ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) द्वारा ध्वन्यालोक का नाम 'सहृदयहृदयालोक' भी निर्देश किया गया है। दूसरे अंश में स्पष्ट ही आनन्दवर्धनाचार्य का नाम लेकर कारिकाग्रन्थ को उनके कथन के रूप में निर्देश किया गया है। इस पर भिन्नकर्तृत्व पक्ष से म० म० काणे महाशय का कहना है कि जैसा कि उपर्युक्त अंश से विदित होता है अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती को लोचन के पश्चात् लिखा था। लोचन में अभिनवगुप्त के मान्य गुरु थे इन्दुराज, जिनकी व्याख्याओं का लोचनकार ने पूर्ण रूप से अनुसरण किया है तथा नाट्यशास्त्र का अध्ययन उन्होंने भट्टतौत से किया था, जैसा कि अभिनवभारती की प्रस्तावना के पद्य से एवं और भी स्थलों से प्रतीत होता है तथा अभिनवगुप्त ने भट्टतौत-रचित 'काव्यकौतुक' नाम के ग्रन्थ पर 'विवरण' लिखा था, यह लोचन से विदित होता है (पृ० ४३४)। इसलिए यह सम्भव है कि अभिनव कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में अपने गुरु भट्टतौत का विचार साधारणतः प्रस्तुत किया है, क्योंकि बाद के सभी ग्रन्थकारों ने कारिकाकार और वृत्ति- कार को अभिन्न समझा है। म० म० काणे का पक्ष यहाँ कुछ दुर्बल लगता है, क्योंकि वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि ध्वन्यालोक की कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में विवाद अभिनवगुप्त के पहले से चल रहा है, किन्तु मैं नहीं समझता कि यह विवाद प्राचीन है, बल्कि जब से डॉ० वूहलर ने लिखा और काव्यमाला के सम्पादकों ने दोनों को भिन्न मान लिया तभी से यह विवाद चल पड़ा है। 'मया वृत्तिकारेण सता' (लो० पृ० १७३) इस अंश पर डॉ० मुकर्जी के अनुसार काणे महाशय ने ठीक ध्यान नहीं दिया है। डॉ० मुकर्जी ने इसका अनुवाद किया है 'by me, in the capacity of vṛttikār'। काणे महाशय का कहना है कि यदि कोई अपना दिमाग पूर्ण रूप से बना ले कि कारिका और वृत्ति के कर्ता अभिन्न हैं, तब केवल यह अनुवाद ठीक हो सकता है। (capacity) के लिए मूल में कोई शब्द नहीं है। शाब्दिक अनुवाद (Literal trans- lation) है—'by me who am वृत्तिकार'। म० म० काणे महाशय प्रस्तुत प्रकरण के 'अभिप्राय' और 'सम्मत' प्रयोगों पर विशेष ध्यान देते हैं और इन्हें अपने पक्ष भिन्नकर्तृत्व के अनुकूल मानते हैं। (चौ० काशी संस्करण में 'न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्' पाठ है, किन्तु इस काव्य- माला सं० में 'उत्सूत्रं' का प्रयोग नहीं मिलता, जो तीन प्रतियों पर आधारित है, काशी संस्करण का आधार विदित नहीं)। तृतीय उद्योत के आरम्भ का वृत्तिग्रन्थ इस प्रकार है—"एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जकमुखेन तत्प्रकाश्यते।" इस पर लोचन का अंश है—"यस्तु व्याचष्टे व्य- ङ्ग्यानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन' इति स एवं प्रष्टव्यः—एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम्। वृत्तिकारेण तु दर्शितम्। न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति। ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृता भवति। अविवक्षितवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनसगोत्रैः साकं विवादेन।" (पृ० ३१२) वृत्तिग्रन्थ में यह कहा गया है कि व्यङ्ग्य के प्रकार से (व्यङ्ग्यमुखेन) ध्वनि का प्रभेदों- सहित स्वरूप दिखाया जा चुका, फिर व्यञ्जक के प्रकार से (व्यञ्जकमुखेन) उसे प्रकाशित करते हैं। लोचन के अनुसार लोचन के पहले लिखी हुई 'चन्द्रिका' व्याख्या में 'व्यङ्ग्यमुखेन' का अर्थ