ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५ ) वाच्यानां वाचकानाञ्च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत् कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३।३२ ध्वनि और रीति—ध्वनि की प्रतिष्ठा के पूर्व आचार्य वामन ने काव्य के आत्मा के रूप में रीति को प्रतिष्ठित कर दिया था । उनके अनुसार रीति विशिष्टा पदरचना है, पदरचना में वैशिष्ट्य का सम्पादन गुणों द्वारा होता है ( विशेषो गुणात्मा ) । आनन्दवर्धन ने पदरचना रूप रीति को 'संघटना' के नाम से अभिहित किया । उचित पदसंघटना से रस के उन्मीलन में सहायता पहुँचती है इस विचार से ध्वनिकार ने रीति को रस से उपकार्योपकारकभाव रूप से सम्बद्ध कर दिया । ध्वनिकार के अनुसार रीति का प्रवर्तन ध्वनितत्त्व के स्फुट रूप से स्फुटित न होने के कारण ही हुआ, जैसा कि यह निर्देश करती है— अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद् यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ध्व० ३।४६ आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में रीति पर जो विचार किया है वह उनकी मौलिक प्रतिभा का संकेत करता है । ध्वनिकार का रीतिप्रकरण इस कारिका से आरम्भ होता है— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान्— ॥ ३।६ संघटना और गुणों के सम्बन्ध का तर्कपूर्ण विवेचन यहाँ ध्वनिकार ने प्रस्तुत किया है । ध्वनि और वृत्ति—आनन्दवर्धन ने उपनागरिका आदि वृत्तियों को गुणों से अभिन्न माना है । वे दो प्रकार की वृत्तियों से परिचय रखते हैं, एक कैशिकी आदि वाच्याश्रय नाट्यवृत्तियां और दूसरी वाचकाश्रय उपनागरिका आदि वृत्तियाँ । इन्हें भी रस के अनुगुण होना चाहिए— ( वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिताः कामपि काव्यस्य नाट्यस्य च छायामावहन्ति ) । ध्वनिकार की कारिका है— रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान् यस्ता एव वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥ ३।३३ ध्वनिकार के अनुसार उपनागरिका आदि वृत्तियां शब्दतत्त्व पर आश्रित हैं और कैशिकी आदि वृत्तियाँ अर्थतत्त्व पर— शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिद् अर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ३।४७ ध्वनि और वक्रोक्ति—वक्रोक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम भामह द्वारा हुआ— सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ भामह के अनुसार अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है । यह समग्र अलङ्कारों का मूल है । आनन्दवर्धन भी इस विचार से सर्वथा सहमत हैं, जैसा कि उनका कथन है—'अतिशयोक्तिगर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया ।...... तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशययोगोऽ- न्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वीकरणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात् सैव सर्वालङ्काररूपेत्यय-