकी सभा में आनन्दवर्धन थे, अव्यवहित उत्तराधिकारी शङ्करवर्मा के समसामयिक थे । वह लिखते हैं— 'यम्मन्यः पण्डितम्मन्यः प्रपेदे कञ्चन ध्वनिम् । विधेर्निषेधावगतिर्विधिबुद्धिर्निषेधतः ॥ यथा — भम धम्मिअ वीसत्थो मा स्म पान्थ गृहं विश । मानान्तरपरिच्छेद्यवस्तुरूपोपदेशिनाम् ॥ शब्दानामेव सामर्थ्यं तत्र तत्र तथा तथा । अथवा नेदृशी चर्चा कविभिः सह शोभते ॥' ( न्यायमञ्जरी, चौ० सं०, भाग १, पृ० ४५ ) डॉ० मुकर्जी के अनुसार यह स्पष्ट है कि जयन्त यहाँ ध्वन्यालोक की वृत्ति ( स हि कदाचिद् वाच्ये विधिरूपे प्रतिषेधरूपः-यथा-भम धम्मिअ०, क्वचिद् वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा—अत्ता एत्थ०, पृ० ५१, ७१ ) का निर्देश करते हैं और समझते हैं कि वह सिद्धान्त एक व्यक्ति द्वारा प्रकाशित किया गया । डॉ० मुकर्जी के यह समझने का आधार इस उद्धरण में प्रयुक्त 'प्रपेदे' शब्द है, जिसका अनुवाद उन्होंने 'propounded' किया है, किन्तु म० म० काणे महाशय के अनुसार अनुवाद होगा—'Restorted to or adopted'। इस प्रकार इनके अनुसार प्रस्तुत उद्धरण का अर्थ होगा ध्वनि का सिद्धान्त पहले से था जिसे एक पण्डितम्मन्य ने स्वीकार किया । श्री काणे ने यह भी सम्भावना की कि जयन्त आनन्दवर्धन के समसामयिक थे, जैसा कि उनके पुत्र अभिनन्द ने कादम्बरीकथासार में कहा है कि जयन्त कर्कोटक वंश के राजा मुक्तापीड के मन्त्री शक्तिस्वामी के परनाती थे ।

( ३८ ) श्री गोडा वर्मा ने कुछ ऐसे कारिका और वृत्ति के विरोधी स्थलों का निर्देश किया है जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने का अनुमान होता है, उनके द्वारा निर्दिष्ट कुछ स्थल काणे महाशय के अनुसार विचारणीय हैं । ( क ) कारिका १।४ ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०’ (पृ० ४७) में वृत्ति ने ‘प्रसिद्ध’ की दो व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं—‘यत्तत्सहृदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धेभ्योऽलङ्कृतेभ्यः प्रतीतेम्यो वाऽवयवेभ्यो व्यतिरिक्तत्वेन प्रकाशते’; ‘लोचन’ का भी निर्देश है—‘प्रसिद्धशब्दस्य सर्वप्रतीतत्वमलङ्कृतत्वं चार्थः’ ( पृ० ४८ ) । यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक व्यक्ति थे तो वह वृत्ति में एक अर्थ करते । ( ख ) कारिका २।१० है—‘समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥’ ( पृ० २२४ ) इसमें ‘सर्वरसान् प्रति’ के अनुसार ‘सर्वसाधारणक्रियः’ का ‘सर्व’ शब्द ‘सर्वरस’ का निर्देशक है, किन्तु वृत्ति में ‘सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च’ है, इस प्रकार दूसरी व्याख्या अनावश्यक है और ( डॉ० मुकर्जी ने जैसा कि कहा है ) ‘उत्सूत्रव्याख्यान’ है । ( ग ) ३।१९ कारिका का उत्तरार्ध है—‘रसंस्य स्याद् विरोध्याय वृत्त्यनौचित्यमेव वा ।’ इसकी वृत्ति में ‘वृत्ति’ शब्द के तीन अर्थ हैं । ( श्री वर्मा के लेख का यह उद्धरण श्री काणे महाशय ने अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है ) । म० म० काणे महाशय ग्रन्थ के नाम के सम्बन्ध में निर्देश करते हैं कि ग्रन्थ की पुष्पिकाओं ( Colophons ) में इसे प्रायः सहृदयालोक, सहृदयहृदयालोक, काव्यालोक, काव्यालङ्कार और ध्वनि कहा गया है । लोचन के आरम्भिक दूसरे पद्य में ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ निर्दिष्ट है ( यत्किञ्चिदप्यनुसरन् स्फुटयामि काव्य;लोकं सुलोचननियोजनया जनस्य ) । लोचन (चतुर्थ उद्योत) के अन्त का द्वितीय श्लोक आनन्दवर्धन के ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ कहता है ( आनन्दवर्धन- विवेकविकासिकाव्यालोकार्थतत्त्वघटनादनुमेयसारम् ) । अभिनवभारती में स्वयं अभिनवगुप्त ने इसे ‘सहृदयालोक’ कहा है । चतुर्थ उद्योत के वृत्तिग्रन्थ के अन्त में ‘काव्याख्येऽखिलसौख्यधाम्नि विबुधो- द्याने ध्वनिदर्शितः’ के अनुसार ‘काव्य’ शब्द मूलग्रन्थ के नाम का भाग है, अथवा स्वयं नाम है, जिस पर आनन्दवर्धन ने वृत्ति लिखी ( सम्भवतः उसे काव्यध्वनि कहा जाता हो अथवा काव्य या ध्वनि ) । ३।४७ कारिका के अनुसार कारिकाएं ‘काव्यलक्षण’ हैं ( वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ) । इस प्रकार वृत्ति को ‘काव्यालोक’ या ‘ध्वन्यालोक’ कहा गया । कहना कठिन है कि ‘सहृदयालोक’ इस ग्रन्थ को कैसे कहा गया । डॉ० सोवानी का विचार है कि ‘सहृदय’ कारिकाओं के रचयिता का नाम है । मुकुल की ‘अभिधावृत्तिमातृका’, जो ‘लोचन’ से लगभग सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी, लक्षणा में ध्वनिमार्ग को अन्तर्भूत करते हुए ‘ध्वनि’ को नूतन रूप से किन्हीं सहृदय द्वारा उपवर्णित बताती है—‘लक्षणामाग्र्गाविगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोपवर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मीलयितुमिद- मत्रोक्तम्’ ( पृ० २१ ); इसी प्रकार मुकुल लिखते हैं—‘तथाहि तत्र विवक्षितान्यपरता सहृदयैः काव्य- वर्त्मनि निरूपिता’ ( पृ० १९ ) । यह स्पष्ट रूप से निर्देश करता है कि जब मुकुल ने ( लगभग ९००–९२५ ई० ) लिखी उस समय ध्वनि नया सिद्धान्त था और ‘सहृदय’ ने उसे प्रतिपादित किया था । इसी प्रकार, मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज कहते हैं—‘ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्ला- दिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दव्यापारास्पृष्टत्वेन प्रतीयमानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभि- व्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृदयैर्ध्वनिर्नाम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः’ ( पृ० ७९ ) । इन उदाहरणों से प्रतीत होता है कि बहुत सम्भव है, सहृदय रचयिता का नाम है

( ३६ ) जिसने ध्वनि सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, अथवा बहुत अधिक सम्भव है कि यह उसके प्रशंसकों की दी हुई उपाधि हो । राजशेखर ने 'आनन्द' का नाम लेते हुए 'काव्यमीमांसा' में 'अव्युत्पत्तिकृतो दोषः०' इस श्लोक को उद्धृत किया है जो ध्वन्यालोक के वृत्तिग्रन्थ का परिकर श्लोक है (पृ० ३४६) । इससे प्रतीत होता है कि ९००-९२५ ई० के लगभग यह सर्वविदित था कि आनन्दवर्धन वृत्ति के रचयिता थे । इससे अभिन्नत्व सिद्ध नहीं होता । जल्हण की सूक्तिमुक्तावली में राजशेखर के नाम से यह श्लोक उद्धृत है— 'ध्वनिनाऽतिगभीरेण काव्यतत्त्वनिवेशिना । आनन्दवर्धनः कस्य नासीदानन्दवर्धनः ॥' इससे प्रतीत होता है कि आनन्दवर्धन ने 'ध्वनि' की स्थापना की । प्रतीहारेन्दुराज के उद्धरणों से विदित होता है कि वह कारिका और वृत्ति दोनों के रचयिता को 'सहृदय' कहते हैं । 