भारतकोश
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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

( ३४ ) द्वारा ध्वन्यालोक का नाम 'सहृदयहृदयालोक' भी निर्देश किया गया है। दूसरे अंश में स्पष्ट ही आनन्दवर्धनाचार्य का नाम लेकर कारिकाग्रन्थ को उनके कथन के रूप में निर्देश किया गया है। इस पर भिन्नकर्तृत्व पक्ष से म० म० काणे महाशय का कहना है कि जैसा कि उपर्युक्त अंश से विदित होता है अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती को लोचन के पश्चात् लिखा था। लोचन में अभिनवगुप्त के मान्य गुरु थे इन्दुराज, जिनकी व्याख्याओं का लोचनकार ने पूर्ण रूप से अनुसरण किया है तथा नाट्यशास्त्र का अध्ययन उन्होंने भट्टतौत से किया था, जैसा कि अभिनवभारती की प्रस्तावना के पद्य से एवं और भी स्थलों से प्रतीत होता है तथा अभिनवगुप्त ने भट्टतौत-रचित 'काव्यकौतुक' नाम के ग्रन्थ पर 'विवरण' लिखा था, यह लोचन से विदित होता है (पृ० ४३४)। इसलिए यह सम्भव है कि अभिनव कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में अपने गुरु भट्टतौत का विचार साधारणतः प्रस्तुत किया है, क्योंकि बाद के सभी ग्रन्थकारों ने कारिकाकार और वृत्ति- कार को अभिन्न समझा है। म० म० काणे का पक्ष यहाँ कुछ दुर्बल लगता है, क्योंकि वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि ध्वन्यालोक की कारिका और वृत्ति के कर्तृत्व के सम्बन्ध में विवाद अभिनवगुप्त के पहले से चल रहा है, किन्तु मैं नहीं समझता कि यह विवाद प्राचीन है, बल्कि जब से डॉ० वूहलर ने लिखा और काव्यमाला के सम्पादकों ने दोनों को भिन्न मान लिया तभी से यह विवाद चल पड़ा है। 'मया वृत्तिकारेण सता' (लो० पृ० १७३) इस अंश पर डॉ० मुकर्जी के अनुसार काणे महाशय ने ठीक ध्यान नहीं दिया है। डॉ० मुकर्जी ने इसका अनुवाद किया है 'by me, in the capacity of vṛttikār'। काणे महाशय का कहना है कि यदि कोई अपना दिमाग पूर्ण रूप से बना ले कि कारिका और वृत्ति के कर्ता अभिन्न हैं, तब केवल यह अनुवाद ठीक हो सकता है। (capacity) के लिए मूल में कोई शब्द नहीं है। शाब्दिक अनुवाद (Literal trans- lation) है—'by me who am वृत्तिकार'। म० म० काणे महाशय प्रस्तुत प्रकरण के 'अभिप्राय' और 'सम्मत' प्रयोगों पर विशेष ध्यान देते हैं और इन्हें अपने पक्ष भिन्नकर्तृत्व के अनुकूल मानते हैं। (चौ० काशी संस्करण में 'न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्' पाठ है, किन्तु इस काव्य- माला सं० में 'उत्सूत्रं' का प्रयोग नहीं मिलता, जो तीन प्रतियों पर आधारित है, काशी संस्करण का आधार विदित नहीं)। तृतीय उद्योत के आरम्भ का वृत्तिग्रन्थ इस प्रकार है—"एवं व्यङ्ग्यमुखेनैव ध्वनेः प्रदर्शिते सप्रभेदे स्वरूपे पुनर्व्यञ्जकमुखेन तत्प्रकाश्यते।" इस पर लोचन का अंश है—"यस्तु व्याचष्टे व्य- ङ्ग्यानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन' इति स एवं प्रष्टव्यः—एतत्तावत्त्रिभेदत्वं न कारिकाकारेण कृतम्। वृत्तिकारेण तु दर्शितम्। न चेदानीं वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति। ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृभेदे का सङ्गतिः ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्गतिः कृता भवति। अविवक्षितवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनसगोत्रैः साकं विवादेन।" (पृ० ३१२) वृत्तिग्रन्थ में यह कहा गया है कि व्यङ्ग्य के प्रकार से (व्यङ्ग्यमुखेन) ध्वनि का प्रभेदों- सहित स्वरूप दिखाया जा चुका, फिर व्यञ्जक के प्रकार से (व्यञ्जकमुखेन) उसे प्रकाशित करते हैं। लोचन के अनुसार लोचन के पहले लिखी हुई 'चन्द्रिका' व्याख्या में 'व्यङ्ग्यमुखेन' का अर्थ

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किया है, वस्तु, अलङ्कार और रस इन तीन व्यङ्ग्यों के प्रकार से । लोचनकार इस व्याख्यान पर आपत्ति करते हैं तथा प्रश्न करते हैं कि इन तीन भेदों को वृत्तिकार ने निर्देश किया है, कारिकाकार ने नहीं । फिर अब वृत्तिकार भेद का प्रकाशन नहीं कर रहे हैं । जब कि कर्ता का भेद है (कारिका- कार और वृत्तिकार को भिन्न मानते हैं) तो यह कहने में क्या सङ्गति है 'कि (वृत्तिकार) यह कर चुके हैं और (कारिकाकार) यह कर रहे हैं ? म० म० काणे को यह स्पष्ट है कि चन्द्रिकाकार कर्तृभेद का विचार रखते थे, और लोचन का कहना है कि 'व्यङ्ग्यमुखेन' का जो व्याख्यान 'चन्द्रिका' ने किया है उसकी सङ्गति नहीं बैठती । जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या नहीं मिल जाती, इसे स्पष्ट रूप से कहना सम्भव नहीं कि चन्द्रिका- कार कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानते थे अथवा अभिन्न । डॉ० मुकर्जी प्रस्तुत वृत्तिग्रन्थ के लोचन व्याख्यान को क्लिष्ट एवं गलत समझते हैं और 'चन्द्रिका' के व्याख्यान को बहुत कुछ सन्तोषजनक एवं दृढ़ (consistent) मानते हैं । क्योंकि ऐसा नहीं कि वस्तु, अलङ्कार और रस का विभाग कारिका में नहीं हुआ है, बल्कि २।३ कारिका में रस ध्वनि का निर्देश है, २।२१ में शब्दशक्त्युद्भव पर आधारित अलङ्कारध्वनि पर विचार किया है, २।२२-२४ कारिकाओं में वस्तु- ध्वनि का निरूपण किया गया है । ऐसी स्थिति में अभिनवगुप्त का यह कहना कि ये तीनों व्यङ्ग्यभेद केवल वृत्तिकार ने किया है, कारिकाकार ने नहीं, सङ्गत नहीं । और, डॉ० मुकर्जी के अनुसार अभिनवगुप्त यह भूल गए हैं कि वृत्तिकार एक भी वस्तु प्रस्तुत नहीं कर सकते जो कारिकाकार की अभिप्रेत अथवा उनकी पोषित नहीं है । अन्यथा व्याख्यान 'उत्सूत्र' होगा । डॉ० मुकर्जी के इस विचार से डॉ० कृष्णमूर्ति सहमत नहीं हैं । यद्यपि डॉ० मुकर्जी ने अपने निबन्ध में 'कर्तृभेदे' के कर्ता को ग्रन्थकार ही माना था किन्तु अब उन्होंने 'Indian Culture' (भाग १२, पृ० ५७- ६०) में दूसरी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसमें कर्तृ का अर्थ है केवल कर्ता (grammatical agent of an action), न कि ग्रन्थ का कर्ता । अस्तु, यह मानते हुए कि 'कर्तृभेदे' का अर्थ अभी तक कोई स्थिर रूप से नहीं प्रस्तुत किया जा सका है, फिर हम विद्वानों पर ही इसका निर्णय छोड़ते हैं । वृत्तिग्रन्थ में 'परिकरश्लोक', 'संग्रहश्लोक' और 'संक्षेपश्लोक' के साथ और 'तदयमत्र परमार्थः', 'तदिदमुक्तं', और 'तदिदमुच्यते' के साथ अनेक श्लोकों को प्रस्तुत किया गया है । जिनमें बहुत से श्लोक कुछ कारिकाओं से अधिक अर्थगर्भित हैं । म० म० काणे महाशय का कहना है कि यदि दोनों (कारिकाकार और वृत्तिकार) अभिन्न हैं तो क्यों उस व्यक्ति ने उन उत्तम श्लोकों को कारिकाओं में न रख कर वृत्ति में अप्रधान स्थिति में रखा ? काणे महाशय के अनुसार अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी, डॉ० कृष्णमूर्ति और डॉ० के० सी० पाण्डेय में किसी ने इसका सन्तोषजनक व्याख्यान नहीं किया है । आचार्य मम्मट ने जो अपने काव्यप्रकाश के कारिकाकार और वृत्तिकार भी हैं इसी प्रकार वृत्ति में परिकरश्लोक अथवा संग्रहश्लोक क्यों नहीं दिया ? डॉ० कृष्णमूर्ति के अनुसार आनन्दवर्धन ने पहले कारिकाएं लिखीं और अपने शिष्यों को उन्हें पढ़ाया, तब कुछ समय बाद वृत्ति का निर्माण किया । काणे महाशय इसे नहीं मानते, क्योंकि यदि यह माना भी जाय तो लेखक को क्या बाधक हुआ कि उसने इन पद्यों को कारिकाओं के रूप में नहीं लिखा ।

