ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
( ४५ ) वाच्यानां वाचकानाञ्च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत् कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३।३२ ध्वनि और रीति—ध्वनि की प्रतिष्ठा के पूर्व आचार्य वामन ने काव्य के आत्मा के रूप में रीति को प्रतिष्ठित कर दिया था । उनके अनुसार रीति विशिष्टा पदरचना है, पदरचना में वैशिष्ट्य का सम्पादन गुणों द्वारा होता है ( विशेषो गुणात्मा ) । आनन्दवर्धन ने पदरचना रूप रीति को 'संघटना' के नाम से अभिहित किया । उचित पदसंघटना से रस के उन्मीलन में सहायता पहुँचती है इस विचार से ध्वनिकार ने रीति को रस से उपकार्योपकारकभाव रूप से सम्बद्ध कर दिया । ध्वनिकार के अनुसार रीति का प्रवर्तन ध्वनितत्त्व के स्फुट रूप से स्फुटित न होने के कारण ही हुआ, जैसा कि यह निर्देश करती है— अस्फुटस्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद् यथोदितम् । अशक्नुवद्भिर्व्याकर्तुं रीतयः सम्प्रवर्तिताः ॥ ध्व० ३।४६ आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में रीति पर जो विचार किया है वह उनकी मौलिक प्रतिभा का संकेत करता है । ध्वनिकार का रीतिप्रकरण इस कारिका से आरम्भ होता है— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान्— ॥ ३।६ संघटना और गुणों के सम्बन्ध का तर्कपूर्ण विवेचन यहाँ ध्वनिकार ने प्रस्तुत किया है । ध्वनि और वृत्ति—आनन्दवर्धन ने उपनागरिका आदि वृत्तियों को गुणों से अभिन्न माना है । वे दो प्रकार की वृत्तियों से परिचय रखते हैं, एक कैशिकी आदि वाच्याश्रय नाट्यवृत्तियां और दूसरी वाचकाश्रय उपनागरिका आदि वृत्तियाँ । इन्हें भी रस के अनुगुण होना चाहिए— ( वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिताः कामपि काव्यस्य नाट्यस्य च छायामावहन्ति ) । ध्वनिकार की कारिका है— रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान् यस्ता एव वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥ ३।३३ ध्वनिकार के अनुसार उपनागरिका आदि वृत्तियां शब्दतत्त्व पर आश्रित हैं और कैशिकी आदि वृत्तियाँ अर्थतत्त्व पर— शब्दतत्त्वाश्रयाः काश्चिद् अर्थतत्त्वयुजोऽपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेऽस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ३।४७ ध्वनि और वक्रोक्ति—वक्रोक्ति का प्रयोग सर्वप्रथम भामह द्वारा हुआ— सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते । यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ भामह के अनुसार अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है । यह समग्र अलङ्कारों का मूल है । आनन्दवर्धन भी इस विचार से सर्वथा सहमत हैं, जैसा कि उनका कथन है—'अतिशयोक्तिगर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया ।...... तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशययोगोऽ- न्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वीकरणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात् सैव सर्वालङ्काररूपेत्यय-
( ४६ )