'वक्रोक्तिजीवित' ( कुन्तकरचित ) रूढ़िवक्रता के उदाहरण में आनन्दवर्धन के निजी श्लोक 'ताला जाअन्ति गुणा०' (पृ० १७८) को रखा तथा निर्देश किया—'ध्वनिकारेण व्यङ्ग्यव्यञ्जक- भावोऽत्र सुतरां समर्थितः किं पौनरुक्त्येन ।' इस प्रकार वक्रोक्तिजीवित आनन्दवर्धन को 'ध्वनिकार' कहता हैं । 'लोचन' के बहुत कुछ समसामयिक महिमभट्ट के 'व्यक्तिविवेक' में कारिका और वृत्तिग्रन्थों के लेखक का पृथक्करण नहीं किया है। ध्वनिकार के नाम से कारिकाग्रन्थ और वृत्तिग्रन्थ दोनों को आचार्य कुन्तक ने उद्धृत किया है। यहाँ तक कि 'अर्थो वाच्यविशेष इति स्वयं विवृतत्वाच्च' (पृ० ८२) के द्वारा स्पष्ट कह दिया कि कारिकाओं के रचयिता ने ही स्वयं वृत्ति लिखी है । 'औचित्यविचारचर्चा' में क्षेमेन्द्र ने 'विरोधी वाविरोधी वा०' (३।२४) इस कारिका को आनन्दवर्धन के नाम के साथ उद्धृत किया है । हेमचन्द्र ने 'काव्यानुशासन' में 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०' ( १।४) को आनन्दवर्धन की लिखा है। साहित्यदर्पणकार ने भी कारिका और वृत्तिग्रन्थों को ध्वनिकार की रचना बताई है । इस परिस्थिति में जब कि कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने और न होने, दोनों के विरोधी प्रमाण मिलते हैं, दो ही रचनाएं समस्या का समाधान कर सकती थीं, एक तो 'चन्द्रिका' व्याख्या, जो लोचन से पूर्व ध्वन्यालोक पर लिखी गई थी, दूसरी भट्टनायक का 'हृदयदर्पण', जिसमें ध्वन्यालोक की खूब आलोचना की गई थी, किन्तु दुर्भाग्य से दोनों रचनाएं अभी तक उपलब्ध नहीं की जा सकी हैं। म० म० काणे महाशय का ख्याल है कि यदि लोचन का उपर्युक्त अंश 'चन्द्रिका' को ठीक रूप में उपस्थित करता है तो लगता है कि 'चन्द्रिका' कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानती है। काणे महाशय 'लोचन' के अंश को मुकुलभट्ट को ठीक मानते हैं तथा कुन्तक, महिमभट्ट और क्षेमेन्द्र आदि को कहते हैं कि उन्होंने ठीक परम्परा ग्रहण नहीं की । ध्वन्यालोक में 'सहृदय' शब्द का अनेक स्थलों पर प्रयोग मिलता है। प्रथम कारिका के 'सहृदयमनःप्रीतये' की वृत्ति है—'रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये सर्वत्र प्रसिद्धव्यवहारं लक्षयतां सहृदयानामानन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकाश्यते' (पृ० ३७) । इसका दूसरा तात्पर्य यह भी हो सकता है कि आनन्द (आनन्दवर्धनाचार्य) ध्वनि के प्रतिष्ठापक 'सहृदय' के मन में प्रतिष्ठा

( ४० )

प्राप्त करें। 'सहृदयोदयलाभहेतोः' यह ग्रन्थान्त के श्लोक का शब्द भी सहृदय के उदयलाभ के लिए अर्थात् सहृदय द्वारा प्रवर्तित ध्वनि-सिद्धान्त की प्रगति के लिए आनन्दवर्धन का प्रयत्न निर्देश करता है। 'सहृदय' के पर्यायवाची 'सचेतस्' का प्रयोग कारिका, वृत्ति और लोचन में अनेक स्थलों पर मिलता है। लोचन ने 'सहृदय' का लक्षण भी प्रस्तुत किया है (पृ० ३९-४०)। लोचन ने आनन्दवर्धन को 'सहृदयचक्रवर्ती' कहा है (पृ० ४२)। म० म० काणे लिखते हैं कि कारिकाकार के नाम का प्रश्न कारिका और वृत्ति के लेखक के प्रश्न से पृथक् है। जो विद्वान् भिन्नकर्तृकत्ववादी हैं, तर्क दे सकते हैं कि कारिकाकार का नाम ज्ञात नहीं है। प्रो० सोवानी ने कारिकाकार का नाम 'सहृदय' बताया। मुकुल के अनुसार सम्भव है कि कारिकाकार 'सहृदय' थे अथवा प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार समग्र ग्रन्थ के रचयिता थे। राघवभट्ट ने ग्रन्थ का नाम 'सहृदयहृदयालोक' निर्दिष्ट किया है। अभिनवभारती के उद्धरण के अनुसार अभिनवगुप्त भट्टनायक के ग्रन्थ को 'सहृदयदर्पण' कहते हैं ('भट्टनायकस्तु ब्रह्मणा परमात्मना यदुदाहृतं......