भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

( २४ ) आचार्य अभिनवगुप्त के जीवन, ग्रन्थ आदि विषयों पर विस्तृत मौलिक अनुसन्धान के लिए आकलनीय है डा० कान्तिचन्द्र पाण्डेय का अंग्रेजी में लिखा—'अभिनवगुप्त' (चौखम्बा प्रकाशन ) । 'लोचन'—'ध्वन्यालोक' पर आचार्य अभिनवगुप्त की यह टीका इसी नाम से प्रसिद्ध है, किन्तु विभिन्न पाण्डुलिपियों में इसे सहृदयालोकलोचन और काव्यालोकलोचन भी कहा है। आचार्य को परवर्ती ग्रन्थकारों ने 'लोचनकार' के नाम से स्मरण किया है, स्वयं आचार्य ने 'लोचन' नाम की सार्थकता इन शब्दों में निर्दिष्ट की है— किं लोचनं विनाऽऽलोको भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात् ॥ पृ० १७१ साहित्यशास्त्र में 'लोचन' व्याख्यान का स्थान 'महाभाष्य' के सदृश है। 'लोचन' से पूर्व 'ध्वन्यालोक' पर 'चन्द्रिका' नाम की व्याख्या लिखी गई थी, जैसा कि ऊपर उद्धृत श्लोक में आचार्य ने उसका संकेत किया है—भाति चन्द्रिकयाऽपि हि । उन चन्द्रिकाकार का उल्लेख 'लोचन' में अनेक स्थलों पर है ( पृ० ४३४; ४५१ ) । चन्द्रिकाकार सम्भवतः अभिनवगुप्त के ही कोई सम्बन्धी थे। 'इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन' कहते हुए कई स्थलों पर लोचनकार ने अपने पूर्व के किसी टीकाकार की आलोचना भी की है। महिमभट्ट ने भी 'व्यक्तिविवेक' में 'चन्द्रिका' व्याख्या की सूचना दी है— ध्वनिवर्त्मन्यतिगहने स्खलितं वाण्याः पदे पदे सुलभम् । रभसेन यत्प्रवृत्ता प्रकाशकं चन्द्रिकाद्यदृष्ट्वैव ॥ 'चन्द्रिका' ईसा की ९००-९५० शती में लिखी गई होगी। कारिकाकार और वृत्तिकार ध्वन्यालोक का कारिकाभाग और वृत्तिभाग भिन्न कर्ताओं द्वारा रचित हैं अथवा दोनों एक कर्ता के निर्माण हैं, इस सम्बन्ध में आधुनिक विद्वानों का बहुत पहले से तीव्र मतभेद है। इस समस्या का श्रीगणेश डॉ० बूहलर ने 'कश्मीर रिपोर्ट' में इन शब्दों में किया था— “From Abhinavagupta's ṭīkā it appears that verses ( कारिका ) are the composition of Some older writer, whose name is not given. But it is remarkable that they contain no मङ्गलाचरण” ( पृ० ६५, श्री विष्णुपद भट्टाचार्य के ध्व० पर introduction से उद्धृत ) । तत्पश्चात् ध्वन्यालोक के काव्यमाला संस्करण ( निर्णयसागर प्रेस, बम्बई ) के सम्पादकों (श्री पं० दुर्गाप्रसाद आदि ) ने भी अपने वक्तव्य में कारिकाभाग का नाम 'ध्वनि' और वृत्तिभाग का नाम 'आलोक' मानते हुए दोनों ग्रन्थों को आचार्य अभिनवगुप्त के 'लोचन' के उल्लेखों के आधार पर भिन्नकर्तृक ही स्वीकार किया है। फिर महामहोपाध्याय (अब भारतरत्न ) श्री पी० वी० काणे महाशय ने अपने सुप्रसिद्ध अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में भिन्नकर्तृकत्व की समस्या उठाई है और अनेक अन्तर्बाह्य प्रमाणों के आधार पर भिन्नकर्तृकत्व के पक्ष का स्थापन किया है। डॉ० सुशीलकुमार डे महाशय ने भी अपने अलङ्कार-साहित्य के इतिहास में कारिका भाग को