मैवार्थोऽवगन्तव्यः ।' ( ध्व० पृ० ४९८ ) वक्रोक्ति का एक सम्प्रदाय के रूप में विकास आनन्दवर्धन के पश्चात् आचार्य कुन्तक ने किया, वह ध्वनि-सिद्धान्त की प्रतिक्रिया थी। इसी कारण कुन्तक द्वारा इतनी मौलिकता से वक्रोक्ति की स्थापना के होने पर भी ध्वनि का विजयस्तम्भ बिलकुल नहीं हिला, वह ज्यों का त्यों अडिग बना रहा ।
ध्वन्यालोक के संस्करण
सर्वप्रथम बम्बई के काव्यमाला सीरीज में ई० सन् १८९१ में ध्वन्यालोक के प्रथम तीन उद्योत अभिनवगुप्त के लोचन के साथ, और चतुर्थ टीकारहित, मुद्रित हुए, जिनके आधार तीन पाण्डुलिपियां थीं। चतुर्थ उद्योत का लोचन तब अप्राप्त था। इसके द्वितीय संस्करण का प्रकाशन ई० सन् १९११ में हुआ। इसके सम्पादकों ( म० म० पं० दुर्गाप्रसाद, काशीनाथ परव और वासुदेव लक्ष्मणशास्त्री पणशीकर ) के अनुसार तीन आधारभूत प्रतियों में प्रथम ( 'क' संज्ञक ) प्रति कश्मीर महाराज के आश्रित ज्योतिर्विद् दयाराम शर्मा की पुस्तक का प्रायः अशुद्ध प्रतिरूपक थी । द्वितीय ( 'ख' संज्ञक ) प्रति श्रीरामकृष्णभाण्डारकर के पुण्यपत्तनस्थ राजकीय पुस्तकालय की पुस्तक थी, यह भी काश्मीरक पुस्तक का प्रतिरूपक है। तृतीय ( 'ग' संज्ञक ) प्रति मैसूर के मरिमल्लप्पा स्कूल के संस्कृताध्यापक आ० अनन्ताचार्य पण्डित के दो सौ वर्ष प्राचीन किसी तालपत्र की प्रतिरूपक थी। यह निर्णय- सागरीय काव्यमाला सीरीज का संस्करण मूल की दृष्टि से प्रायः दोषपूर्ण है। अब कई पाण्डुलिपियां मिल चुकी हैं। जैसा कि म० म० काणे महाशय का कहना है, अकेले भाण्डारकर संस्थान में पाँच पाण्डुलिपियाँ देवनागरी अक्षरों में और दो शारदा लिपि में प्राप्त हैं। कलकत्ता संस्कृत सीरीज़ ने ‘ध्वन्यालोक' का एक संस्करण मधुसूदनमिश्र लिखित 'अवधान' नामक आधुनिक टीका के साथ प्रकाशित किया। काणे महाशय के अनुसार इसका आधार काव्यमाला संस्करण है। डॉ० जाकोबी ने ध्वन्यालोक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने शुद्ध पाठों के सम्बन्ध में कुछ सुझाव भी दिए जो आगे चलकर अधिकांश मान्य हुए। डॉ० एस० के० डे महाशय ने ध्वन्यालोक के चतुर्थ उद्योत के लोचन का सर्वप्रथम सम्पादन किया। फिर काशी चौखम्बा से सम्पूर्ण ध्वन्यालोक तथा सम्पूर्ण लोचन श्री पट्टाभिरामशास्त्री के सम्पादकत्व में आधुनिक 'वालप्रिया' और 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी के साथ १९४० ई० में प्रकाशित हुआ। काशी चौखम्बा से ही पं० बदरीनाथ झा की आधुनिक दीधिति टीका के साथ केवल ध्वन्यालोक प्रकाश में आया। मद्रास से ई० सन् १९४४ में ही ध्वन्यालोक-लोचन का प्रथम उद्योत उत्तुङ्गोदयराज की कौमुदी व्याख्या और म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री के 'उपलोचन' के साथ प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात १९५२ ई० में हिन्दी में सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अनुवाद एवं व्याख्यान आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि ने प्रस्तुत किया। इसकी भूमिका डॉ० नगेन्द्र एम० ए०, डी० लिट्० ने लिखी। यह कार्य ध्वन्यालोक के मूल से अवगत होने के लिए अवश्य ही प्रशंसा के योग्य है, किन्तु इसमें पाठभेदसम्बन्धी कोई परिवर्तन नहीं हुआ बल्कि बालप्रिया संस्करण वाले पाठों का ही अनुगमन हुआ। १९५५ ई० में पूना ओरियण्टल सीरीज में डॉ० कृष्णमूर्ति ने सम्पूर्ण ध्वन्यालोक का अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् १९५६ ई० में श्रीविष्णुपद भट्टाचार्य ने ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत का इंग्लिश exposition के साथ सुन्दर संस्करण प्रस्तुत किया। १९५७ ई० में द्वितीय उद्योत भी इसी क्रम में प्रकाशित हुआ।
