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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( २७ ) जाकोबी महाशय ने कारिकाओं के लेखक ध्वनिकार को इस प्रमाण के आधार पर कल्हण की 'राजतरङ्गिणी' (४।४९७ और ६७१) के अनुसार कश्मीर के जयापीड और उसके उत्तराधिकारी ललितापीड (७८०-८१३ ई०) के राज्यकाल में हुए मनोरथ कवि का समसामयिक माना है। 'राजतरङ्गिणी' का श्लोक इस प्रकार है— मनोरथः शङ्खदत्तश्चटकः सन्धिमांस्तथा । बभूवुः कवयस्तस्य वामनाद्याश्च मन्त्रिणः ॥ ४९७ यदि यह विचार मान लिया जाय तो आचार्य आनन्दवर्धन का, जिनका समय नवम शताब्दी के अन्तिम चरण में निश्चित माना गया है, मनोरथ का समकालीन होना असम्भव है। दूसरे यह कि अवन्तिवर्मा के समय आचार्य आनन्दवर्धन कवि के रूप में प्रसिद्ध थे, ध्वन्यालोक उनकी निश्चित रूप से अनेक काव्य-रचनाओं के पश्चात् की कृति है, जैसा कि उसमें उद्धृत उनकी काव्य-रचनाओं के नाम तथा श्लोकों से अवगत होता है। इस प्रकार कितना भी मनोरथ का जीवनकाल अधिक होगा, आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' के निर्माणकाल तक उसे पहुँचाना हास्यास्पद होगा। इस प्रकार जाकोबी महाशय और म० म० काणे के अनुसार वृत्तिकार आनन्दवर्धन के पूर्व किसी ध्वनिकार (मूल कारिकाओं के रचयिता) का होना प्रमाणित होता है। किन्तु 'ध्वन्यालोक' के 'मनोरथ' को जयापीड के समकालिक 'मनोरथ' से अभिन्न स्वीकार करने में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है, बल्कि इसके विपरीत यह तथ्य उद्धृत किया गया है कि प्रायः 'लोचन' में वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' भी कहा गया है१ (और कारिकाकार को मूल ग्रन्थकार), इस स्थिति में जब लोचनकार 'ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना' लिखते हैं तब निश्चित ही उनका संकेत वृत्तिकार आनन्दवर्धन से है। इसका स्पष्टीकरण डॉ० सुशीलकुमार डे ने अपने अलङ्कार-शास्त्र के इतिहास के अध्ययन में प्रस्तुत किया है। डॉ० डे के अनुसार इस कठिनाई के निराकरण के लिए दो बातें माननी होंगी—१. कि कल्हण ने, जैसा कि पिशेल तर्क करते हैं, जयापीड-ललितापीड के राज्यकाल में मनोरथ को निर्दिष्ट करते हुए गलती की है, अथवा २. कि अभिनवगुप्त ने कारिकाकार को वृत्तिकार के साथ गड़बड़ा दिया है। अस्तु, कल्हण की मनोरथ के मूल किसी ध्वनिकार के समकालिक होने की कल्पना निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं की जा सकी है। अतः इस आधार को दृढ़ नहीं कहा जा सकता। हम ऊपर कह चुके हैं कि लोचनकार के भेदक उल्लेखों के आधार पर ही ध्वन्यालोक के कारिका भाग को भिन्नकर्तृक समझने का झगड़ा खड़ा हुआ और इसी आधार पर ही यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न म० म० काणे आदि विद्वानों ने किया कि केवल अभिनवगुप्त ही दोनों ग्रन्थों को भिन्न और भिन्नकर्तृक नहीं मानते थे, बल्कि अभिनवगुप्त ने यह भी दिखाने का प्रयत्न किया है कि स्वयं वृत्तिकार भी कारिकाकार को अपने से भिन्न समझ कर लिखते हैं, जब कि सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को आनन्दवर्धनकृत मानने वाले वाले विद्वानों के अनुसार लोचनकार अभिनवगुप्त के भेदसाधक उल्लेख वस्तुतः अपने व्याख्यानों को सुगम करने के लिए हैं ('In order to faciliate १. 'आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम तेन स एवानन्दवर्धनाचार्य एतच्छास्त्रद्वारेण०' (पृ० ४१); 'समासोक्त्याक्षेपयोरेकमेवोदाहरणं व्यतरद् ग्रन्थकृत' (पृ० ११५); 'एवमभिप्रायद्वयमपि साधार- णोक्त्या ग्रन्थकृत्यरूपयत्' (पृ० ११७); 'अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन०' (पृ० १६६)।