इति व्याख्यानं सहृदयदर्पणे पर्यग्रहीत्' अ० भा० भाग १, पृ० ४-५)। लोचन में 'हृदयदर्पण' के नाम से यह ग्रन्थ उद्धृत है। म० म० काणे महाशय 'हृदयदर्पण' से अधिक 'सहृदयदर्पण' पसंद करते हैं। जैसा कि काणे महाशय समझते हैं अभिनवभारती (भाग १, पृ० १७३) में "अत एव सहृदयाः स्मरन्ति 'वध (स) य चूडामणिआ' " में 'सहृदय' का प्रयोग किसी ग्रन्थकार के लिए किया है। कारिकाकार का नाम 'सहृदय' था इसका निर्देश व्यक्तिविवेक के रुय्यककृत व्याख्यान में भी मिलता है, जैसा कि व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमर्श के आरम्भ में लिखा है—'तत्र विभावाअनुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगस्तन्मात्रलक्षणमैकमन्तरङ्गमाद्यैरेवो- क्तमिति नेह प्रतन्यते।' इस पर व्याख्यान है—'उक्तमिति सहृदयैः'। इस प्रकार 'सहृदयैः' कह कर कारिकाग्रन्थ का निर्देश किया है (ध्वनिकारिका ३।१०)। अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी का सबसे मूलभूत तर्क है कि परम्परा सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को एक व्यक्ति की, वह भी आनन्दवर्धन की कृति मानती है। काणे महाशय का मूलभूत आधार है अभिनवगुप्त का 'लोचन', जिसमें कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न रूप से निर्देश किया गया है। दोनों पक्षों के विद्वानों के पास अपने-अपने पक्ष के समर्थन में अन्तः-बाह्य प्रमाण हैं, जिनका विस्तारपूर्वक ऊपर निर्देश किया गया। किन्तु नितान्त सन्देहरहित होकर किसी एक पक्ष में अपना निर्णय देना अत्यन्त कठिन है, जब कि अनुकूल तर्क दोनों पक्षों में संकलित मिलते हैं। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आगे के जिन आलंकारिकों ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को ध्वनिकार या आनन्दवर्धन की कृति माना और निर्देश किया है उनकी दृष्टि से 'लोचन' भी अवश्य ही गुजरा होगा, ऐसी स्थिति में स्वाभाविक था कि 'लोचन' द्वारा कारिकाकार और वृत्तिकार के पृथक्- करण के प्रति उनका ध्यान अवश्य आकर्षित होता, किन्तु ऐसा किसी ने नहीं किया। इस प्रकार के पृथक्करण की कल्पना डॉ० बूहलर द्वारा प्रस्तुत की गई और काव्यमाला संस्करण के सम्पादकों ने उसे सर्वथा मान लिया। म० म० काणे महाशय ने उसकी प्रबल तर्कों से युक्तिसंगत पुष्टि की। फिर भी, तर्कों की पेचीदगी से कुछ हट कर सामान्यतः देखें तो अभी तक कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों आनन्दवर्धन ही ठहरते हैं। जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या और भट्टनायक का 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ प्रकाश में नहीं आ जाते तब तक इस समस्या का पूर्णतः समाधान देना सम्भव नहीं। इसका