( ४७ ) प्रस्तुत अनुवाद और व्याख्यान का आधार-भूत संस्करण चौखम्बा का 'बालप्रिया' वाला संस्करण ही रहा, अतः उसके ही स्वीकृत पाठभेद बहुत कुछ अपरिवर्तनों के साथ यहां लिए गए हैं। व्याख्यान के बाद अनेक स्थलों पर पुनर्विचार के बाद मैं अनेक परिवर्तन और शोधन की दृष्टि से प्रवृत्त हुआ और कुछ मुझे सफलता भी मिली। किन्तु खेद है कि उन परिवर्तनों का निर्देश यहां नहीं कर सका। यत्र-तत्र मुझसे जो कुछ भ्रान्तियां हो गई हैं उनके संशोधन की विनम्र आशा विद्वज्जनों से करता हूँ। मेरे विचार में सलोचन ध्वन्यालोक अभी अपने शोधन, अर्थनिश्चायन एवं मूल्याङ्कन के लिए अनेक प्रतिभाशाली विचारकों की एकनिष्ठ साधना की प्रतीक्षा में है। मैं अपने इस छोटे से प्रयत्न द्वारा ध्वन्यालोक के अभीष्ट अर्थ तक पहुँचने में यदि जिज्ञासुजनों का सहायक हुआ तो यही मेरे श्रम की सार्थकता होगी। मैंने अपने इस व्याख्यान एवं भूमिका में जिन विद्वानों की कृतियों से लाभ उठाया है उनका ऋणी हूँ। विशेषतः 'लोचन' के अर्थज्ञान में मुझे 'बालप्रिया' ने अधिक सहायता पहुँचाई है, अतः बालप्रियाकार श्री रामशारक महोदय का मैं विशेष ऋणी हूँ। पुनः अपनी त्रुटियों के प्रति विद्वानों से क्षमा-प्रार्थना के साथ— जगन्नाथ पाठक
शुद्धिपत्र
( ध्वन्यालोक )
| अशुद्ध | पृष्ठ | पंक्ति | शुद्ध |
|---|---|---|---|
| वर्णसंघटनार्धर्माश्च | १७ | ३ | सङ्घटनाधर्माश्च |
| तत्समतान्तःपातिनः | २३ | ४ | तत्समयान्तःपातिनः |
| व्याप्यन्त | १६१ | २ | व्याप्यन्ते |
| घेप्पन्ति | १७८ | २ | घेप्पन्ति |
| रूपकादिर- | २३७ | ३ | रूपकादेर- |
| वाच्यत्वे न | ३०० | १ | वाच्यत्वेन |
| शृङ्गारे ते न | ३२८ | ३ | शृङ्गारे तेन |
| ते न वर्णा | ३२८ | ५ | तेन वर्णा |
| गुणरूपत्वे गुणरूपत्वे | ३४७ | ४ | गुणरूपत्वे |
| एतच्च एमदीये | ४२८ | ६ | एतच्च मदीये |
( लोचन )
| अशुद्ध | पृष्ठ | पंक्ति | शुद्ध |
|---|---|---|---|
| -भावेनार्थवत्त्वा- | १० | १ | -भावेनार्थतत्त्वा-; -भावेनार्थत्वा-- |
| शब्दार्थयोश्चारुत्वं | १८ | १ | शब्दार्थयोर्यतश्चारुत्वं |
| मधुरिवौ | ८३ | २ | मधुरिपौ |
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विषय-सूची ( ध्वन्यालोक-लोचन ) प्रथम उद्योत पृष्ठ ( क ) लोचन का मङ्गलाचरण १ ( ख ) लोचनकार द्वारा स्वपरिचय २ ( ग ) ध्वन्यालोक का मंगलाचरण तथा उस पर विस्तृत व्याख्यान ३ १. ध्वनिविषयक तीन विप्रतिपत्तियां और ग्रन्थ का प्रयोजन ८ तीन प्रधान विप्रतिपत्तियों का संक्षिप्त निर्देश १४ अभावविकल्प के तीनों प्रकारों का संक्षिप्त निर्देश १५ अभाववादियों का प्रथम विकल्प १७ शब्द-अर्थ के चारुत्व के दो भेद १८ वृत्तियों का स्वरूप-विचार १९ अभाववादियों का द्वितीय विकल्प २३ अभाववादियों