( ३६ ) लोचन के इस वाक्य को भी अभिन्नकर्तृत्व की सिद्धि में उपस्थापित किया जाता है—'प्रक्रा- न्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याशयेन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति' (पृ० २७१)। म० म० काणे इसे भी अभिन्नकर्तृकत्व की सिद्धि का प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि यहाँ भी कारिका वृत्ति का भाग बन गई है। यहाँ लोचन कहता है कि कारिका (२।२३) ने दो प्रकारों (varieties) का निर्देश किया है और वृत्ति ने तृतीय को भी संलग्न कर दिया है। यदि अभिन्नकर्तृकत्व है तो कारिका में क्यों नहीं तीनों का निर्देश किया गया और क्यों वृत्ति उत्सूत्र व्याख्यान के अपराध से युक्त हुई ? किन्तु यदि विचार किया जाय तो यह लगता है कि एक ही कारिका वाक्य से दो प्रकारों का उपसंहार और तृतीय प्रकार का सूचन करता हूँ इस आशय से वृत्तिकार साधारण रूप से अवतरण देते हैं—'तथा च'। अर्थात् 'तथा च' यह वृत्तिग्रन्थ कारिकाग्रन्थ को अपनी कुक्षि में ले लेता है, इसे ही म० म० काणे कारिका का वृत्ति का भाग हो जाना कहते हैं। इतने मात्र से अभिन्नकर्तृकत्व का पक्ष निराकृत नहीं हो जाता है। डॉ० के० सी० पाण्डेय ने प्रश्न उठाया है कि लोचन केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान है अथवा कारिका और वृत्ति दोनों का। इस प्रकार यदि यह सिद्ध हो जाता है कि लोचन दोनों का व्याख्यान है तब दोनों के एककर्तृक मानने में आपत्ति नहीं होगी। किन्तु म० म० काणे लोचन को केवल वृत्तिग्रन्थ का व्याख्यान सिद्ध करते हैं, क्योंकि 'काव्यालोक', जिसके व्याख्यान के लिए लोचनकार प्रवृत्त हैं वह वृत्तिग्रन्थ है न कि कारिकाग्रन्थ। कारिकाग्रन्थ को केवल ध्वनिकारिका या ध्वनि कहते थे। यही कारण है कि लोचनकार ने आरम्भ में वृत्तिग्रन्थ के मङ्गलाचरण के व्याख्यान से 'लोचन' का आरम्भ किया और 'आदिवाक्य' के रूप में प्रथम कारिका का निर्देश मात्र करके उस पर के वृत्तिग्रन्थ के व्याख्यान में लग जाते हैं। हाँ, जहाँ कारिकाग्रन्थ पर वृत्ति बहुत संक्षिप्त है वहाँ लोचन कारिका के कुछ शब्दों का व्याख्यान करता है, किन्तु ऐसे स्थल बहुत कम हैं। साथ ही, काणे महाशय का यह भी तर्क है कि यदि कारिका और वृत्ति एक ही व्यक्ति की रचनाएं हैं तो कारिकाओं के टुकड़े और उनमें वृत्ति का छिटफुट नियोजन समान रूप से होना चाहिए था, किन्तु ऐसी समानता नहीं है, वृत्ति की किसी पाण्डुलिपि में कारिकाएं टुकड़ों में पढ़ी गई हैं और किसी में पूरी कारिकाएँ पढ़ी गई हैं। यद्यपि 'काव्यप्रकाश' में कारिकाएं तोड़-तोड़ कर बीच में वृत्ति के साथ भी रखी गई हैं, तथापि वहाँ ऐसी अव्यवस्था नहीं है। ध्वन्यालोक के अन्त में दो पद्य हैं—'इत्यक्लिष्ट०' और 'सत्काव्यतत्त्व०'। 'इति' पर टिप्पणी करते हुए अभिनवगुप्त लिखते हैं—'इतीति कारिकातद्वृत्तिनिरूपणप्रकारेणेत्यर्थः', अर्थात् कारिका और उसकी वृत्ति के निरूपण के प्रकार से। डॉ० मुकर्जी के अनुसार यह टिप्पण सूचित करता है कि अभिनवगुप्त कारिका और वृत्ति को एक व्यक्ति की रचना मानते हैं। दूसरा श्लोक आनन्द- वर्धन को सुधियों के मन में काव्य के चिरप्रसुप्तकल्पतत्त्व को प्रवृत्त करने वाला बताता है, इसका अर्थ है कि आनन्दवर्धन ने ही पहले पहल ध्वनिमार्ग का आलोकन कारिका और वृत्ति द्वारा किया, और भी, ठीक इसी प्रकार तृतीय उद्योत की ४६वीं कारिका के अनुसार जो यह काव्यतत्त्व अस्फुट रूप से स्फुरित था उसका व्याख्यान करने में असमर्थ लोगों ने रीतियों का मार्ग प्रवर्तित किया, दोनों

१. प्रथम उद्योत: ध्वनि-लक्षण, वाच्यार्थ-व्यङ्ग्यार्थ विवेक एवं अभाववाद खण्डन

( ३७ ) बातें सिद्ध करती हैं कि कारिकाकार और वृत्तिकार एक व्यक्ति है और वह हैं आचार्य आनन्दवर्धन । किन्तु म० म० काणे महाशय को भाण्डारकर संस्थान की सभी प्रतियों तथा ध्वन्यालोक के प्राप्त तीनों संस्करणों में 'इत्यक्लिष्ट०' के स्थान पर 'नित्याक्लिष्ट०' मिलता है, जबकि डॉ० डे द्वारा प्रकाशित चतुर्थ उद्योत के लोचन में 'इति' पर टिप्पण मिलता है तब वही सबसे अधिक प्रामाणिक पाठ मानने योग्य है । फिर भी म० म० काणे डॉ० मुकर्जी के विचारों से सहमत नहीं। उनके अनुसार आनन्दवर्धन ने प्राचीन कारिकाग्रन्थ का व्याख्यान किया है, इसका निर्देश 'व्याकरोत्' शब्द ( तद् व्याकरोत् सहृदयोदयलाभहेतोः ) सूचित करता है । कारिका २।५ में 'मे मतिः' की वृत्ति है—'मामकीनः पक्षः' इस पर भी अभिन्नकर्तृकत्ववादियों और भिन्नकर्तृकत्ववादियों का विचार-वैषम्य है। प्रथम के अनुसार यदि कारिकाकार और वृत्तिकार भिन्न होते तो 'मे मतिः' का व्याख्यान 'मामकीनः पक्षः' न करके कुछ भिन्न ही करते, इसके विपरीत दूसरे पक्ष का कहना है कि वृत्तिकार ने केवल यहाँ व्याख्यान के रूप में 'मामकीनः पक्षः' लिखा है, इससे दोनों का अभेद सिद्ध नहीं होता । न्यायमञजरी के रचयिता जयन्तभट्ट ने ध्वनिसिद्धान्त की आलोचना की है । जयन्त अवन्तिवर्मा के, जिनकी सभा में आनन्दवर्धन थे, अव्यवहित उत्तराधिकारी शङ्करवर्मा के समसामयिक थे । वह लिखते हैं— 'यम्मन्यः पण्डितम्मन्यः प्रपेदे कञ्चन ध्वनिम् । विधेर्निषेधावगतिर्विधिबुद्धिर्निषेधतः ॥ यथा — भम धम्मिअ वीसत्थो मा स्म पान्थ गृहं विश । मानान्तरपरिच्छेद्यवस्तुरूपोपदेशिनाम् ॥ शब्दानामेव सामर्थ्यं तत्र तत्र तथा तथा । अथवा नेदृशी चर्चा कविभिः सह शोभते ॥' ( न्यायमञ्जरी, चौ० सं०, भाग १, पृ० ४५ ) डॉ० मुकर्जी के अनुसार यह स्पष्ट है कि जयन्त यहाँ ध्वन्यालोक की वृत्ति ( स हि कदाचिद् वाच्ये विधिरूपे प्रतिषेधरूपः-यथा-भम धम्मिअ०, क्वचिद् वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा—अत्ता एत्थ०, पृ० ५१, ७१ ) का निर्देश करते हैं और समझते हैं कि वह सिद्धान्त एक व्यक्ति द्वारा प्रकाशित किया गया । डॉ० मुकर्जी के यह समझने का आधार इस उद्धरण में प्रयुक्त 'प्रपेदे' शब्द है, जिसका अनुवाद उन्होंने 'propounded' किया है, किन्तु म० म० काणे महाशय के अनुसार अनुवाद होगा—'Restorted to or adopted'। इस प्रकार इनके अनुसार प्रस्तुत उद्धरण का अर्थ होगा ध्वनि का सिद्धान्त पहले से था जिसे एक पण्डितम्मन्य ने स्वीकार किया । श्री काणे ने यह भी सम्भावना की कि जयन्त आनन्दवर्धन के समसामयिक थे, जैसा कि उनके पुत्र अभिनन्द ने कादम्बरीकथासार में कहा है कि जयन्त कर्कोटक वंश के राजा मुक्तापीड के मन्त्री शक्तिस्वामी के परनाती थे ।

