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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( २५ ) किसी प्राचीन लेखक का निर्माण माना है, जिसकी वृत्ति आनन्दवर्धनाचार्य द्वारा लिखी गई है । और भी, जिन विद्वानों ने कारिका और वृत्ति भागों का भिन्नकर्तृकत्व माना है उनमें प्रसिद्ध हैं— श्री सोवानी ( Sovani ) प्रो० शिव प्रसाद भट्टाचार्य, श्री के० गोडा वर्मा आदि । इसके विपरीत, दोनों भागों को अभिन्नकर्तृक मानने वाले विद्वानों का एक प्रबल दल भी हुआ, जिसमें प्रसिद्ध हैं—स्व० म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री, डॉ० सातकरी मुकर्जी, डॉ० शङ्करन्, डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय, डॉ० कृष्णमूर्ति और प्रो० मनकद् आदि । जैसा कि ऊपर डॉ० बूहलर और काव्यमाला सं० के सम्पादकों का निर्देश किया गया है, इस समस्या का मूल कारण है आचार्य अभिनवगुप्त का ‘ध्वन्यालोक’ पर ‘लोचन’ व्याख्यान, जिसमें अनेक स्थलों में कारिकाकार ( ˚कृत् ) और वृत्तिकार ( ˚कृत् ) को भिन्न रूप में निर्देश किया गया है और साथ ही वृत्तिग्रन्थ के रचयिता को ‘ग्रंथकार’ और कारिकाग्रन्थ के रचयिता को मूलग्रन्थकार ( ˚कृत् ) तथा कारिकाग्रन्थ को ‘मूलकारिका’ कहा गया है । म० म० काणे महाशय ने अपने ‘History of Sanskrit Poetics’ ( तृतीय सं० पृ० १६५ ) में ‘लोचन’ टीका के महत्त्वपूर्ण स्थलों को, जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार का भेद प्रतीत होता है, इस क्रम से उद्धृत किया है— १. ‘अत एव मूलकारिका साक्षात्तन्निराकरणार्था न श्रूयते । वृत्तिकृत्तु निराकृतमपि प्रमेयशय्यापूरणाय कण्ठेन तत्पक्षमनूद्य निराकरोति—येऽपीत्यादिना ।···तत्र ( तेनात्र ) प्रथमोद्योते ध्वनेः सामान्यलक्षणमेव कारिकाकारेण कृतम् । द्वितीयोद्योते कारिकाकारो- ऽवान्तरविभागं विशेषलक्षणं च विदधदनुवादमुखेन मूलविभागं द्विविधं सूचितवान् । तदाशयानुसारेण तु वृत्तिकृदत्रैवोद्योते मूलविभागमवोचत्०’ । पृ० १७० २. ‘न चैतन्मयोक्तम् , अपि तु कारिकाकाराभिप्रायेणेत्याह तन्नेति । भवति मूलतो द्विभेदत्वं कारिकाकारस्यापि सम्मतमेवेति भावः ।’ पृ० १७३ ( इस सं० में काशी चौखम्बा सं० के अनुसार ‘न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्’ पाठ है । ) ३. ‘उक्तमेव ध्वनिस্বরূপं तदाभासविवेकहेतुतया कारिकाकारोऽनुवदतीत्यभिप्रायेण वृत्तिकृदुपस्कारं ददाति ।’ पृ० ३०९ ४. ‘एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम् । वृत्तिकारेण तु दर्शितम् । न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ?’ पृ० ३१२ ५. ‘कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु बीभत्सादी कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनुसर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।’ पृ० ३२९ ६. ‘प्रतिपादितमेवैषामलम्बनम्’ ध्व० के इस कथन पर ‘लोचन’ का निर्देश है— ‘अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः ।’ पृ० ३४० ७. ‘एवमादौ विषये यथौचित्यात्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे’ इस ध्व० पर ‘लोचन’ का कथन है—‘दर्शितमेवेति । कारिकाकारेणेति भूतप्रत्ययः ।’ पृ० ३४७