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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 680 में से

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( ३० ) लिखना चाहिए था, क्योंकि आगे 'विभावभावानुभाव०' ( ३।१० ) इत्यादि कारिकाओं में उक्त विषय की चर्चा मिलती है। किन्तु यहाँ 'भूतकाल' के प्रयोग से यही विदित होता है कि कारिकाएँ अन्य प्राचीन की रचना हैं और ठीक ही वृत्तिकार के पहले की हैं। काणे महोदय की इस व्याख्या से डॉ० मुकर्जी बिलकुल सहमत नहीं हैं, क्योंकि जब वृत्तिकार व्याख्यान के नियमानुसार स्वयं भिन्न रूप से निर्देश करते हैं तो काणे महोदय का यह कहना कि दोनों के अभिन्न होने की स्थिति में भविष्यत्काल 'दर्शयिष्यते' का प्रयोग होता, प्रमाणित न करने योग्य (unjustifiable) है। काल के प्रयोग पर आधारित तर्क पूर्णरूप से अनिर्णायक है ( absolutely incon- clusive )। डॉ० मुकर्जी का विचार है कि आनन्दवर्धन ने अनेक स्थलों में भविष्यत्काल का प्रयोग किया है, जो कि आगे की कारिका में कहा गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह निर्देश वृत्तिग्रन्थ के लिए है, कारिका के लिए नहीं। डॉ० मुकर्जी ने वृत्तिग्रन्थ के भविष्यत्काल के अनेक प्रयोगों को उद्धृत किया है—( १ ) स ह्यर्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तं वस्तुमात्रमलङ्काररसादयश्चेत्य- नेकप्रभेदप्रभिन्नो दर्शयिष्यते ( पृ० ५१ ); ( २ ) द्वितीयोऽपि प्रभेदो वाच्याद्विभिन्नः सप्रपञ्चमग्रे दर्शयिष्यते ( पृ० ७६ ); ( ३ ) वाच्येन त्वस्य सहैव प्रतीतिरित्युग्रे दर्शयिष्यते ( पृ० ८४ ); ततो- ऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः ( पृ० १०५ )। 'दर्शयिष्यामः' यह उत्तमपुरुष का प्रयोग महत्त्व का है। किन्तु म० म० काणे महाशय ने इन स्थलों को आगे के वृत्तिग्रन्थ के लिए ही निर्देश के रूप में समझाने का प्रयत्न किया है, जैसा कि प्रथम उद्धरण किसी कारिका के निर्देश के रूप में नहीं है, क्योंकि ऐसी कोई भी कारिका नहीं जो ध्वनि को वस्तु आदि तीन भागों में विभक्त करती हो। दूसरा उद्धरण भी वृत्तिग्रन्थ के लिए ही है, जैसा कि 'सप्रपञ्चं' शब्द स्पष्ट करता है। तृतीय उद्धरण का भी, ३।४१, ४२ कारिकाओं की वृत्ति के रूप में विस्तार से व्याख्यान है और वृत्तिकार ने वहाँ स्वयं कुछ अपने श्लोक दिए हैं। डॉ० मुकर्जी का पक्ष यहां उनके बहुत कुछ निर्णीत सिद्धान्त, कि कारिका और वृत्ति का पृथक्करण 'Formal' है, पर आधारित है, किन्तु यहां काणे महाशय युक्तिसंगत तर्क देते हुए प्रतीत होते हैं। किन्तु ऐसा क्या सम्भव नहीं कि आनन्दवर्धन ने कारिकाओं का निर्माण करने के पश्चात् उस पर वृत्ति लिखी और इस प्रकार 'दर्शितमेवाग्रे' का भूतकालिक प्रयोग किया ? डॉ० मुकर्जी ने अपने निबन्ध में 'न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्' ( लो० पृ० १७३ ) पर विचार करते हुए 'उत्सूत्रव्याख्यान' की चर्चा की है, उनके अनुसार 'वृत्ति' का तरीका यह है कि जो कुछ मूल ग्रन्थ में बिना सन्देह के कहा है उसका व्याख्यान करना और मूल के विरुद्ध वस्तु सूचित करना भाष्य के नियमों के अपराध ( offence ) है। इस 'अपराध' को पारिभाषिक रूप से 'उत्सूत्रव्याख्यान' कहा जाता है। यह अपराध वृत्तिकार के लिए अक्षम्य माना जाता है। मूलकार और वृत्तिकार दोनों भिन्न हों अथवा अभिन्न, सूत्र या कारिका के अनुसार ही वृत्तिग्रन्थ को होना चाहिए। 'यो हि उत्सूत्रं कथयेन्नादो गृह्येत' ( महाभाष्य ), 'सूत्रेष्वेव हि तत्सर्वं यद् वृत्तौ यच्च वार्तिके' ( नागेश ), इनसे भी 'उत्सूत्रव्याख्यान' अपराध प्रमाणित होता है। भाष्य या वृत्तिग्रन्थ को अधिकार नहीं, कि वह उन तत्त्वों का भी निरूपण करे जो सूत्र या कारिका से सम्बन्ध नहीं रखते। मुकर्जी साहब के अनुसार यदि वृत्ति का कर्ता मूल ग्रन्थ के कर्ता से अभिन्न होता है, तो वह स्वयं को मूलकार से भिन्न व्यक्ति के रूप में निश्चित रूप से प्रकट करता