( ३८ ) श्री गोडा वर्मा ने कुछ ऐसे कारिका और वृत्ति के विरोधी स्थलों का निर्देश किया है जिनसे कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने का अनुमान होता है, उनके द्वारा निर्दिष्ट कुछ स्थल काणे महाशय के अनुसार विचारणीय हैं । ( क ) कारिका १।४ ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०’ (पृ० ४७) में वृत्ति ने ‘प्रसिद्ध’ की दो व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं—‘यत्तत्सहृदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धेभ्योऽलङ्कृतेभ्यः प्रतीतेम्यो वाऽवयवेभ्यो व्यतिरिक्तत्वेन प्रकाशते’; ‘लोचन’ का भी निर्देश है—‘प्रसिद्धशब्दस्य सर्वप्रतीतत्वमलङ्कृतत्वं चार्थः’ ( पृ० ४८ ) । यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक व्यक्ति थे तो वह वृत्ति में एक अर्थ करते । ( ख ) कारिका २।१० है—‘समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥’ ( पृ० २२४ ) इसमें ‘सर्वरसान् प्रति’ के अनुसार ‘सर्वसाधारणक्रियः’ का ‘सर्व’ शब्द ‘सर्वरस’ का निर्देशक है, किन्तु वृत्ति में ‘सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च’ है, इस प्रकार दूसरी व्याख्या अनावश्यक है और ( डॉ० मुकर्जी ने जैसा कि कहा है ) ‘उत्सूत्रव्याख्यान’ है । ( ग ) ३।१९ कारिका का उत्तरार्ध है—‘रसंस्य स्याद् विरोध्याय वृत्त्यनौचित्यमेव वा ।’ इसकी वृत्ति में ‘वृत्ति’ शब्द के तीन अर्थ हैं । ( श्री वर्मा के लेख का यह उद्धरण श्री काणे महाशय ने अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है ) । म० म० काणे महाशय ग्रन्थ के नाम के सम्बन्ध में निर्देश करते हैं कि ग्रन्थ की पुष्पिकाओं ( Colophons ) में इसे प्रायः सहृदयालोक, सहृदयहृदयालोक, काव्यालोक, काव्यालङ्कार और ध्वनि कहा गया है । लोचन के आरम्भिक दूसरे पद्य में ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ निर्दिष्ट है ( यत्किञ्चिदप्यनुसरन् स्फुटयामि काव्य;लोकं सुलोचननियोजनया जनस्य ) । लोचन (चतुर्थ उद्योत) के अन्त का द्वितीय श्लोक आनन्दवर्धन के ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालोक’ कहता है ( आनन्दवर्धन- विवेकविकासिकाव्यालोकार्थतत्त्वघटनादनुमेयसारम् ) । अभिनवभारती में स्वयं अभिनवगुप्त ने इसे ‘सहृदयालोक’ कहा है । चतुर्थ उद्योत के वृत्तिग्रन्थ के अन्त में ‘काव्याख्येऽखिलसौख्यधाम्नि विबुधो- द्याने ध्वनिदर्शितः’ के अनुसार ‘काव्य’ शब्द मूलग्रन्थ के नाम का भाग है, अथवा स्वयं नाम है, जिस पर आनन्दवर्धन ने वृत्ति लिखी ( सम्भवतः उसे काव्यध्वनि कहा जाता हो अथवा काव्य या ध्वनि ) । ३।४७ कारिका के अनुसार कारिकाएं ‘काव्यलक्षण’ हैं ( वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ) । इस प्रकार वृत्ति को ‘काव्यालोक’ या ‘ध्वन्यालोक’ कहा गया । कहना कठिन है कि ‘सहृदयालोक’ इस ग्रन्थ को कैसे कहा गया । डॉ० सोवानी का विचार है कि ‘सहृदय’ कारिकाओं के रचयिता का नाम है । मुकुल की ‘अभिधावृत्तिमातृका’, जो ‘लोचन’ से लगभग सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी, लक्षणा में ध्वनिमार्ग को अन्तर्भूत करते हुए ‘ध्वनि’ को नूतन रूप से किन्हीं सहृदय द्वारा उपवर्णित बताती है—‘लक्षणामाग्र्गाविगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोपवर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मीलयितुमिद- मत्रोक्तम्’ ( पृ० २१ ); इसी प्रकार मुकुल लिखते हैं—‘तथाहि तत्र विवक्षितान्यपरता सहृदयैः काव्य- वर्त्मनि निरूपिता’ ( पृ० १९ ) । यह स्पष्ट रूप से निर्देश करता है कि जब मुकुल ने ( लगभग ९००–९२५ ई० ) लिखी उस समय ध्वनि नया सिद्धान्त था और ‘सहृदय’ ने उसे प्रतिपादित किया था । इसी प्रकार, मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज कहते हैं—‘ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्ला- दिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दव्यापारास्पृष्टत्वेन प्रतीयमानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभि- व्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृदयैर्ध्वनिर्नाम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः’ ( पृ० ७९ ) । इन उदाहरणों से प्रतीत होता है कि बहुत सम्भव है, सहृदय रचयिता का नाम है

( ३६ ) जिसने ध्वनि सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, अथवा बहुत अधिक सम्भव है कि यह उसके प्रशंसकों की दी हुई उपाधि हो । राजशेखर ने 'आनन्द' का नाम लेते हुए 'काव्यमीमांसा' में 'अव्युत्पत्तिकृतो दोषः०' इस श्लोक को उद्धृत किया है जो ध्वन्यालोक के वृत्तिग्रन्थ का परिकर श्लोक है (पृ० ३४६) । इससे प्रतीत होता है कि ९००-९२५ ई० के लगभग यह सर्वविदित था कि आनन्दवर्धन वृत्ति के रचयिता थे । इससे अभिन्नत्व सिद्ध नहीं होता । जल्हण की सूक्तिमुक्तावली में राजशेखर के नाम से यह श्लोक उद्धृत है— 'ध्वनिनाऽतिगभीरेण काव्यतत्त्वनिवेशिना । आनन्दवर्धनः कस्य नासीदानन्दवर्धनः ॥' इससे प्रतीत होता है कि आनन्दवर्धन ने 'ध्वनि' की स्थापना की । प्रतीहारेन्दुराज के उद्धरणों से विदित होता है कि वह कारिका और वृत्ति दोनों के रचयिता को 'सहृदय' कहते हैं । 'वक्रोक्तिजीवित' ( कुन्तकरचित ) रूढ़िवक्रता के उदाहरण में आनन्दवर्धन के निजी श्लोक 'ताला जाअन्ति गुणा०' (पृ० १७८) को रखा तथा निर्देश किया—'ध्वनिकारेण व्यङ्ग्यव्यञ्जक- भावोऽत्र सुतरां समर्थितः किं पौनरुक्त्येन ।' इस प्रकार वक्रोक्तिजीवित आनन्दवर्धन को 'ध्वनिकार' कहता हैं । 'लोचन' के बहुत कुछ समसामयिक महिमभट्ट के 'व्यक्तिविवेक' में कारिका और वृत्तिग्रन्थों के लेखक का पृथक्करण नहीं किया है। ध्वनिकार के नाम से कारिकाग्रन्थ और वृत्तिग्रन्थ दोनों को आचार्य कुन्तक ने उद्धृत किया है। यहाँ तक कि 'अर्थो वाच्यविशेष इति स्वयं विवृतत्वाच्च' (पृ० ८२) के द्वारा स्पष्ट कह दिया कि कारिकाओं के रचयिता ने ही स्वयं वृत्ति लिखी है । 'औचित्यविचारचर्चा' में क्षेमेन्द्र ने 'विरोधी वाविरोधी वा०' (३।२४) इस कारिका को आनन्दवर्धन के नाम के साथ उद्धृत किया है । हेमचन्द्र ने 'काव्यानुशासन' में 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव०' ( १।४) को आनन्दवर्धन की लिखा है। साहित्यदर्पणकार ने भी कारिका और वृत्तिग्रन्थों को ध्वनिकार की रचना बताई है । इस परिस्थिति में जब कि कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न होने और न होने, दोनों के विरोधी प्रमाण मिलते हैं, दो ही रचनाएं समस्या का समाधान कर सकती थीं, एक तो 'चन्द्रिका' व्याख्या, जो लोचन से पूर्व ध्वन्यालोक पर लिखी गई थी, दूसरी भट्टनायक का 'हृदयदर्पण', जिसमें ध्वन्यालोक की खूब आलोचना की गई थी, किन्तु दुर्भाग्य से दोनों रचनाएं अभी तक उपलब्ध नहीं की जा सकी हैं। म० म० काणे महाशय का ख्याल है कि यदि लोचन का उपर्युक्त अंश 'चन्द्रिका' को ठीक रूप में उपस्थित करता है तो लगता है कि 'चन्द्रिका' कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न मानती है। काणे महाशय 'लोचन' के अंश को मुकुलभट्ट को ठीक मानते हैं तथा कुन्तक, महिमभट्ट और क्षेमेन्द्र आदि को कहते हैं कि उन्होंने ठीक परम्परा ग्रहण नहीं की । ध्वन्यालोक में 'सहृदय' शब्द का अनेक स्थलों पर प्रयोग मिलता है। प्रथम कारिका के 'सहृदयमनःप्रीतये' की वृत्ति है—'रामायणमहाभारतप्रभृतिनि लक्ष्ये सर्वत्र प्रसिद्धव्यवहारं लक्षयतां सहृदयानामानन्दो मनसि लभतां प्रतिष्ठामिति प्रकाश्यते' (पृ० ३७) । इसका दूसरा तात्पर्य यह भी हो सकता है कि आनन्द (आनन्दवर्धनाचार्य) ध्वनि के प्रतिष्ठापक 'सहृदय' के मन में प्रतिष्ठा

