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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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मैवार्थोऽवगन्तव्यः ।' ( ध्व० पृ० ४९८ ) वक्रोक्ति का एक सम्प्रदाय के रूप में विकास आनन्दवर्धन के पश्चात् आचार्य कुन्तक ने किया, वह ध्वनि-सिद्धान्त की प्रतिक्रिया थी। इसी कारण कुन्तक द्वारा इतनी मौलिकता से वक्रोक्ति की स्थापना के होने पर भी ध्वनि का विजयस्तम्भ बिलकुल नहीं हिला, वह ज्यों का त्यों अडिग बना रहा ।

ध्वन्यालोक के संस्करण

सर्वप्रथम बम्बई के काव्यमाला सीरीज में ई० सन् १८९१ में ध्वन्यालोक के प्रथम तीन उद्योत अभिनवगुप्त के लोचन के साथ, और चतुर्थ टीकारहित, मुद्रित हुए, जिनके आधार तीन पाण्डुलिपियां थीं। चतुर्थ उद्योत का लोचन तब अप्राप्त था। इसके द्वितीय संस्करण का प्रकाशन ई० सन् १९११ में हुआ। इसके सम्पादकों ( म० म० पं० दुर्गाप्रसाद, काशीनाथ परव और वासुदेव लक्ष्मणशास्त्री पणशीकर ) के अनुसार तीन आधारभूत प्रतियों में प्रथम ( 'क' संज्ञक ) प्रति कश्मीर महाराज के आश्रित ज्योतिर्विद् दयाराम शर्मा की पुस्तक का प्रायः अशुद्ध प्रतिरूपक थी । द्वितीय ( 'ख' संज्ञक ) प्रति श्रीरामकृष्णभाण्डारकर के पुण्यपत्तनस्थ राजकीय पुस्तकालय की पुस्तक थी, यह भी काश्मीरक पुस्तक का प्रतिरूपक है। तृतीय ( 'ग' संज्ञक ) प्रति मैसूर के मरिमल्लप्पा स्कूल के संस्कृताध्यापक आ० अनन्ताचार्य पण्डित के दो सौ वर्ष प्राचीन किसी तालपत्र की प्रतिरूपक थी। यह निर्णय- सागरीय काव्यमाला सीरीज का संस्करण मूल की दृष्टि से प्रायः दोषपूर्ण है। अब कई पाण्डुलिपियां मिल चुकी हैं। जैसा कि म० म० काणे महाशय का कहना है, अकेले भाण्डारकर संस्थान में पाँच पाण्डुलिपियाँ देवनागरी अक्षरों में और दो शारदा लिपि में प्राप्त हैं। कलकत्ता संस्कृत सीरीज़ ने ‘ध्वन्यालोक' का एक संस्करण मधुसूदनमिश्र लिखित 'अवधान' नामक आधुनिक टीका के साथ प्रकाशित किया। काणे महाशय के अनुसार इसका आधार काव्यमाला संस्करण है। डॉ० जाकोबी ने ध्वन्यालोक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने शुद्ध पाठों के सम्बन्ध में कुछ सुझाव भी दिए जो आगे चलकर अधिकांश मान्य हुए। डॉ० एस० के० डे महाशय ने ध्वन्यालोक के चतुर्थ उद्योत के लोचन का सर्वप्रथम सम्पादन किया। फिर काशी चौखम्बा से सम्पूर्ण ध्वन्यालोक तथा सम्पूर्ण लोचन श्री पट्टाभिरामशास्त्री के सम्पादकत्व में आधुनिक 'वालप्रिया' और 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी के साथ १९४० ई० में प्रकाशित हुआ। काशी चौखम्बा से ही पं० बदरीनाथ झा की आधुनिक दीधिति टीका के साथ केवल ध्वन्यालोक प्रकाश में आया। मद्रास से ई० सन् १९४४ में ही ध्वन्यालोक-लोचन का प्रथम उद्योत उत्तुङ्गोदयराज की कौमुदी व्याख्या और म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री के 'उपलोचन' के साथ प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात १९५२ ई० में हिन्दी में सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अनुवाद एवं व्याख्यान आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि ने प्रस्तुत किया। इसकी भूमिका डॉ० नगेन्द्र एम० ए०, डी० लिट्० ने लिखी। यह कार्य ध्वन्यालोक के मूल से अवगत होने के लिए अवश्य ही प्रशंसा के योग्य है, किन्तु इसमें पाठभेदसम्बन्धी कोई परिवर्तन नहीं हुआ बल्कि बालप्रिया संस्करण वाले पाठों का ही अनुगमन हुआ। १९५५ ई० में पूना ओरियण्टल सीरीज में डॉ० कृष्णमूर्ति ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् १९५६ ई० में श्रीविष्णुपद भट्टाचार्य ने ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत का इंग्लिश exposition के साथ सुन्दर संस्करण प्रस्तुत किया। १९५७ ई० में द्वितीय उद्योत भी इसी क्रम में प्रकाशित हुआ।