का तृतीय विकल्प २६ अभाववादियों के मत का उपसंहार २७ मनोरथकवि का ध्वनिविरोधी श्लोक २९ भाक्तवादियों का विकल्प २९ 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्ति और सङ्गति ३० लो० में 'गुणवृत्ति' का अर्थ ३३ अलक्षणीयतावादियों का मत ३५ ध्वनि-स्वरूप के प्रकाशन का उद्देश्य ३६ लो० में विभिन्न सम्बन्धों का निर्देश ३७ 'सहृदय' का स्वरूप ३९ काव्य में ध्वनि के अंशतत्ववादी भट्टनायक के मत का खण्डन ४० काव्य के मुख्य प्रयोजन के रूप में प्रीति या आनन्द का निर्देश ४१ २. ध्वनि-सिद्धान्त की भूमिका ४३ काव्यात्मभूत अर्थ के भेद : वाच्य और प्रतीयमान ४३ 'सहृदयश्लाघ्य' विशेषण के तात्पर्य का प्रतिपादन ४४ ३. वाच्य अर्थ के प्रतिपादन का अभाव ४६ ४. प्रतीयमान का वाच्य से भिन्नत्व ४७ 'महाकवि' व्यपदेश का कारण ४८ 'लावण्य' पर विचार ४९ प्रतीयमान के भेद ५० ४ ध्व० भू०
( ५० ) पृष्ठ ध्वनि के तीन रूप : वस्तु, अलङ्कार और रस ५१ वाच्य से वस्तुव्यङ्ग्य का भेद ५१ विधिरूप वाच्य में प्रतिषेधरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण ५१ ‘भ्रम धार्मिक०’ इस गाथा का व्याख्यान ५३ अभिहितान्वयवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ५४ अन्विताभिधानवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ६२ ‘भ्रम धार्मिक०’ पर भट्टनायक के विचार तथा उसका खण्डन ६७ प्रतिषेधरूप वाच्य में विधिरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७१ इस पर भट्टनायक के विचार का खण्डन ७२ विधिरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७३ प्रतिषेधरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७४ विषय-भेद से भी व्यङ्ग्य का वाच्य से भेद-प्रतिपादन एवं उदाहरण ७६ रसादि का वाच्यसामर्थ्य से आक्षिप्तत्व-प्रतिपादन ८१ ५. इतिहास के व्याज से रस के काव्यात्मत्व का प्रसाधन ८६ ६. प्रतीयमान रस का सहृदयानुभवसिद्धत्व-प्रतिपादन ९२ ७. प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति काव्यार्थतत्त्वज्ञों को ही ९४ ८. व्यङ्ग्य का प्राधान्य-प्रतिपादन ९७ ९. वाच्य और वाचक के प्रथम उपादान का युक्तिपूर्वक उपपादन ९८ १०. व्यङ्ग्य अर्थ के वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकत्व का उपपादन ९९ ११ १२. पहले वाच्यार्थकी प्रतीति के होने पर भी व्यङ्ग्यार्थ के प्राधान्य की अक्षुण्णता १०१ १३. ध्वनि-काव्य का लक्षण १०२ भट्टनायक के मत का दूषण १०३ चारुत्व-प्रतीति को काव्यात्मा स्वीकार करना १०४ अलंकारादि प्रकारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का निषेध १०७ ‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ का स्पष्टीकरण १०८ ‘समासोक्ति’ में व्यङ्ग्यानुगत वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १०९ ‘आक्षेप’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १११ चारुत्व का उत्कर्ष ही वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य का आधार ११४ ‘अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन ११७ ‘पर्यायोक्त’ में ध्वनि के अन्तर्भाव का निराकरण ११८ ‘अपह्नुति’ और ‘दीपक’ में वाच्य के प्राधान्य का निर्देश १२१ सङ्करालङ्कार में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १२२ ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १३३ पूर्वोक्त विषयों का संक्षेप से प्रतिपादन १३५ प्रकारान्तर से अलङ्कार और ध्वनि के तादात्म्य का निराकरण १३६ ‘सूरिभिः कथित’ इस कारिका भाग का व्याख्यान १३७ वैयाकरणों के अनुसार ध्वनि १३८
