ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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his coments')। और डॉ० मुकर्जी समझते हैं कि कारिकाकार को वृत्तिकार से भिन्न समझने का विश्वास परम्परागत हो गया है। जो भी हो, ध्वन्यालोक के सम्बन्ध में यह विवाद अब तक किसी उभयसम्मत तर्क के अभाव में समाप्त नहीं हुआ है। (१) म० म० काणे ने 'लोचन' के जिन अंशों को उद्धृत किया उनमें द्वितीय, षष्ठ और सप्तम अंशों को वे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। द्वितीय अंश (पृ० १७३) का प्रसंग यह है कि प्रथम उद्योत में वृत्तिभाग में ध्वनि के दो भेदों (अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य) की चर्चा की गई है (पृ० १४३), कारिका भाग में इनका निर्देश नहीं है। और, द्वितीय उद्योत के आरम्भ में प्रथम कारिका में ध्वनि के प्रथम भेद को दो प्रभेदों में विभक्त किया गया है। अभिन्नकर्तृत्ववादी डॉ० मुकर्जी अभिनवगुप्त के निरूपण को पृथक् करके, इससे समझते हैं कि कारिका प्रथम उद्योत में दिए गए विभाग को पहले से मानती है और साथ ही मुकर्जी साहब इस अनुमान को स्वाभाविक बताते हैं कि कारिकाकार वृत्तिकार से अभिन्न हैं। दूसरे शब्दों में, ग्रन्थकार वृत्ति और कारिका को एक दूसरे से भिन्न नहीं करते हैं। यही कारण है कि द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका में एकाएक अविवक्षितवाच्य का भेद ही करने लगे, इसके पूर्व कुछ नहीं संकेत किया। यदि हम द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका के अवतरण के रूप में दिए गए आनन्द- वर्धन के निर्देशों की परीक्षा करें तो यह स्पष्ट होगा कि उन्होंने कारिका और वृत्ति को भिन्न नहीं किया है बल्कि प्रथम उद्योत में प्रस्तुत भेद की संगति बैठाते हैं—'इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित (हो चुका) है, उनमें (वहां) अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं (पृ० १७३)।' डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत में 'लोचन' के आधार पर अपने पक्ष की पुष्टि में 'मया वृत्तिकारेण सत्ता' पर अधिक जोर देते हैं और इसका अर्थ करते हैं—'by me in the capacity of वृत्तिकार।' इस प्रकार मुकर्जी साहब के अनुसार आचार्य अभिनवगुप्त 'सत्ता' द्वारा भिन्नकर्तृत्व के बजाय अभिन्नकर्तृत्व का संकेत करते हैं, अन्यथा यह प्रयोग अधिक (redundant) था। इसके विपरीत, भिन्नकर्तृत्ववादी म० म० काणे प्रस्तुत लोचनांश के 'अभिप्राय' और 'कारिका- कार-सम्मत' प्रयोगों को अपने पक्ष की पुष्टि के अनुकूल समझते हैं, उनके अनुसार 'न चैतन्मयोक्तम्, अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह—तत्रेति' इसका अर्थ होगा 'This is not what I, the वृत्तिकार, have stated out of my own head, but I have stated it in accordance with the intention of the author of the Karikas'; 'भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति' (ध्वनि is first of two kinds, and this is also approved of by the कारिकाकार)। यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक हैं तो वृत्तिकार को क्या कहने की आवश्यकता थी कि वे कारिकाकार के अभिप्राय का अनुसरण करते हैं और उन वृत्तिकार ने जो कहा है वह कारिकाकार का सम्मत है। एक ही व्यक्ति जब दो बातें कह रहा है तब 'सम्मति' का प्रश्न नहीं उठता है। इसी प्रकार एक दूसरे प्रसंग में, जहाँ शङ्का होती है कि यदि संघटना गुणों का आश्रय नहीं है तो किस आधार पर ये रहते हैं?, समाधान करते हुए कहा है कि 'प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम्' अर्थात् 'इनका आलम्बन (आश्रय, आधार) प्रतिपादित हो ही चुका है' (पृ० ३४०), इस वृत्ति पर लोचन है 'अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः' अर्थात् (वृत्तिकार का तात्पर्य है