ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) ८. 'यद्यप्यर्थानन्त्यमात्रे हेतुर्वृत्तिकारेणोक्तः, तथापि कारिकाकारेण नोक्त इति भावः।' पृ० ५६५ इनके अतिरिक्त भी 'लोचन' में अनेक स्थल हैं, जिनमें 'वृत्तिकार' शब्द का उल्लेख है, किन्तु उनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भेद का विचार गतिशील नहीं होता, जितना कि इन उद्धरणों से होता है । अपने पक्ष की पुष्टि में इन स्थलों को दोनों दल के पण्डितों ने अपने अनुसार लगाया है । प्रधान रूप से यहाँ भिन्नकर्तृकत्ववादियों में म० म० काणे के अनुसार तथा अभिन्नकर्तृकत्ववादियों में डॉ० सातकरी मुकर्जी के अनुसार हम विचार करेंगे । डॉ० सातकरी मुकर्जी (भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, वर्तमान में डाइरेक्टर, नालन्दा पालि इन्स्टिच्यूट, बिहार) का लेख 'A dissertations on the identity of the author of the Dhvanyaloka' B. C. vol. I Part पृ० १७९ में प्रकाशित है (१९४५) । म० म० काणे के पक्षों का विशेषतः खण्डन करते हुए डॉ० मुकर्जी ने ध्वन्यालोक के कारिका और वृत्ति भागों के अभिन्नकर्तृकत्व पक्ष का बड़ी दृढ़ता से समर्थन किया है, यद्यपि वे अपने पक्ष के समर्थन में 'आग्रह' का अवलम्बन नहीं करते और न कि चाहते हैं कि यह प्रश्न स्थगित हो जाय ( I do not think the question to be a closed one and I propose to record the results of my reflections which may serve to stress the need of re-consideration and re-assessment of the problem with all its relevent issues') । इसी प्रकार म० म० काणे भी अपने पक्ष के विपरीत अभिन्नकर्तृकत्व के प्रमाणित हो जाने पर प्रसन्न होना चाहते हैं ('I should be glad if ultimately it be proved that the same person is the author of both Karikas and Vṛtti') । अस्तु, यह प्रथमतः निर्देश करना आवश्यक है कि भेदवादियों अर्थात् कारिका और वृत्ति के भिन्न- कर्तृकत्ववादियों के पक्ष के मूल में 'लोचन' के भेद-निर्देश के स्थल हैं और अभेदवादियों के पक्ष के मूल में आनन्दवर्धन के परवर्ती ग्रन्थकारों के वक्तव्य हैं, जिनके अनुसार आचार्य आनन्दवर्धन ही 'ध्वनिकार' हैं तथा कारिका और वृत्तिग्रन्थ के प्रणेता हैं। इस प्रकार 'लोचन' के जिस भेद-व्यवहार को म० म० काणे भिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का साधन, समझते हैं उसे डॉ० मुकर्जी 'functional' मानते हैं। 'लोचन' इस निर्णय में इसलिए सबसे अधिक महत्त्व रखता है कि वह 'ध्वन्यालोक' के निर्माण के १५० वर्ष पश्चात् निर्मित हुआ है । म० म० काणे ने सबसे पहले 'लोचन' के उन स्थलों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है जिनमें वृत्तिकार को 'ग्रन्थकृत' या 'ग्रन्थकार' निर्देश किया गया है और कारिका के रचयिता के लिए 'मूलग्रन्थकृत' (ऊपर निर्दिष्ट 'अस्मन्मूलग्रन्थकृता') कहा गया है । ध्वन्यालोक की प्रथम कारिका की वृत्ति में लिखा है—'तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोकः- यस्मिन्नस्ति त वस्तु०' इत्यादि । पृ० २७-२९ इस पर 'लोचन' का निर्देश है—'तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनो- रथनाम्ना कविना ।'