( ५१ ) पृष्ठ अभाववादियों के प्रति उत्तर का उपसंहार १४२ ध्वनि के दो भेद १४३ अविवक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण १४५ विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का उदाहरण १४६ भाक्तवादी के मत के दूषण का उपक्रम १४८ १४. भक्ति और ध्वनि के एकत्व का निषेध १४९ कवियों द्वारा उपचरित शब्दवृत्ति से व्यवहार के उदाहरण १५१ १५. उक्त्यन्तर से अशक्य चारुत्व का व्यञ्जक शब्द 'ध्वनि' है १५५ १६. रूढ़ शब्द भी ध्वनि के विषय नहीं होते १५६ १७. गुण-वृत्ति से बोध्य अर्थ में शब्द स्खलद्गति नहीं है १५७ १८. लक्षणा-व्यापार और ध्वनन-व्यापार का भिन्न-विषयकत्व १५९ भक्ति के ध्वनि का लक्षण होने पर अव्याप्ति का निर्देश १५९ गौण और लाक्षणिक के भेद का प्रतिपादन १५९ लक्षणा के भेद १६० रत्यादि-प्रतीति का शाब्दत्व न स्वीकारने वाले मीमांसक का मत एवं उसका दूषण १६१ रस-प्रतीति के अलौकिकत्व का उपपादन १६४ १९. भक्ति को किसी ध्वनि-भेद का उपलक्षण मान लेना १६७ २०. अलक्षणीयतावादी के मत का दूषण १६९ द्वितीय उद्योत १. अविवक्षितवाच्यध्वनि के दो भेद १७४ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि के उदाहरण १७५ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि के उदाहरण १८० २. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के दो भेद १८३ ३. रसादि का ध्वनित्व १८३ भावध्वनि का उदाहरण १८४ व्यभिचारी भावों के तीन धर्म (उदय, स्थिति, अपाय) और सन्धि तथा शबलता १८४ रसध्वनि का उदाहरण १८८ ४. रसध्वनि का विषय १८९ रस के विषय में भट्टनायक के मत का उपपादन १९० पूर्वोक्त मत का खण्डन १९३ रस के सम्बन्ध में विभिन्न मत १९६ ५. रसाद्यलङ्कार का विषय २०१ शुद्ध रसाद्यलङ्कार का उदाहरण २०३ सङ्कीर्ण अङ्गभूत रसादि का उदाहरण २०६
( ५२ ) पृष्ठ ध्वनि, उपमादि अलङ्कार तथा रसवदाद्यलङ्कार का भेदोपसंहार २०९ चेतन वस्तुओं के वाक्यार्थीभाव की स्थिति रसाद्यलङ्कारत्व का खण्डन २११ ६. गुण और अलङ्कार के लक्षण २१६ ७. माधुर्य गुण का आधार २१७ ८. शृङ्गार, विप्रलम्भ शृङ्गार तथा करुण में उत्तरोत्तर माधुर्य की आर्द्रता २१८ ९. ओजस् के आधार ( तथा उदाहरण ) २२० १०. प्रसाद गुण का स्वरूप २२४ ११. श्रुतिदुष्टादि अनित्य दोषों के ध्वन्यात्मक शृङ्गार में हेयत्व का प्रतिपादन २२५ १२. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के अङ्गों के आनन्त्य का प्रतिपादन २२७ शृङ्गार के स्वगतभेद २२८ १३. सचेतस् जनों के लिए दिङ्मात्र कथन २२९ १४. शृङ्गार के प्रभेदों में अनुप्रास के व्यञ्जकत्वाभाव का उपपादन २३० १५. विशेषतः विप्रलम्भ शृङ्गार में यमक आदि का प्रतिषेध २३० १६. ध्वनि में रसाक्षिप्त रूप से बन्ध वाले अलङ्कार का उपपादन २३१ पूर्वोक्त विषयों का संग्रह २३४ १७. रूपकादि अलङ्कारों के