ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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कि) 'हमारे मूल ग्रन्थ के रचयिता द्वारा (प्रतिपादित हो चुका है)।' यहाँ यदि वृत्तिकार कारिका- कार भी होते तो कहते 'मत्कृतकारिकायां०' अर्थात् मेरी कारिका में यह प्रतिपादित हो चुका है । अपने इस मन्तव्य की पुष्टि में म० म० काणे महाशय लोचन के उन स्थलों को उद्धृत करते हैं जिनमें वृत्तिकार ने अपने कहे हुए के सम्बन्ध में 'मया' का प्रयोग किया है, (जैसे, 'उक्तमिति, मयैवेत्यर्थः' पृ० ५२८; 'उक्तमिति संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थः' पृ० ५५५) । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी कारिकाकार से अभिन्न वृत्तिकार को 'मत्कृतकारिकायां' लिखना चाहिए था । अपने निबन्ध में डॉ० मुकर्जी ने विस्तार के साथ यह सिद्ध किया है कि 'लोचन' में जो कारिकाकार और वृत्तिकार को पृथक् निर्देश किया गया है वह एक नियम का विषय है, जिससे च्युत होना अक्षम्य अपराध माना जाता था। म० म० काणे जानना चाहते हैं कि यह नियम उन्होंने कहाँ पाया, जिसे वे इतनी सशक्त भाषा में प्रस्तुत करते हैं। डॉ० कृष्णमूर्ति डॉ० मुकर्जी के विचार से पूर्णतया सहमत हैं। इन दोनों डॉक्टरों से काणे महोदय यह प्रार्थना करते हैं कि वे अपने विस्तृत अध्ययन से कम से कम एक भी स्थल निर्देश करें जहाँ सूत्र या कारिका तथा उस पर वृत्ति एक ही व्यक्ति द्वारा लिखे गए हैं और टीकाकार 'प्रतिपादितमिवैषामालम्बनं' जैसे वृत्ति-ग्रन्थ का व्याख्यान 'अस्मन्मूल- ग्रन्थकृता' से करता है। म० म० काणे इस 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता' के निर्देश को एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक अंश मानते हैं, क्योंकि 'लोचन' में कहीं भी 'ग्रन्थकृत' शब्द का प्रयोग कारिकाकार के लिए असन्दिग्ध रूप से नहीं हुआ है। मेरे विचार में यद्यपि इस विवाद का इतने निर्देश मात्र से निराकरण नहीं होता है, क्योंकि अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी जिस भेद को 'Matter of form' समझते हैं, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे उसे ही अपना साधक प्रमाण समझते हैं, फिर भी 'लोचन' का 'अस्मत्' प्रयोग एक निर्णय की ओर अवश्य अनुधावन करता है और यह सही है कि 'ग्रन्थकार' का प्रयोग 'लोचन' में केवल वृत्तिकार के लिए आया है। ('ग्रन्थकृत्समकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' इस अंश में प्रयुक्त 'ग्रन्थकार' शब्द सन्दिग्ध है, क्योंकि 'मनोरथ' कवि को निश्चित रूप से नहीं कहा जा सका है कि वह जयापीड़-ललितापीड़ के समय का मनोरथ था) । म० म० काणे अपने पक्ष के साधक प्रमाण के रूप में ध्व० के मंगल-श्लोक 'स्वेच्छाकेसरिणः०' को उद्धृत करते हैं, जिसे 'लोचन' में 'वृत्तिकार' का कहा गया और प्रथम कारिका 'काव्यस्यात्मा०' को 'आदिवाक्य' कहा गया है। काणे महाशय के अनुसार यदि कारिका और वृत्तिग्रंथ का कर्ता एक है तो 'लोचन' ने मङ्गल-श्लोक को 'कारिकाकार' अथवा 'ग्रंथकार' शब्द के साथ क्यों नहीं सूचित किया ? और यह अनेक स्थलों से विदित होता है कि 'ग्रंथकार' शब्द से लोचनकार का अभिप्राय वृत्तिकार से है और वह भी आनन्दवर्धनाचार्य से (आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम । तेन स आनन्द- वर्धनाचार्य एतच्छास्त्र०, पृ० ४१) । (२) सप्तम अंश 'दर्शितमेवाग्रे०' (पृ० ३४७) है, इसे आचार्य आनन्दवर्धन ने 'औचित्य के (अ) त्याग' के सम्बन्ध में विचार करते हुए लिखा है। तात्पर्य यह कि 'इसे आगे (ऊपर) दिखा चुके हैं' (Has been dealt with), इस पर व्याख्यान करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं 'कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः' अर्थात् कारिकाकार ने इसे दिखा दिया है, इसी कारण यहाँ 'भूतकाल' का प्रयोग है, (भविष्य का नहीं)। काणे महाशय का कहना है कि यदि कारिका और वृत्ति दोनों ग्रन्थ एक ही व्यक्ति की कृतियाँ होतीं तो 'दर्शितं' के स्थान पर वृत्तिकार को 'दर्शयिष्यते'