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प्राप्त करें। 'सहृदयोदयलाभहेतोः' यह ग्रन्थान्त के श्लोक का शब्द भी सहृदय के उदयलाभ के लिए अर्थात् सहृदय द्वारा प्रवर्तित ध्वनि-सिद्धान्त की प्रगति के लिए आनन्दवर्धन का प्रयत्न निर्देश करता है। 'सहृदय' के पर्यायवाची 'सचेतस्' का प्रयोग कारिका, वृत्ति और लोचन में अनेक स्थलों पर मिलता है। लोचन ने 'सहृदय' का लक्षण भी प्रस्तुत किया है (पृ० ३९-४०)। लोचन ने आनन्दवर्धन को 'सहृदयचक्रवर्ती' कहा है (पृ० ४२)। म० म० काणे लिखते हैं कि कारिकाकार के नाम का प्रश्न कारिका और वृत्ति के लेखक के प्रश्न से पृथक् है। जो विद्वान् भिन्नकर्तृकत्ववादी हैं, तर्क दे सकते हैं कि कारिकाकार का नाम ज्ञात नहीं है। प्रो० सोवानी ने कारिकाकार का नाम 'सहृदय' बताया। मुकुल के अनुसार सम्भव है कि कारिकाकार 'सहृदय' थे अथवा प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार समग्र ग्रन्थ के रचयिता थे। राघवभट्ट ने ग्रन्थ का नाम 'सहृदयहृदयालोक' निर्दिष्ट किया है। अभिनवभारती के उद्धरण के अनुसार अभिनवगुप्त भट्टनायक के ग्रन्थ को 'सहृदयदर्पण' कहते हैं ('भट्टनायकस्तु ब्रह्मणा परमात्मना यदुदाहृतं......इति व्याख्यानं सहृदयदर्पणे पर्यग्रहीत्' अ० भा० भाग १, पृ० ४-५)। लोचन में 'हृदयदर्पण' के नाम से यह ग्रन्थ उद्धृत है। म० म० काणे महाशय 'हृदयदर्पण' से अधिक 'सहृदयदर्पण' पसंद करते हैं। जैसा कि काणे महाशय समझते हैं अभिनवभारती (भाग १, पृ० १७३) में "अत एव सहृदयाः स्मरन्ति 'वध (स) य चूडामणिआ' " में 'सहृदय' का प्रयोग किसी ग्रन्थकार के लिए किया है। कारिकाकार का नाम 'सहृदय' था इसका निर्देश व्यक्तिविवेक के रुय्यककृत व्याख्यान में भी मिलता है, जैसा कि व्यक्तिविवेक के द्वितीय विमर्श के आरम्भ में लिखा है—'तत्र विभावाअनुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगस्तन्मात्रलक्षणमैकमन्तरङ्गमाद्यैरेवो- क्तमिति नेह प्रतन्यते।' इस पर व्याख्यान है—'उक्तमिति सहृदयैः'। इस प्रकार 'सहृदयैः' कह कर कारिकाग्रन्थ का निर्देश किया है (ध्वनिकारिका ३।१०)। अभिन्नकर्तृकत्ववादी डॉ० मुकर्जी का सबसे मूलभूत तर्क है कि परम्परा सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को एक व्यक्ति की, वह भी आनन्दवर्धन की कृति मानती है। काणे महाशय का मूलभूत आधार है अभिनवगुप्त का 'लोचन', जिसमें कारिकाकार और वृत्तिकार को भिन्न रूप से निर्देश किया गया है। दोनों पक्षों के विद्वानों के पास अपने-अपने पक्ष के समर्थन में अन्तः-बाह्य प्रमाण हैं, जिनका विस्तारपूर्वक ऊपर निर्देश किया गया। किन्तु नितान्त सन्देहरहित होकर किसी एक पक्ष में अपना निर्णय देना अत्यन्त कठिन है, जब कि अनुकूल तर्क दोनों पक्षों में संकलित मिलते हैं। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि आगे के जिन आलंकारिकों ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक को ध्वनिकार या आनन्दवर्धन की कृति माना और निर्देश किया है उनकी दृष्टि से 'लोचन' भी अवश्य ही गुजरा होगा, ऐसी स्थिति में स्वाभाविक था कि 'लोचन' द्वारा कारिकाकार और वृत्तिकार के पृथक्- करण के प्रति उनका ध्यान अवश्य आकर्षित होता, किन्तु ऐसा किसी ने नहीं किया। इस प्रकार के पृथक्करण की कल्पना डॉ० बूहलर द्वारा प्रस्तुत की गई और काव्यमाला संस्करण के सम्पादकों ने उसे सर्वथा मान लिया। म० म० काणे महाशय ने उसकी प्रबल तर्कों से युक्तिसंगत पुष्टि की। फिर भी, तर्कों की पेचीदगी से कुछ हट कर सामान्यतः देखें तो अभी तक कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों आनन्दवर्धन ही ठहरते हैं। जब तक 'चन्द्रिका' व्याख्या और भट्टनायक का 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ प्रकाश में नहीं आ जाते तब तक इस समस्या का पूर्णतः समाधान देना सम्भव नहीं। इसका

( ४१ ) अर्थ यह नहीं कि विवाद व्यर्थ है, बल्कि इस प्रश्न पर और भी नवोद्भावित युक्तियों के प्रकाश में विचार करने की आवश्यकता है, हां, आग्रह छोड़ कर । सम्भव है इन सामग्रियों में से किसी एक पक्ष का प्रबल साधक प्रमाण प्राप्त हो जाय । संस्कृत के पण्डित-समाज में आचार्य आनन्द- वर्धन ही कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों समझे जाते हैं । ध्वनि की मान्यता, विरोधी आचार्य और सम्प्रदाय जैसा कि स्वयं आनन्दवर्धन ने स्वीकारा है, ध्वनि-सिद्धान्त पूर्ववर्ती आचार्यों के ग्रन्थों में अपने स्वरूप में निर्दिष्ट हो चुका था, यद्यपि उसे इस नाम से अभिहित एवं मौलिक रूप से प्रतिपादित करने का श्रेय ध्वनिकार को है । एक प्रकार के गम्यमान या प्रतीयमान अर्थ की स्वीकृति पूर्ववर्तियों में मिलती है । भामह ने—'गुणसाम्यप्रतीति' ( २।३५ ) का निर्देश किया है, यह सर्वथा गम्यमान औपम्य के सदृश है । 'समासोक्ति' में भी 'यत्रोक्ते गम्यमानोऽर्थः०' बताया है । 'पर्यायोक्त' में तो स्पष्ट लिखते हैं—'यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते' । इस प्रकार इनके और भी अलङ्कारों में अन्य गम्यमान अर्थ की स्वीकृति मिलती है । दण्डी की रचना में भी ध्वनि के सिद्धान्त के संकेत मिलते हैं । 'उदात्त' अलङ्कार में दण्डी लिखते हैं— पूर्वत्राशयमाहात्म्यमत्राभ्युदयगौरवम् । सुव्यञ्जितमिति व्यक्तमुदात्तद्वयमप्यदः ॥ ( काव्या० २।३०३ ) इस प्रकार अन्यत्र भी ध्वनि के संकेत सुविधा से प्राप्त किए जा सकते हैं । उद्भट के 'पर्यायोक्त' में, रुद्रट के परिकर, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि में भी यही स्थिति है । जब आनन्दवर्धन ने प्रतीयमान अर्थ पर आधारित विचार को ध्वनि-सिद्धान्त रूप में स्थापित किया तब विशेष रूप से 'अलङ्कारान्तर्भूत' करने का प्रयत्न हुआ। इस विचार को प्रतीहारेन्दुराज ने उद्भट के 'काव्यालङ्कारसंग्रह' पर लिखे गए अपने व्याख्यान में निर्दिष्ट किया है— 'स ( प्रतीयमानः ) कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् ।' ( पृ० ७९ ) वस्तुध्वनि को पर्यायोक्त अलङ्कार के अन्तर्गत बताते हुए 'रामोऽस्मि सर्वं सहे' को पदध्वनि मानकर पद में पर्यायोक्त का निर्देश किया है—'न खलु पदे पर्यायोक्तेन न भवितव्यमितीयं राज्ञा- माज्ञा, सूत्रकारवचनं वा ।' ( पृ० ८२ ) ध्वन्यालोक के निर्माण के पश्चात् ध्वनि-सिद्धान्त का प्रबल विरोध, उसमें निर्दिष्ट विरोधों के बावजूद भी हुआ । ध्वनि-सिद्धान्त के प्रथम विरोधी आचार्य थे प्रतीहारेन्दुराज । इनके गुरु मुकुलभट्ट ने भी अपनी 'अभिधावृत्तमातृका' में लिखा है—'लक्षणामागर्गावगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोप- वर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मोलयितुमिदमत्रोक्तम्' ( पृ० २१ ) । इसके अनुसार मुकुलभट्ट ध्वनि को लक्षणा के अन्तर्गत स्वीकार करते थे, ध्वनि की नूतन उद्भावना उन्हें पसंद न आई । उद्भट के काव्यालङ्कारसंग्रह की टीका में मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि को अलङ्कार के अन्तर्गत माना और उसके तीनों भेदों—वस्तु, अलङ्कार और रस के ध्वन्यालोक में दिए उदाहरणों को अलङ्कारों के उदाहरण सिद्ध किया । प्रतीहारेन्दुराज अलङ्कारवादी आचार्य थे । इस प्रसंग को इस प्रकार वे प्रस्तुत करते हैं—

