भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ३३ ) अनुमान लगाना युक्तिसंगत नहीं कि सहृदयों की मण्डली (circle) ने कारिकाओं का निर्माण किया था । डॉ० कृष्णमूर्ति ने लोचन से उन अंशों को उद्धृत किया है जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार का अभेद प्रतीत होता है—(१) ‘एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं प्रपञ्च- यितुमाह यस्त्विति’ (पृ० ३२७); (२) ‘एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं तत्र का वार्तेति निरूपयितुमाह प्रधानेत्यादिना कारिकाद्वयेन’ (पृ० ५२५) । इन दोनों स्थलों में क्रमशः ‘व्याख्याय’ और ‘निरूप्य’ ये ल्यबन्त प्रयोग कारिकाकार और वृत्तिकार के अभिन्न होने का निर्देश करते हैं । क्योंकि जिस व्यक्ति ने कारिका का व्याख्यान किया उसने ही कारिका में असंगृहीत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का प्रपञ्च करने के लिए कहा—‘यस्तु०’ इत्यादि । दूसरे उद्धरण की भी यही स्थिति है । परन्तु म० म० काणे का कहना है कि यहाँ, कारिका वृत्ति का भाग हो गई है तथा ‘व्याख्याय’ और ‘निरूप्य’ शब्द वृत्तिकार को सूचित करते हैं तथा ‘आह’ भी उन्हें ही सूचित करता है, क्योंकि वृत्तिकार ने ‘यस्तु०’ कारिका के प्रमाण एवं व्याख्यान द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का निरूपण आरम्भ किया है । दूसरे यह कि कोई यह नित्य नियम नहीं है कि एक वाक्य में ल्यबन्त का और प्रधान क्रिया का कर्ता एक ही होना चाहिए । जैसा कि महाकवि कालिदास आदि ने इस नियम को नहीं माना है—‘अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति । मत्प्रसूतिमनाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा ॥’ (रघु० १।७७); किरातार्जुनीय ३।२१, तीसरे यह कि जब कि ऊपर निर्दिष्ट आठ अंश भिन्नकर्तृकत्व सिद्ध कर चुके हैं तब ये दो अंश उस प्रकार अभेद सिद्ध नहीं करते हैं । अन्त में, कारिकाकार और वृत्तिकार अभिनवगुप्त से पहले पहचाने जा चुके हैं, ऐसी स्थिति में अभिनवगुप्त ने दोनों के भेद के बारे में बात दुहराई नहीं है । हम मानते हैं कि काणे महाशय का मत बहुत अंश में तर्कसमन्वित है, किन्तु जिनके विचार से दोनों का लोचन में भेद formal अथवा व्याख्यान के स्पष्टीकरणार्थ है उनके लिए ये दोनों उद्धरण अपने स्वाभाविक अर्थ में अनुपेक्षणीय नहीं हैं । अभिन्नकर्तृकत्ववादी विद्वान् अभिनवगुप्त की भरत मुनि के नाट्यशास्त्र पर लिखी व्याख्या ‘अभिनवभारती’ से कुछ अंश अपने मत की पुष्टि में उद्धृत करते हैं, जैसा कि अभिनवगुप्त ने वहाँ लिखा है— “स्वशब्दानभिधेयत्वं हि रसादीनां ध्वदिकारादिभिर्दर्शितम् । तच्च मदीयादेव तद्- विवरणात् सहृदयालोकलोचनादवधारणीयमिह तु यथावसरं वक्ष्यत एव” (भरत, अध्याय ७, भाग १ पृ० ३४४); “एतमेवार्थं सम्यगानन्दवर्धनाचार्योऽपि विविच्य न्यरूपयत् । ‘ध्वन्यात्मभूते०’ (ध्व० २।१७) इत्युक्त्वा क्रमेण ‘विवक्षा तत्परत्वेन०’ (ध्व० २।१८) इत्यादिना ग्रन्थसन्दर्भेण सोदाहरणेन । तच्चास्माभिः सहृदयालोकलोचने तद्विवरणे विस्तरतो व्याख्यातमिति ।” (भरत, १६, भाग २. पृ० २९९-३००) इन अंशों में प्रथम में वृत्तिग्रन्थ के रचयिता को ‘ध्वनिकार’ कहा गया है और ध्वन्यालोक का प्राचीन नाम ‘सहृदयालोक’ अवगत होता है । कुछ पाण्डुलिपियों की पुष्पिकाओं में तथा राघवभट्ट ३ ध्व० भू०