ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस तर्क के विरुद्ध म० म० काणे का कहना है कि प्राचीन ग्रन्थकारों के यहाँ मङ्गल की प्रथा नित्यरूप से मान्य नहीं थी, जैसा कि जैमिनि-सूत्रोंपर शाबर के भाष्य के आरम्भ में, वेदान्त-सूत्रों पर शङ्कराचार्य के भाष्य के आरम्भ में, नाट्य-सूत्रों पर वात्स्यायन के भाष्य में और उद्योतकर के न्याय- वार्तिक में मङ्गल नहीं है। जहाँ एक ही व्यक्ति सूत्र या कारिका और वृत्ति का कर्ता है वहाँ यह प्रवृत्ति अधिक है । वामन ने अपने सूत्रों में मङ्गल नहीं किया, किन्तु वृत्ति के आरम्भ में किया ! मम्मट ने काव्यप्रकाश के आरम्भ में मङ्गल-कारिका रखी, किन्तु वृत्ति में नहीं । उद्भट ने अपना अलङ्कार-ग्रन्थ बिना मङ्गल के आरम्भ किया है । अलङ्कारसर्वस्व में सूत्रों में मङ्गल नहीं है, किन्तु वृत्ति में है। हेमचन्द्र ने अपने सूत्र और अपनी वृत्ति सौदामिनी दोनों में मङ्गल रखा है। कोई विशेष नियम उल्लिखित नहीं है। जैसा कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी के आरम्भ में प्रथम सूत्र में ‘वृद्धि’ का प्रयोग किया उसी प्रकार यहाँ ‘काव्यस्यात्मा’ का प्रयोग करते हुए मङ्गल किया गया है। हम समझते हैं कि मङ्गलश्लोक के होने या न होने के आधार पर कारिकाकार और वृत्तिकार के भेदाभेद- निर्णय को कोई गति नहीं मिलती है।
मुकुलभट्ट और प्रतीहारेन्दुराज के प्रमाणों के आधार पर म० म० काणे का निर्णय है कि 'सहृदय' नाम के किसी व्यक्ति ने ध्वनि-कारिकाओं का निर्माण किया था, जिस पर आनन्दवर्धन ने वृत्ति लिखी । 'अभिधावृत्तमातृका' में मुकुल लिखते हैं—'लक्षणामागौवगाहित्वं तु ध्वनेर्नूतनतयो- पर्वाणितस्य विद्यत इति दिशमुन्मीलयितुमिदमत्रोक्तम्' (पृ० २१); 'तथा हि तत्र विवक्षितान्यपरता सहृदयैः काव्यवर्त्मनि निरूपिता' (पृ० १९)। मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज कहते हैं—'ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्लादिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दव्यापारास्पृष्टत्वेन प्रतीयमानैकरूपस्यार्थस्य सद्भा- वस्त्रत्र तथाविधार्थाभिव्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृदयैर्ध्वनिनाम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः' इन उद्धरणों के सम्बन्ध में अभिन्नकर्तृकत्ववादी पण्डितों का कहना है कि 'सहृदय' प्रयोग व्यक्तिपरक नहीं है, बल्कि ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन को सूचित करता है, क्योंकि लोचनकार ने भी आनन्दवर्धन को 'सहृदयचक्रवर्ती' कहा है (पृ० ४२)। किन्तु अपने मन्तव्य की पुष्टि में म० म० काणे महाशय लिखते हैं कि ऐसी प्रवृत्ति मालूम होती है कि प्राचीन ग्रन्थकारों को एकवचन में निर्देश किया गया है जब कि समसामयिक अथवा कुछ पूर्व के ग्रन्थकारों का निर्देश बहुवचन में किया गया है। उदाहरण के लिए, मम्मट ने भरत (मुनि), रुद्रट और ध्वनिकार को प्रथमपुरुष में निर्देश किया है जब कि अभिनवगुप्त को बहुवचन में करते हैं। इसी आधार पर मुकुल, जो आनन्द के बाद के हैं, किन्हीं 'सहृदय' को बहुवचन में निर्देश करते हैं। स्वयं आनन्दवर्धन ने उद्भट आदि को, जिनसे काव्य के आत्मा के सम्बन्ध में उनका पूर्ण मतभेद था, बहुवचन में सम्मानित किया है (तत्रभवद्भिर्भट्टोद्भटादिभिः, २।२६)। किन्तु काणे महाशय का यह पक्ष अपने आप में सर्वथा दुर्बल है, क्योंकि यह बिलकुल सम्भावना पर आधारित है। मुकुल ने अथवा प्रतीहारेन्दुराज ने कारिकाकार को ही 'सहृदय' कहा है, आनन्दवर्धन को नहीं (जब कि लोचन के अनुसार आनन्दवर्धन भी सहृदय-चक्रवर्ती थे), इसमें कोई विनिगमक प्रमाण नहीं है, साथ ही, लोचन में आनन्दवर्धन को 'शास्त्रकार' भी कहा गया है (पृ० ६७), इसका संकेत यही है कि ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन ही ध्वनिशास्त्र के प्रवर्तक हैं। पण्डितराज ने भी ध्वनिकार को 'आलङ्कारिकसरणिव्यवस्थापक' कहा है। और बहुवचन प्रयोग से ऐसा भी