( ४२ ) ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्लादिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दाव्यापारस्पृष्टत्वेन प्रतीय- मानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभिव्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृद- यैर्ध्वनिनीम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः । स कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् । ( काव्यालङ्कारसारलघुवृत्ति, पृ० ७९ ) ध्वनि का खण्डन इस प्रकार मुकुलभट्ट और प्रतीहारेन्दुराज द्वारा प्रसङ्गतः हुआ । किन्तु ऐसे भी आलंकारिक हुए जिन्होंने ध्वनि के खण्डन मात्र के उद्देश्य से अपने ग्रन्थ का निर्माण किया । वे थे—भट्टनायक, कुन्तक और महिमभट्ट । ये तीनों काश्मीरी आचार्य थे । भट्टनायक—ये अभिनवगुप्त से कुछ प्राचीन थे । इन्होंने 'हृदयदर्पण' नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जो अब तक प्राप्त नहीं हो सका है । उसका अंशतः उल्लेख 'लोचन' में यत्र-तत्र मिलता है । व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट लिखते हैं कि मेरी बुद्धि दर्पण ( हृदयदर्पण ) को बिना देखे ही सहसा यश की ओर प्रवृत्त हो गई है— सहसा यशोऽभिसर्तुं समुद्यताऽदृष्टदर्पणा मम धीः । स्वालङ्कारविकल्पप्रकल्पने वेत्ति कथमिवावद्यम् ॥ 'व्यक्तिविवेकव्याख्यान' में स्पष्ट ही लिखा है—'दर्पणो हृदयदर्पणाख्यो ध्वनिव्ध्वंसग्रन्थोऽपि'; इस प्रकार 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ ध्वनिव्ध्वंस के उद्देश्य से लिखा गया था, यह बात सिद्ध होती है । लोचन भी इस तथ्य की पूर्णतः पुष्टि करता है । जैसा कि लोचनकार भी भट्टनायक के 'भम धम्मिअ०' इस पद्य पर विचार का खण्डन करते हुए लिखते हैं—'कि च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्राह्यकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिव्ध्वंसोऽयम्' ( पृ० ६९ ) । भट्टनायक को व्यञ्जना शक्ति मान्य न थी, वे अभिधा के अतिरिक्त भावना और भोजकत्व ये दो नये व्यापारों की कल्पना करते थे । भट्टनायक रससिद्धान्त के युक्तिवादी व्याख्याता थे । कुन्तक—इन्होंने अपने ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' का निर्माण ध्वनि की स्थापना के विरोध में अवश्य लिखा था, किन्तु इनका उद्देश्य ध्वनि का खण्डन करना न था बल्कि इनका ग्रन्थ वक्रोक्ति का मण्डन ही करता है । आनन्दवर्धन के प्रति इनका भाव सद्भावपूर्ण था और ध्वनि-सिद्धान्त से इनका पूर्ण परिचय था । इन्हें ध्वनि वक्रोक्ति के प्रकारान्तर के रूप में ही मान्य है और रस की उपयोगिता काव्य में स्वीकार करते हुए भी इन्होंने उसे स्वतन्त्र काव्यतत्त्व न मानकर वक्रोक्ति का भेदमात्र माना है । कुन्तक लोचनकार के सम्भवतः समकालिक थे । महिमभट्ट—लोचनकार अभिनवगुप्त के कुछ ही पीछे इन्होंने 'व्यक्तिविवेक' का निर्माण किया । इनका मूल उद्देश्य ग्रन्थालम्भ के इस पद्य से ही विदित हो जाता है— अनुमानेऽन्तर्भावं सर्वस्यैव ध्वनेः प्रकाशयितुम् । व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम् ॥ अर्थात् महिमभट्ट परा वाणी को प्रणाम करके अनुमान में सभी ध्वनि का अन्तर्भाव करने के लिए 'व्यक्तिविवेक' ( व्यञ्जना का विवेचन ) नाम के ग्रन्थ का निर्माण कर रहा है । ध्वनि के लक्षणवाली कारिका ( 'यत्रार्थः शब्दो वा०' ध्व० १।१३ ) को धज्जी-धज्जी उड़ाने का इन्होंने खूब ही प्रयत्न किया है । ये सर्वथा अभिधावादी थे, और व्यङ्ग्य को अनुमेय मानते थे तथा व्यञ्जना

( ४३ ) इनके यहाँ पूर्वसिद्ध अनुमान ही थी। व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के स्थान पर ये लिङ्गलिङ्गिभाव के समर्थक थे। इनका पक्ष बहुत कुछ बुद्धिसङ्गत होते हुए भी काव्य के उपयुक्त भावना के बल पर आधारित न होने के कारण इन्हीं तक सीमित रह गया। इन्होंने ध्वनि के उदाहरणों को अनुमान द्वारा सिद्ध किया है। जैसा कि कहा जा चुका है, आनन्दवर्धन ने ध्वनि-विरोधी पक्षों में तीन पक्षों का निर्देश एवं खण्डन प्रस्तुत किया है, वे हैं—अभाववाद, भाक्तवाद एवं अनिर्वचनीयतावाद। फिर साथ ही उन्होंने अलङ्कारवाद का भी निराकरण किया है। इसके अतिरिक्त 'जयरथ' ने 'अलङ्कार-सर्वस्व' पर लिखे अपने व्याख्यान में किसी अनिर्दिष्ट ग्रन्थकार की दो कारिकाओं का उल्लेख किया है, जिनमें ध्वनि के सम्बन्ध में १२ विप्रतिपत्तियां निर्दिष्ट हैं— तात्पर्यशक्तिरभिधा लक्ष्णानुमिती द्विधा। अर्थापत्तिः क्वचित्तन्त्रं समासोक्त्याद्यलङ्कृतिः॥ रसस्य कार्यता भोगो व्यापारान्तरवाधनम्। द्वादशेत्थं ध्वनेरस्य स्थिता विप्रतिपत्तयः॥ इन बारहों को समझने में बड़ी कठिनाई पेश आती है, फिर भी विद्वानों ने इसे संक्षिप्त रूप में इस प्रकार समझाने का प्रयत्न किया है— १. तात्पर्य—मीमांसकों की मान्यता, इसका खण्डन ध्वन्यालोक-लोचन में विस्तार से मिलता है। २. अभिधा—यह अति प्राचीन मीमांसकों की मान्यता के अनुसार है। ३. ४. लक्षणा के दो भेद—जहत्स्वार्था और अजहत्स्वार्था। ५-६. अनुमान के दो भेद—(ये दोनों ज्ञात नहीं)। ७. अर्थापत्ति—यह अनुमान पक्ष का ही परिष्कृत रूप है। ८. तन्त्र—यह श्लेषालङ्कार की मान्यता के सदृश प्रतीत होता है। ९. समासोक्ति आदि अलङ्कार—इसका खण्डन ध्वनिकार ने स्वयं प्रस्तुत किया है। १०. रसकार्यता—यह रस के प्राचीन व्याख्याकारों की मान्यता है। भट्ट लोल्लट आदि का पक्ष। ११. भोग—यह भी रसध्वनि का विरोधी पक्ष है। यह भट्टनायक का पक्ष है। १२. व्यापारान्तरवाधनम्—जैसा कि डॉ० राघवन् का विचार है, यह कुन्तक की वक्रोक्ति का निर्देश करता है, किन्तु प्रो० म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री समझते हैं कि वक्रोक्ति तो अलङ्कार- पक्ष में कह ही दी गई है। यह मान्यता अनिर्वचनीयतावाद की सूचिका है। ध्वनि और अन्य प्रस्थान ध्वनि और रस—ध्वन्यालोक में ध्वनि के तीन प्रकार निर्दिष्ट हैं—वस्तुध्वनि, अलङ्कारध्वनि और रसध्वनि। रस इस प्रकार एक ध्वनि है, किन्तु ध्वनिकार ने जिस ध्वनि को काव्य के आत्मा के रूप में स्वीकार किया है वह मुख्यतया रस ही है ('काव्यस्यात्मा स एवार्थः०', ध्व० १।५)। स्पष्ट ही, जैसा कि लोचनकार 'स एव' पर लिखते हैं—'स एवेति प्रतीयमानमात्रेऽपि प्रक्रान्ते तृतीय

