ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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है और मूलकार को 'अन्य पुरुष' (Third person) में सूचित करता है। इस प्रकार प्रस्तुत आलोच्य ग्रन्थ ध्वन्यालोक में भी कारिकाकार और मूलकार के अभिन्न होने की स्थिति में भी 'उत्सूत्रव्याख्यान' से बचने का निर्देश 'लोचन' में आचार्य अभिनवगुप्त ने वृत्तिकार के अभिप्राय से किया है। इस प्रकार डॉ० मुकर्जी के अनुसार वे सभी अन्तःप्रमाण, जो मूल या वृत्ति में व्यक्तिगत (Personal) भेद के तात्पर्य के हैं इन rules of the game के विरुद्ध एक 'अपराध' समझे जायेंगे। किन्तु म० म० काणे महाशय इस कथन के सर्वथा भिन्न विचार प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि 'वृत्तिकार' के लिए ऐसा कोई प्राचीन नियम नहीं है जिसका उल्लङ्घन एक 'अपराध' हो। जैसा कि ध्वन्यालोक के लगभग सौ वर्ष पूर्व वामन ने कहा है कि उन्होंने सूत्र और वृत्ति दोनों लिखे हैं। हेमचन्द्र ने भी ऐसा ही किया है। 'कौटिलीय' के अन्त में यह प्रसिद्ध है—'स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ।' इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ग्रन्थकार के विरुद्ध कोई ऐसी मनाही नहीं है कि वह कहे कि स्वयं उसने सूत्र और वृत्ति दोनों को निबद्ध किया है, जब कि वह स्वयं को वृत्ति में 'अन्यपुरुष' में कहता है तो, भिन्न व्यक्ति (जैसे अभिनवगुप्त) को क्यों यह कहने से रुकावट होगी कि कारिका और वृत्ति के कर्ता भिन्न हैं अथवा अभिन्न ? इस प्रकार काणे महाशय के विचार में यह सब कुछ आधारहीन है, क्योंकि उनकी दृष्टि में 'rules of the game' कोई हैं ही नहीं जिनके आधार पर भिन्न प्रतीत होते हुए कारिका और वृत्ति के कर्ताओं को अभिन्न समझा जाय। जिस प्रकार वामन, हेमचन्द्र, कौटिलीय से सिद्ध हो जाता है कि उनके मूलकार और वृत्तिकार एक हैं वैसी स्थिति यहां नहीं है, लोचन ने तो सर्वत्र दोनों को भिन्न ही प्रतिपादित किया है। डॉ० के० सी० पाण्डेय का मत है कि नवीं शताब्दी में कश्मीर में ऐसा चल पड़ा था कि एक ही व्यक्ति कारिका और उस पर वृत्ति का कर्ता हुआ करता था। इस विचार से भी काणे महाशय सहमत नहीं, क्योंकि ध्वन्यालोक में दोनों के अभिन्नकर्तृत्व का निर्देश हुआ होता, जैसा कि अन्यत्र स्पष्ट शब्दों में प्राप्त होता है। फिर प्रश्न उठता है कि क्यों लोचनकार ने आरम्भ में ही नहीं निर्देश किया कि कारिकाकार और वृत्तिकार एक हैं, जब कि उन्होंने 'विमर्शिनी' में ऐसा किया है? इससे निश्चित है कि यदि ऐसी परिस्थिति होती कि दोनों एक हैं तो पहले ही यह स्पष्ट कर देते ताकि शिष्यों को भ्रम न हो। ऊपर उद्धृत तृतीय अंश 'उक्तमेव ध्वनिस्वरूपं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदती- त्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति' (पृ० ३०९) को ध्वन्यालोक के भिन्नकर्तृत्व की सिद्धि में विशेष सहायक समझा गया है, क्योंकि वृत्तिकार, लोचन के अनुसार 'यतश्च' के द्वारा इस अभिप्राय से उपस्कार (Supplement or embelishment) देते हैं कि कारिकाकार... अनुवाद करते हैं। यदि वृत्तिकार कारिकाकार से अभिन्न होते तो कारिकाकार के कथन का उपस्कार देने की उन्हें आवश्यकता क्यों होती। अभेदवादी विद्वान् कहते हैं कि ग्रन्थकार ने कारिकाओं के आरम्भ में मङ्गल-श्लोक नहीं लिखा और वृत्ति का आरम्भ करते हुए लिखा, इससे यही लगता है कि जब वृत्तिग्रन्थ में मङ्गल सम्पन्न हो गया तब कारिकाग्रन्थ में उसकी आवश्यकता न हुई, यदि वृत्तिकार से कारिकाकार कोई भिन्न व्यक्ति था तो अवश्य ही वह कारिकाओं का आरम्भ करते हुए मङ्गल-श्लोक लिखता !