( ४१ ) अर्थ यह नहीं कि विवाद व्यर्थ है, बल्कि इस प्रश्न पर और भी नवोद्भावित युक्तियों के प्रकाश में विचार करने की आवश्यकता है, हां, आग्रह छोड़ कर । सम्भव है इन सामग्रियों में से किसी एक पक्ष का प्रबल साधक प्रमाण प्राप्त हो जाय । संस्कृत के पण्डित-समाज में आचार्य आनन्द- वर्धन ही कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों समझे जाते हैं । ध्वनि की मान्यता, विरोधी आचार्य और सम्प्रदाय जैसा कि स्वयं आनन्दवर्धन ने स्वीकारा है, ध्वनि-सिद्धान्त पूर्ववर्ती आचार्यों के ग्रन्थों में अपने स्वरूप में निर्दिष्ट हो चुका था, यद्यपि उसे इस नाम से अभिहित एवं मौलिक रूप से प्रतिपादित करने का श्रेय ध्वनिकार को है । एक प्रकार के गम्यमान या प्रतीयमान अर्थ की स्वीकृति पूर्ववर्तियों में मिलती है । भामह ने—'गुणसाम्यप्रतीति' ( २।३५ ) का निर्देश किया है, यह सर्वथा गम्यमान औपम्य के सदृश है । 'समासोक्ति' में भी 'यत्रोक्ते गम्यमानोऽर्थः०' बताया है । 'पर्यायोक्त' में तो स्पष्ट लिखते हैं—'यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते' । इस प्रकार इनके और भी अलङ्कारों में अन्य गम्यमान अर्थ की स्वीकृति मिलती है । दण्डी की रचना में भी ध्वनि के सिद्धान्त के संकेत मिलते हैं । 'उदात्त' अलङ्कार में दण्डी लिखते हैं— पूर्वत्राशयमाहात्म्यमत्राभ्युदयगौरवम् । सुव्यञ्जितमिति व्यक्तमुदात्तद्वयमप्यदः ॥ ( काव्या० २।३०३ ) इस प्रकार अन्यत्र भी ध्वनि के संकेत सुविधा से प्राप्त किए जा सकते हैं । उद्भट के 'पर्यायोक्त' में, रुद्रट के परिकर, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि में भी यही स्थिति है । जब आनन्दवर्धन ने प्रतीयमान अर्थ पर आधारित विचार को ध्वनि-सिद्धान्त रूप में स्थापित किया तब विशेष रूप से 'अलङ्कारान्तर्भूत' करने का प्रयत्न हुआ। इस विचार को प्रतीहारेन्दुराज ने उद्भट के 'काव्यालङ्कारसंग्रह' पर लिखे गए अपने व्याख्यान में निर्दिष्ट किया है— 'स ( प्रतीयमानः ) कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् ।' ( पृ० ७९ ) वस्तुध्वनि को पर्यायोक्त अलङ्कार के अन्तर्गत बताते हुए 'रामोऽस्मि सर्वं सहे' को पदध्वनि मानकर पद में पर्यायोक्त का निर्देश किया है—'न खलु पदे पर्यायोक्तेन न भवितव्यमितीयं राज्ञा- माज्ञा, सूत्रकारवचनं वा ।' ( पृ० ८२ ) ध्वन्यालोक के निर्माण के पश्चात् ध्वनि-सिद्धान्त का प्रबल विरोध, उसमें निर्दिष्ट विरोधों के बावजूद भी हुआ । ध्वनि-सिद्धान्त के प्रथम विरोधी आचार्य थे प्रतीहारेन्दुराज । इनके गुरु मुकुलभट्ट ने भी अपनी 'अभिधावृत्तमातृका' में लिखा है—'लक्षणामागर्गावगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोप- वर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मोलयितुमिदमत्रोक्तम्' ( पृ० २१ ) । इसके अनुसार मुकुलभट्ट ध्वनि को लक्षणा के अन्तर्गत स्वीकार करते थे, ध्वनि की नूतन उद्भावना उन्हें पसंद न आई । उद्भट के काव्यालङ्कारसंग्रह की टीका में मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि को अलङ्कार के अन्तर्गत माना और उसके तीनों भेदों—वस्तु, अलङ्कार और रस के ध्वन्यालोक में दिए उदाहरणों को अलङ्कारों के उदाहरण सिद्ध किया । प्रतीहारेन्दुराज अलङ्कारवादी आचार्य थे । इस प्रसंग को इस प्रकार वे प्रस्तुत करते हैं—