एव रसध्वनिरिति मन्तव्यम्, इतिहासवलात् प्रक्रान्तवृत्तित्रयन्यार्थबलाच्च । तेन रस एव वस्तुत आत्मा, वस्त्वलङ्कारध्वनी तु सर्वथा रसं प्रति पर्यवस्येते इति वाच्यादुत्कृष्टौ तावित्यभिप्रायेण ध्वनिः काव्यस्यात्मेति सामान्येनोक्तम् ।' (पृ० ८६) इस प्रकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि-सिद्धान्त द्वारा रसतत्त्व की काव्य में सबसे उच्च पद पर प्रतिष्ठा की। इसका मात्र कारण यह थ. कि रस केवल व्यङ्ग्य ही होता है, वाच्य से उसका संस्पर्श बन ही नहीं सकता, इसो कारण वह अलौकिक भी है। काव्य के अन्य सभी तत्त्व रस की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में ही आकर आदरणीय होते हैं। रस-सम्प्रदाय में रस को यह प्रतिष्ठा नहीं मिली और अलङ्कारवादियों ने तो इसे एक प्रकार के अलङ्कार के रूप में मान लिया था। ध्वनिकार का तो स्पष्ट कथन है—'अयमेव हि महाकवेर्मुख्यो व्यापारो यद् रसादीनेव मुख्यतया काव्यार्थीकृत्य तद्व्यक्त्यनुगुणत्वेन शब्दानांमर्थानाञ्चोप- निबन्धनम् ।' (पृ० ४४२) ध्वनि और अलङ्कार—प्रतीयमान अर्थ से, जिसके आधार पर ध्वनि-सम्प्रदाय प्रवर्तित हुआ, अलङ्कारवादी भामह, उद्भट प्रभृति आचार्य अपरिचित न थे, साथ ही काव्य का प्राणभूत रस भी उन्हें अविदित न था, फिर भी उसे उन्होंने उचित स्थान न देकर अलङ्कार में ही अन्तर्भुक्त कर लिया। अलङ्कारवादियों ने एक ओर अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति, आक्षेप प्रभृति अलङ्कारों में प्रतीयमान अर्थ के अनेक प्रकारों को अन्तर्निविष्ट कर लिया। जब ध्वनिकार ने रस को काव्य के आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया तब अलङ्कारों की स्थिति कुछ अपने रूप में स्पष्ट हुई। ध्वनिकार के अनुसार अलङ्कारों की सार्थकता अलङ्कार्य की शोभा बढ़ाने में है, जब उनका निवेशन काव्य में रसादि के तात्पर्य से होगा तभी वे 'अलङ्कार' भी कहलाएंगे— रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ पृ० २०८ काव्य में उस अलङ्कार का कुछ भी स्थान नहीं, जो रस की व्यञ्जना में सहयोग नहीं करता । रसाभिनिविष्ट कवि के समक्ष अलङ्कार स्वतः आने लगते हैं। और जब अलङ्कार रसभावादि के तात्पर्य से शून्य होकर कवि द्वारा निबद्ध किया जाता है तब चित्रकाव्य का विषय होता है— रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ पृ० ५२८ ध्वनि और औचित्य—औचित्य-विचार, जो क्षेमेन्द्र में अपना पल्लवित रूप ग्रहण कर एक सम्प्रदाय बन गया, उसके विकास में ध्वनिकार आचार्य आनन्दवर्धन का विशेष योग था। आनन्दवर्धन ने औचित्य को काव्य के प्राणभूत रसध्वनि के साथ सम्बद्ध कर दिया। ध्वन्यालोक में अलङ्कारौचित्य, गुणौचित्य, सङ्घटनौचित्य, विषयौचित्य आदि का विस्तार से निरूपण मिलता है। औचित्यसिद्धान्त के प्रतिष्ठित होने का समग्र श्रेय आनन्दवर्धन के इस श्लोक को दिया जा सकता है— अनौचित्याद् ऋते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् । औचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ इस प्रकार यदि काव्य की आत्मा रस है तो निश्चय ही रस का परम गूढ़ रहस्य औचित्य है। यहां ध्वन्यालोक की यह कारिका भी उल्लेखनीय है—

( ४५ ) वाच्यानां वाचकानाञ्च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत् कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३।३२ ध्वनि और रीति—ध्वनि की प्रतिष्ठा के पूर्व आचार्य वामन ने काव्य के आत्मा के रूप में रीति को प्रतिष्ठित कर दिया था । उनके अनुसार रीति विशिष्टा पदरचना है, पदरचना में वैशिष्ट्य का सम्पादन गुणों द्वारा होता है ( विशेषो गुणात्मा ) । आनन्दवर्धन ने पदरचना रूप रीति को 'संघटना' के नाम से अभिहित किया । उचित पदसंघटना से रस के उन्मीलन में सहायता पहुँचती है इस विचार से ध्वनिकार ने रीति को रस से उपकार्योपकारकभाव रूप से सम्बद्ध कर दिया । ध्वनिकार के अनुसार रीति का प्रवर्तन ध्वनितत्त्व के स्फुट रूप से स्फुटित न होने के कारण ही हुआ, जैसा कि यह निर्देश करती है— अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद् यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ध्व० ३।४६ आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में रीति पर जो विचार किया है वह उनकी मौलिक प्रतिभा का संकेत करता है । ध्वनिकार का रीतिप्रकरण इस कारिका से आरम्भ होता है— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान्— ॥ ३।६ संघटना और गुणों के सम्बन्ध का तर्कपूर्ण विवेचन यहाँ ध्वनिकार ने प्रस्तुत किया है । ध्वनि और वृत्ति—आनन्दवर्धन ने उपनागरिका आदि वृत्तियों को गुणों से अभिन्न माना है । वे दो प्रकार की वृत्तियों से परिचय रखते हैं, एक कैशिकी आदि वाच्याश्रय नाट्यवृत्तियां और दूसरी वाचकाश्रय उपनागरिका आदि वृत्तियाँ । इन्हें भी रस के अनुगुण होना चाहिए— ( वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिताः कामपि काव्यस्य नाट्यस्य च छायामावहन्ति ) । ध्वनिकार की कारिका है— रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान् यस्ता एव वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥ ३।३३ ध्वनिकार के अनुसार उपनागरिका आदि वृत्तियां शब्दतत्त्व पर आश्रित हैं और कैशिकी आदि वृत्तियाँ अर्थतत्त्व पर— शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिद् अर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ३।४७ ध्वनि और वक्रोक्ति—वक्रोक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम भामह द्वारा हुआ— सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ भामह के अनुसार अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है । यह समग्र अलङ्कारों का मूल है । आनन्दवर्धन भी इस विचार से सर्वथा सहमत हैं, जैसा कि उनका कथन है—'अतिशयोक्तिगर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया ।...... तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशययोगोऽ- न्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वीकरणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात् सैव सर्वालङ्काररूपेत्यय-

( ४६ )

मैवार्थोऽवगन्तव्यः ।' ( ध्व० पृ० ४९८ ) वक्रोक्ति का एक सम्प्रदाय के रूप में विकास आनन्दवर्धन के पश्चात् आचार्य कुन्तक ने किया, वह ध्वनि-सिद्धान्त की प्रतिक्रिया थी। इसी कारण कुन्तक द्वारा इतनी मौलिकता से वक्रोक्ति की स्थापना के होने पर भी ध्वनि का विजयस्तम्भ बिलकुल नहीं हिला, वह ज्यों का त्यों अडिग बना रहा ।