शृङ्गारव्यञ्जकत्व का उपपादन २३५ १८-१९. रूपकादि अलङ्कारवर्ग के विनिवेशन में समीक्षा २३६ रस के अङ्गरूप से अलङ्कार की विवक्षा का उदाहरण २३७ रस के तात्पर्य में भी अलङ्कार के अङ्गी रूप से विवक्षित होने का उदाहरण २३८ अङ्ग रूप से विवक्षित होने पर भी अवसर में ग्रहण का उदाहरण २३९ गृहीत अलङ्कार के भी अवसर में त्याग का उदाहरण २४१ संसृष्टि के विषयापहार की स्थिति २४३ इसके निर्वाह के लिए अलङ्कार का पूरा निर्वाह नहीं २४६ निर्वाह के दृष्ट भी अलङ्कार का अङ्ग रूप से प्रत्यवेक्षण २४७ २०. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के द्वितीय भेद का विभाग २५० २१. शब्दशक्त्युद्भव अनुरणनरूप ध्वनि का स्वरूप २५१ श्लेष का उदाहरण २५१ श्लेष और शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि का विषय-विभाग २५३ लोचन में चार विभिन्न मतों की चर्चा २६० शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अन्य अलङ्कारों के उदाहरण २६४ २२. अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि २६७ २३. कविद्वारा स्वोक्ति से आविष्कृत व्यङ्ग्य का तृतीय प्रकार २७१ २४. अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य का विभाग २७४ कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर का उदाहरण २७५ कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर के उदाहरण २७६ २५. अर्थशक्त्युद्भव में अलङ्कार-ध्वनि २७८ २६. गम्यमान रूपक आदि अलङ्कारवर्ग का विस्तार २७९
( ५३ ) पृष्ठ २७. अलङ्कारान्तर की प्रतीति में तत्परत्व न होने की स्थिति में ध्वनिव्यपदेशाभाव २८० पूर्वोक्त विषय के अपवाद का निरूपण २८२ उपमा-ध्वनि २८६ आक्षेप-ध्वनि २८७ शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्य अर्थान्तरन्यासध्वनि २८८ अर्थशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्य अर्थान्तरन्यासध्वनि २८९ व्यतिरेक-ध्वनि के भी दो प्रकार २९० उत्प्रेक्षा-ध्वनि २९१ : श्लेषध्वनि २९४ यथासंख्य ध्वनि २९५ ( लोचन में ) दीपक, अप्रस्तुतप्रशंसा, अपह्नुति आदि ध्वनि २९६ २८. अलङ्कार-ध्वनि की प्रयोजनवत्ता का प्रतिपादन ३०० २९. वस्तुमात्र से अलङ्कार के व्यङ्ग्य होने पर ध्वन्यङ्गता ३०१ ३०. अलङ्कारान्तर के व्यङ्ग्यत्व की स्थिति में ध्वन्यङ्गता ३०१ ३१. प्रतीयमान अर्थ के अस्फुटत्व में ध्वन्यभाव ३२. विवक्षितवाच्य के आभास का विवेक ३०३ ३३. अविवक्षितवाच्य के आभास का विवेक ३०७ ३४. ध्वनि का उपसंहार ३०९ तृतीय उद्योत १. ध्वनि के दोनों भेदों के पद-प्रकाश और वाक्यप्रकाश रूप ३१२ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य प्रभेद में पदप्रकाशता ३१३ अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य में पदप्रकाशता ३१४ अविवक्षितवाच्य के अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य प्रभेद में वाक्यप्रकाशता ३१७ अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में वाक्यप्रकाशता ३१९ विवक्षितवाच्य के अनुरणनरूप व्यङ्ग्य के शब्दशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता ३२० ,, ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२१ ,, ,, कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न अर्थशक्त्युद्भव में पदप्रकाशता ३२१ ,, ,, ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२३ स्वतःसम्भविशरीर अर्थशक्त्युद्भव प्रभेद में पदप्रकाशता ३२३ ,, ,, वाक्यप्रकाशता ३२४ काव्यविशेष ध्वनि के पदप्रकाशत्वादि की अनुपपत्ति की शङ्का और परिहार ३२५ पूर्वोक्त विषयों का सङ्ग्रह द्वारा प्रतिपादन ३२६ २. वर्ण, पद आदि में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि ३२७ ३. वर्णों के रसद्योतकत्व का उपपादन ३२८ पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन ३३० पदावयव से द्योतन ३३०
( ५४ ) पृष्ठ वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि शुद्ध और अलङ्कारसंकीर्ण ३३३ ४. सङ्घटना के स्वरूप का उपपादन ३३७ ५. माधुर्यादि गुणों के आश्रय से सङ्घटना के रसाभिव्यञ्जकत्व का उपपादन ३३७ गुण और संघटना का भेद-विचार ३३७ ६. सङ्घटना के नियम में हेतु वक्तृ-वाच्यगत औचित्य ३३८ सङ्घटना सामान्य में प्रसाद की आवश्यकता का उपपादन ३५१ ७. सङ्घटना का नियामकान्तर विषयाश्रय औचित्य और उसके भेद ३५२ ८. गद्यबन्ध में भी सङ्घटना का नियामक हेतु वक्तृवाच्यगत औचित्य ३५७ ९. गद्यबन्ध में भी रसबन्धोक्त औचित्य के संश्रित संघटना ३५८ १०-१४. प्रबन्ध का रसादि के व्यञ्जकत्व में निबन्धन ३५९ अनौचित्य और औचित्य ३६२ कथाशरीर का रसमयत्व ३६६ १५. प्रबन्धों में अनुरणनरूप दूसरा प्रभेद भी भासित होता है ३७६ १६. सुप्तिङ््वचनकारकसमासादि से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन ३७९ 'न्यक्कारो ह्ययमेव०' में सुवादि का व्यञ्जकत्व ३८० सुबन्त का व्यञ्जकत्व ३८३ तिङन्त का व्यञ्जकत्व ३८४ सम्बन्ध का व्यञ्जकत्व ३८५ निपातों का व्यञ्जकत्व ३८५ उपसर्गों का व्यञ्जकत्व ३८६ पादपौनरुक्त्य का शोभावहत्व ३८८ काल का व्यञ्जकत्व ३८९ प्रत्यय तथा प्रकृत्यंश का व्यञ्जकत्व ३९० १७. रसमयता के लिए विरोधियों के परिहार की आवश्यकता ३९५ १८-१९. रस के विरोधी तत्त्व ३९६ पूर्व विषयों का संग्रह द्वारा कथन (परिकर-श्लोक) ४०१ २०. बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों के कथन की निर्दोषता ४०२ २१. एक रस का अङ्गीकार ४१५ २२. रसान्तरों के समावेश से प्रस्तुत रस की अङ्गिता उपहत नहीं ४१६ २३. पूर्वोक्त विषय के उपपादनार्थ कथन ४१७ २४. अन्य रस के अङ्गी होने पर अविरोधी-विरोधी रस का परिपोष नहीं चाहिए ४२० २५. विरोधी के विभिन्नाश्रय होने पर परिपोष होने पर भी दोष नहीं ४२७ २६. विरोधी का रसान्तर के व्यवधान से प्रबन्ध में निवेशन ४२९ २७. बीच में दूसरे रस के होने पर दो रसों के विरोध का समाहार ४३५ २८. सभी रसों में, विशेषतः शृङ्गार में, विरोध-अविरोध निरूपणीय ४३६ २९. शृङ्गार रस में अतिशय अवधान की अपेक्षा ४३७ ३०. शृङ्गार-विरुद्ध रस में उसके अङ्गों का स्पर्श दूषित नहीं ४३७