( ४२ ) ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्लादिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दाव्यापारस्पृष्टत्वेन प्रतीय- मानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभिव्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृद- यैर्ध्वनिनीम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः । स कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् । ( काव्यालङ्कारसारलघुवृत्ति, पृ० ७९ ) ध्वनि का खण्डन इस प्रकार मुकुलभट्ट और प्रतीहारेन्दुराज द्वारा प्रसङ्गतः हुआ । किन्तु ऐसे भी आलंकारिक हुए जिन्होंने ध्वनि के खण्डन मात्र के उद्देश्य से अपने ग्रन्थ का निर्माण किया । वे थे—भट्टनायक, कुन्तक और महिमभट्ट । ये तीनों काश्मीरी आचार्य थे । भट्टनायक—ये अभिनवगुप्त से कुछ प्राचीन थे । इन्होंने 'हृदयदर्पण' नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जो अब तक प्राप्त नहीं हो सका है । उसका अंशतः उल्लेख 'लोचन' में यत्र-तत्र मिलता है । व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट लिखते हैं कि मेरी बुद्धि दर्पण ( हृदयदर्पण ) को बिना देखे ही सहसा यश की ओर प्रवृत्त हो गई है— सहसा यशोऽभिसर्तुं समुद्यताऽदृष्टदर्पणा मम धीः । स्वालङ्कारविकल्पप्रकल्पने वेत्ति कथमिवावद्यम् ॥ 'व्यक्तिविवेकव्याख्यान' में स्पष्ट ही लिखा है—'दर्पणो हृदयदर्पणाख्यो ध्वनिव्ध्वंसग्रन्थोऽपि'; इस प्रकार 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ ध्वनिव्ध्वंस के उद्देश्य से लिखा गया था, यह बात सिद्ध होती है । लोचन भी इस तथ्य की पूर्णतः पुष्टि करता है । जैसा कि लोचनकार भी भट्टनायक के 'भम धम्मिअ०' इस पद्य पर विचार का खण्डन करते हुए लिखते हैं—'कि च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्राह्यकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिव्ध्वंसोऽयम्' ( पृ० ६९ ) । भट्टनायक को व्यञ्जना शक्ति मान्य न थी, वे अभिधा के अतिरिक्त भावना और भोजकत्व ये दो नये व्यापारों की कल्पना करते थे । भट्टनायक रससिद्धान्त के युक्तिवादी व्याख्याता थे । कुन्तक—इन्होंने अपने ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' का निर्माण ध्वनि की स्थापना के विरोध में अवश्य लिखा था, किन्तु इनका उद्देश्य ध्वनि का खण्डन करना न था बल्कि इनका ग्रन्थ वक्रोक्ति का मण्डन ही करता है । आनन्दवर्धन के प्रति इनका भाव सद्भावपूर्ण था और ध्वनि-सिद्धान्त से इनका पूर्ण परिचय था । इन्हें ध्वनि वक्रोक्ति के प्रकारान्तर के रूप में ही मान्य है और रस की उपयोगिता काव्य में स्वीकार करते हुए भी इन्होंने उसे स्वतन्त्र काव्यतत्त्व न मानकर वक्रोक्ति का भेदमात्र माना है । कुन्तक लोचनकार के सम्भवतः समकालिक थे । महिमभट्ट—लोचनकार अभिनवगुप्त के कुछ ही पीछे इन्होंने 'व्यक्तिविवेक' का निर्माण किया । इनका मूल उद्देश्य ग्रन्थालम्भ के इस पद्य से ही विदित हो जाता है— अनुमानेऽन्तर्भावं सर्वस्यैव ध्वनेः प्रकाशयितुम् । व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम् ॥ अर्थात् महिमभट्ट परा वाणी को प्रणाम करके अनुमान में सभी ध्वनि का अन्तर्भाव करने के लिए 'व्यक्तिविवेक' ( व्यञ्जना का विवेचन ) नाम के ग्रन्थ का निर्माण कर रहा है । ध्वनि के लक्षणवाली कारिका ( 'यत्रार्थः शब्दो वा०' ध्व० १।१३ ) को धज्जी-धज्जी उड़ाने का इन्होंने खूब ही प्रयत्न किया है । ये सर्वथा अभिधावादी थे, और व्यङ्ग्य को अनुमेय मानते थे तथा व्यञ्जना