ध्वन्यालोक के संस्करण

सर्वप्रथम बम्बई के काव्यमाला सीरीज में ई० सन् १८९१ में ध्वन्यालोक के प्रथम तीन उद्योत अभिनवगुप्त के लोचन के साथ, और चतुर्थ टीकारहित, मुद्रित हुए, जिनके आधार तीन पाण्डुलिपियां थीं। चतुर्थ उद्योत का लोचन तब अप्राप्त था। इसके द्वितीय संस्करण का प्रकाशन ई० सन् १९११ में हुआ। इसके सम्पादकों ( म० म० पं० दुर्गाप्रसाद, काशीनाथ परव और वासुदेव लक्ष्मणशास्त्री पणशीकर ) के अनुसार तीन आधारभूत प्रतियों में प्रथम ( 'क' संज्ञक ) प्रति कश्मीर महाराज के आश्रित ज्योतिर्विद् दयाराम शर्मा की पुस्तक का प्रायः अशुद्ध प्रतिरूपक थी । द्वितीय ( 'ख' संज्ञक ) प्रति श्रीरामकृष्णभाण्डारकर के पुण्यपत्तनस्थ राजकीय पुस्तकालय की पुस्तक थी, यह भी काश्मीरक पुस्तक का प्रतिरूपक है। तृतीय ( 'ग' संज्ञक ) प्रति मैसूर के मरिमल्लप्पा स्कूल के संस्कृताध्यापक आ० अनन्ताचार्य पण्डित के दो सौ वर्ष प्राचीन किसी तालपत्र की प्रतिरूपक थी। यह निर्णय- सागरीय काव्यमाला सीरीज का संस्करण मूल की दृष्टि से प्रायः दोषपूर्ण है। अब कई पाण्डुलिपियां मिल चुकी हैं। जैसा कि म० म० काणे महाशय का कहना है, अकेले भाण्डारकर संस्थान में पाँच पाण्डुलिपियाँ देवनागरी अक्षरों में और दो शारदा लिपि में प्राप्त हैं। कलकत्ता संस्कृत सीरीज़ ने ‘ध्वन्यालोक' का एक संस्करण मधुसूदनमिश्र लिखित 'अवधान' नामक आधुनिक टीका के साथ प्रकाशित किया। काणे महाशय के अनुसार इसका आधार काव्यमाला संस्करण है। डॉ० जाकोबी ने ध्वन्यालोक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने शुद्ध पाठों के सम्बन्ध में कुछ सुझाव भी दिए जो आगे चलकर अधिकांश मान्य हुए। डॉ० एस० के० डे महाशय ने ध्वन्यालोक के चतुर्थ उद्योत के लोचन का सर्वप्रथम सम्पादन किया। फिर काशी चौखम्बा से सम्पूर्ण ध्वन्यालोक तथा सम्पूर्ण लोचन श्री पट्टाभिरामशास्त्री के सम्पादकत्व में आधुनिक 'वालप्रिया' और 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी के साथ १९४० ई० में प्रकाशित हुआ। काशी चौखम्बा से ही पं० बदरीनाथ झा की आधुनिक दीधिति टीका के साथ केवल ध्वन्यालोक प्रकाश में आया। मद्रास से ई० सन् १९४४ में ही ध्वन्यालोक-लोचन का प्रथम उद्योत उत्तुङ्गोदयराज की कौमुदी व्याख्या और म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री के 'उपलोचन' के साथ प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात १९५२ ई० में हिन्दी में सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अनुवाद एवं व्याख्यान आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि ने प्रस्तुत किया। इसकी भूमिका डॉ० नगेन्द्र एम० ए०, डी० लिट्० ने लिखी। यह कार्य ध्वन्यालोक के मूल से अवगत होने के लिए अवश्य ही प्रशंसा के योग्य है, किन्तु इसमें पाठभेदसम्बन्धी कोई परिवर्तन नहीं हुआ बल्कि बालप्रिया संस्करण वाले पाठों का ही अनुगमन हुआ। १९५५ ई० में पूना ओरियण्टल सीरीज में डॉ० कृष्णमूर्ति ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् १९५६ ई० में श्रीविष्णुपद भट्टाचार्य ने ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत का इंग्लिश exposition के साथ सुन्दर संस्करण प्रस्तुत किया। १९५७ ई० में द्वितीय उद्योत भी इसी क्रम में प्रकाशित हुआ।

( ४७ ) प्रस्तुत अनुवाद और व्याख्यान का आधार-भूत संस्करण चौखम्बा का 'बालप्रिया' वाला संस्करण ही रहा, अतः उसके ही स्वीकृत पाठभेद बहुत कुछ अपरिवर्तनों के साथ यहां लिए गए हैं। व्याख्यान के बाद अनेक स्थलों पर पुनर्विचार के बाद मैं अनेक परिवर्तन और शोधन की दृष्टि से प्रवृत्त हुआ और कुछ मुझे सफलता भी मिली। किन्तु खेद है कि उन परिवर्तनों का निर्देश यहां नहीं कर सका। यत्र-तत्र मुझसे जो कुछ भ्रान्तियां हो गई हैं उनके संशोधन की विनम्र आशा विद्वज्जनों से करता हूँ। मेरे विचार में सलोचन ध्वन्यालोक अभी अपने शोधन, अर्थनिश्चायन एवं मूल्याङ्कन के लिए अनेक प्रतिभाशाली विचारकों की एकनिष्ठ साधना की प्रतीक्षा में है। मैं अपने इस छोटे से प्रयत्न द्वारा ध्वन्यालोक के अभीष्ट अर्थ तक पहुँचने में यदि जिज्ञासुजनों का सहायक हुआ तो यही मेरे श्रम की सार्थकता होगी। मैंने अपने इस व्याख्यान एवं भूमिका में जिन विद्वानों की कृतियों से लाभ उठाया है उनका ऋणी हूँ। विशेषतः 'लोचन' के अर्थज्ञान में मुझे 'बालप्रिया' ने अधिक सहायता पहुँचाई है, अतः बालप्रियाकार श्री रामशारक महोदय का मैं विशेष ऋणी हूँ। पुनः अपनी त्रुटियों के प्रति विद्वानों से क्षमा-प्रार्थना के साथ— जगन्नाथ पाठक

शुद्धिपत्र

( ध्वन्यालोक )

अशुद्धपृष्ठपंक्तिशुद्ध
वर्णसंघटनार्धर्माश्च१७सङ्घटनाधर्माश्च
तत्समतान्तःपातिनः२३तत्समयान्तःपातिनः
व्याप्यन्त१६१व्याप्यन्ते
घेप्पन्ति१७८घेप्पन्ति
रूपकादिर-२३७रूपकादेर-
वाच्यत्वे न३००वाच्यत्वेन
शृङ्गारे ते न३२८शृङ्गारे तेन
ते न वर्णा३२८तेन वर्णा
गुणरूपत्वे गुणरूपत्वे३४७गुणरूपत्वे
एतच्च एमदीये४२८एतच्च मदीये

( लोचन )

अशुद्धपृष्ठपंक्तिशुद्ध
-भावेनार्थवत्त्वा-१०-भावेनार्थतत्त्वा-; -भावेनार्थत्वा--
शब्दार्थयोश्चारुत्वं१८शब्दार्थयोर्यतश्चारुत्वं
मधुरिवौ८३मधुरिपौ

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विषय-सूची ( ध्वन्यालोक-लोचन ) प्रथम उद्योत पृष्ठ ( क ) लोचन का मङ्गलाचरण १ ( ख ) लोचनकार द्वारा स्वपरिचय २ ( ग ) ध्वन्यालोक का मंगलाचरण तथा उस पर विस्तृत व्याख्यान ३ १. ध्वनिविषयक तीन विप्रतिपत्तियां और ग्रन्थ का प्रयोजन ८ तीन प्रधान विप्रतिपत्तियों का संक्षिप्त निर्देश १४ अभावविकल्प के तीनों प्रकारों का संक्षिप्त निर्देश १५ अभाववादियों का प्रथम विकल्प १७ शब्द-अर्थ के चारुत्व के दो भेद १८ वृत्तियों का स्वरूप-विचार १९ अभाववादियों का द्वितीय विकल्प २३ अभाववादियों का तृतीय विकल्प २६ अभाववादियों के मत का उपसंहार २७ मनोरथकवि का ध्वनिविरोधी श्लोक २९ भाक्तवादियों का विकल्प २९ 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्ति और सङ्गति ३० लो० में 'गुणवृत्ति' का अर्थ ३३ अलक्षणीयतावादियों का मत ३५ ध्वनि-स्वरूप के प्रकाशन का उद्देश्य ३६ लो० में विभिन्न सम्बन्धों का निर्देश ३७ 'सहृदय' का स्वरूप ३९ काव्य में ध्वनि के अंशतत्ववादी भट्टनायक के मत का खण्डन ४० काव्य के मुख्य प्रयोजन के रूप में प्रीति या आनन्द का निर्देश ४१ २. ध्वनि-सिद्धान्त की भूमिका ४३ काव्यात्मभूत अर्थ के भेद : वाच्य और प्रतीयमान ४३ 'सहृदयश्लाघ्य' विशेषण के तात्पर्य का प्रतिपादन ४४ ३. वाच्य अर्थ के प्रतिपादन का अभाव ४६ ४. प्रतीयमान का वाच्य से भिन्नत्व ४७ 'महाकवि' व्यपदेश का कारण ४८ 'लावण्य' पर विचार ४९ प्रतीयमान के भेद ५० ४ ध्व० भू०

( ५० ) पृष्ठ ध्वनि के तीन रूप : वस्तु, अलङ्कार और रस ५१ वाच्य से वस्तुव्यङ्ग्य का भेद ५१ विधिरूप वाच्य में प्रतिषेधरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण ५१ ‘भ्रम धार्मिक०’ इस गाथा का व्याख्यान ५३ अभिहितान्वयवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ५४ अन्विताभिधानवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ६२ ‘भ्रम धार्मिक०’ पर भट्टनायक के विचार तथा उसका खण्डन ६७ प्रतिषेधरूप वाच्य में विधिरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७१ इस पर भट्टनायक के विचार का खण्डन ७२ विधिरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७३ प्रतिषेधरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७४ विषय-भेद से भी व्यङ्ग्य का वाच्य से भेद-प्रतिपादन एवं उदाहरण ७६ रसादि का वाच्यसामर्थ्य से आक्षिप्तत्व-प्रतिपादन ८१ ५. इतिहास के व्याज से रस के काव्यात्मत्व का प्रसाधन ८६ ६. प्रतीयमान रस का सहृदयानुभवसिद्धत्व-प्रतिपादन ९२ ७. प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति काव्यार्थतत्त्वज्ञों को ही ९४ ८. व्यङ्ग्य का प्राधान्य-प्रतिपादन ९७ ९. वाच्य और वाचक के प्रथम उपादान का युक्तिपूर्वक उपपादन ९८ १०. व्यङ्ग्य अर्थ के वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकत्व का उपपादन ९९ ११ १२. पहले वाच्यार्थकी प्रतीति के होने पर भी व्यङ्ग्यार्थ के प्राधान्य की अक्षुण्णता १०१ १३. ध्वनि-काव्य का लक्षण १०२ भट्टनायक के मत का दूषण १०३ चारुत्व-प्रतीति को काव्यात्मा स्वीकार करना १०४ अलंकारादि प्रकारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का निषेध १०७ ‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ का स्पष्टीकरण १०८ ‘समासोक्ति’ में व्यङ्ग्यानुगत वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १०९ ‘आक्षेप’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १११ चारुत्व का उत्कर्ष ही वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य का आधार ११४ ‘अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन ११७ ‘पर्यायोक्त’ में ध्वनि के अन्तर्भाव का निराकरण ११८ ‘अपह्नुति’ और ‘दीपक’ में वाच्य के प्राधान्य का निर्देश १२१ सङ्करालङ्कार में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १२२ ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १३३ पूर्वोक्त विषयों का संक्षेप से प्रतिपादन १३५ प्रकारान्तर से अलङ्कार और ध्वनि के तादात्म्य का निराकरण १३६ ‘सूरिभिः कथित’ इस कारिका भाग का व्याख्यान १३७ वैयाकरणों के अनुसार ध्वनि १३८

( ५१ ) पृष्ठ अभाववादियों के प्रति उत्तर का उपसंहार १४२ ध्वनि के दो भेद १४३ अविवक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण १४५ विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का उदाहरण १४६ भाक्तवादी के मत के दूषण का उपक्रम १४८ १४. भक्ति और ध्वनि के एकत्व का निषेध १४९ कवियों द्वारा उपचरित शब्दवृत्ति से व्यवहार के उदाहरण १५१ १५. उक्त्यन्तर से अशक्य चारुत्व का व्यञ्जक शब्द 'ध्वनि' है १५५ १६. रूढ़ शब्द भी ध्वनि के विषय नहीं होते १५६ १७. गुण-वृत्ति से बोध्य अर्थ में शब्द स्खलद्गति नहीं है १५७ १८. लक्षणा-व्यापार और ध्वनन-व्यापार का भिन्न-विषयकत्व १५९ भक्ति के ध्वनि का लक्षण होने पर अव्याप्ति का निर्देश १५९ गौण और लाक्षणिक के भेद का प्रतिपादन १५९ लक्षणा के भेद १६० रत्यादि-प्रतीति का शाब्दत्व न स्वीकारने वाले मीमांसक का मत एवं उसका दूषण १६१ रस-प्रतीति के अलौकिकत्व का उपपादन १६४ १९. भक्ति को किसी ध्वनि-भेद का उपलक्षण मान लेना १६७ २०. अलक्षणीयतावादी के मत का दूषण १६९ द्वितीय उद्योत १. अविवक्षितवाच्यध्वनि के दो भेद १७४ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि के उदाहरण १७५ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि के उदाहरण १८० २. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के दो भेद १८३ ३. रसादि का ध्वनित्व १८३ भावध्वनि का उदाहरण १८४ व्यभिचारी भावों के तीन धर्म (उदय, स्थिति, अपाय) और सन्धि तथा शबलता १८४ रसध्वनि का उदाहरण १८८ ४. रसध्वनि का विषय १८९ रस के विषय में भट्टनायक के मत का उपपादन १९० पूर्वोक्त मत का खण्डन १९३ रस के सम्बन्ध में विभिन्न मत १९६ ५. रसाद्यलङ्कार का विषय २०१ शुद्ध रसाद्यलङ्कार का उदाहरण २०३ सङ्कीर्ण अङ्गभूत रसादि का उदाहरण २०६

( ५२ ) पृष्ठ ध्वनि, उपमादि अलङ्कार तथा रसवदाद्यलङ्कार का भेदोपसंहार २०९ चेतन वस्तुओं के वाक्यार्थीभाव की स्थिति रसाद्यलङ्कारत्व का खण्डन २११ ६. गुण और अलङ्कार के लक्षण २१६ ७. माधुर्य गुण का आधार २१७ ८. शृङ्गार, विप्रलम्भ शृङ्गार तथा करुण में उत्तरोत्तर माधुर्य की आर्द्रता २१८ ९. ओजस् के आधार ( तथा उदाहरण ) २२० १०. प्रसाद गुण का स्वरूप २२४ ११. श्रुतिदुष्टादि अनित्य दोषों के ध्वन्यात्मक शृङ्गार में हेयत्व का प्रतिपादन २२५ १२. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के अङ्गों के आनन्त्य का प्रतिपादन २२७ शृङ्गार के स्वगतभेद २२८ १३. सचेतस् जनों के लिए दिङ्मात्र कथन २२९ १४. शृङ्गार के प्रभेदों में अनुप्रास के व्यञ्जकत्वाभाव का उपपादन २३० १५. विशेषतः विप्रलम्भ शृङ्गार में यमक आदि का प्रतिषेध २३० १६. ध्वनि में रसाक्षिप्त रूप से बन्ध वाले अलङ्कार का उपपादन २३१ पूर्वोक्त विषयों का संग्रह २३४ १७. रूपकादि अलङ्कारों के शृङ्गारव्यञ्जकत्व का उपपादन २३५ १८-१९. रूपकादि अलङ्कारवर्ग के विनिवेशन में समीक्षा २३६ रस के अङ्गरूप से अलङ्कार की विवक्षा का उदाहरण २३७ रस के तात्पर्य में भी अलङ्कार के अङ्गी रूप से विवक्षित होने का उदाहरण २३८ अङ्ग रूप से विवक्षित होने पर भी अवसर में ग्रहण का उदाहरण २३९ गृहीत अलङ्कार के भी अवसर में त्याग का उदाहरण २४१ संसृष्टि के विषयापहार की स्थिति २४३ इसके निर्वाह के लिए अलङ्कार का पूरा निर्वाह नहीं २४६ निर्वाह के दृष्ट भी अलङ्कार का अङ्ग रूप से प्रत्यवेक्षण २४७ २०. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के द्वितीय भेद का विभाग २५० २१. शब्दशक्त्युद्भव अनुरणनरूप ध्वनि का स्वरूप २५१ श्लेष का उदाहरण २५१ श्लेष और शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि का विषय-विभाग २५३ लोचन में चार विभिन्न मतों की चर्चा २६० शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अन्य अलङ्कारों के उदाहरण २६४ २२. अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि २६७ २३. कविद्वारा स्वोक्ति से आविष्कृत व्यङ्ग्य का तृतीय प्रकार २७१ २४. अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य का विभाग २७४ कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर का उदाहरण २७५ कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर के उदाहरण २७६ २५. अर्थशक्त्युद्भव में अलङ्कार-ध्वनि २७८ २६. गम्यमान रूपक आदि अलङ्कारवर्ग का विस्तार २७९

( ५३ ) पृष्ठ २७. अलङ्कारान्तर की प्रतीति में तत्परत्व न होने की स्थिति में ध्वनिव्यपदेशाभाव २८० पूर्वोक्त विषय के अपवाद का निरूपण २८२ उपमा-ध्वनि २८६ आक्षेप-ध्वनि २८७ शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्य अर्थान्तरन्यासध्वनि २८८ अर्थशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्य अर्थान्तरन्यासध्वनि २८९ व्यतिरेक-ध्वनि के भी दो प्रकार २९० उत्प्रेक्षा-ध्वनि २९१ : श्लेषध्वनि २९४ यथासंख्य ध्वनि २९५ ( लोचन में ) दीपक, अप्रस्तुतप्रशंसा, अपह्नुति आदि ध्वनि २९६ २८. अलङ्कार-ध्वनि की प्रयोजनवत्ता का प्रतिपादन ३०० २९. वस्तुमात्र से अलङ्कार के व्यङ्ग्य होने पर ध्वन्यङ्गता ३०१ ३०. अलङ्कारान्तर के व्यङ्ग्यत्व की स्थिति में ध्वन्यङ्गता ३०१ ३१. प्रतीयमान अर्थ के अस्फुटत्व में ध्वन्यभाव ३२. विवक्षितवाच्य के आभास का विवेक ३०३ ३३. अविवक्षितवाच्य के आभास का विवेक ३०७ ३४. ध्वनि का उपसंहार ३०९ तृतीय उद्योत १. ध्वनि के दोनों भेदों के पद-प्रकाश और वाक्यप्रकाश रूप ३१२ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य प्रभेद में पदप्रकाशता ३१३ अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य में पदप्रकाशता ३१४ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य प्रभेद में वाक्यप्रकाशता ३१७ अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में वाक्यप्रकाशता ३१९ विवक्षितवाच्य के अनुरणनरूप व्यङ्ग्य के शब्दशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता ३२० ,, ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२१ ,, ,, कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न अर्थशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता ३२१ ,, ,, ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२३ स्वतःसम्भविशरीर अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता ३२३ ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२४ काव्यविशेष ध्वनि के पदप्रकाशत्वादि की अनुपपत्ति की शङ्का और परिहार ३२५ पूर्वोक्त विषयों का सङ्ग्रह द्वारा प्रतिपादन ३२६ २. वर्ण, पद आदि में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि ३२७ ३. वर्णों के रसद्योतकत्व का उपपादन ३२८ पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन ३३० पदावयव से द्योतन ३३०