( ५५ ) पृष्ठ ३१. रसादि के विरोध-अविरोध के ज्ञान का लाभ ४४० ३२. वाच्य और वाचक का औचित्य के साथ योजना महाकवि के लिए आवश्यक ४४१ ३३. रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित वृत्तियों का शोभावहत्व ४४३ रसादि का इतिवृत्तादि के साथ गुणगुणिब्यवहार की शङ्का और उसका समाधान ४४३ वाच्य और व्यङ्ग्य की एक काल में प्रतीति की शङ्का और समाधान ४४६ वाक्य का व्यञ्जकत्व स्वीकार न करने वाले मीमांसक के मत का आक्षेप तथा समाधान ४५४ व्यञ्जकत्व और गौणत्व में स्वरूपतः और विषयतः भेदोपादान ४६४ व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का स्वरूप-विवेक ४८० ३४. काव्य का दूसरा प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य ४९२ त्रिविध गुणीभूतव्यङ्ग्य का निर्देश ४९३ ३५. काव्यबन्धों में गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार की योजनीयता ४९६ ३६. गुणीभूत व्यङ्ग्य के कारण अलङ्कारों की रस्यता का निर्देश ४९७ भामह का अतिशयोक्ति-लक्षण ४९९ ३७. प्रतीयमानकृत छाया और स्त्रियों की लज्जा ५०६ ३८. काकु से अर्थान्तर-प्रतीति के स्थल में गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ५०८ ३९. गुणीभूतव्यङ्ग्य के विषय में ध्वनि की योजना नहीं करनी चाहिए ५११ ४०. रसादितात्पर्य की पर्यालोचना से गुणीभूतव्यङ्ग्य का भी ध्वनिरूपत्व ५१४ वाच्य-व्यङ्ग्य के प्राधान्याप्राधान्य के विवेक के लिए प्रयत्न का निर्देश ५१७ 'लावण्यद्रविणव्ययो०' में व्यामोह का निर्देश ५१८ अप्रस्तुतप्रशंसा के तीन प्रकार ५२१ ४१. ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के अतिरिक्त चित्र ५२५ ४२. चित्र काव्य के दो भेद ५२५ 'चित्र' शब्द का अर्थ-निरूपण ५२६ पूर्वोक्त विषयों का संग्रह ५२८ कवि का स्वातन्त्र्य ५३० संग्रह द्वारा कथन ५३२ ४३. सङ्कर और संसृष्टि से ध्वनि का अनन्तप्रकारत्व ५३३ ध्वनिप्रभेदसंकीर्णत्व का निरूपण ५३४ गुणीभूतव्यङ्ग्यसंकीर्णत्व का निरूपण ५३६ वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्व का निरूपण ५४० वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्व ५४४ संसृष्टालङ्कारान्तरसंकीर्ण ध्वनि ५४७ संसृष्टालङ्कारसंसृष्ट ध्वनि ५४९ ४४. ध्वनि के प्रभेद और प्रभेद-भेदों की अनन्तता ५५० ४५. सत्काव्य को करने के लिए या जानने के लिए ध्वनि प्रयत्नपूर्वक विवेचनीय ५५१ ४६. रीतियों के प्रवर्तन का कारण ५५१ ४७. शब्दतत्त्वाश्रय और अर्थतत्त्वाश्रय वृत्तियों का प्रकाशन ५५२
( ५६ ) चतुर्थ उद्योत पृष्ठ १. ध्वनि के व्युत्पादन में प्रयोजनान्तर कवियों की प्रतिभा का आनन्त्य ५५७ २. ध्वनि के अन्यतम प्रकार से भी वाणी का नवत्व ५५८ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के आश्रयण से वाणी के नवत्व का उदाहरण ५५९ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के समाश्रयण से वाणी के नवत्व का उदाहरण ५६१ विवक्षितान्यपरवाच्य के उक्त प्रकारों के आश्रयण से वाणी के नवत्व के उदाहरण ५६२ ३. इस युक्ति के आश्रयण से रसादि ध्वनि-मार्ग के बहुप्रकारत्व का उपपादन ५६४ ४. रस के परिग्रह से दृष्टपूर्व अर्थों का नवत्व, मधुमास में वृक्षों की भांति ५६७ विवक्षितान्यपरवाच्य के शब्दशक्तिमूल-अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व के उदाहरण ५६७ अर्थशक्तिमूलअनुरणनरूप व्यङ्ग्य के कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर होने से नवत्व ५६९ ५. विविध व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के होने पर भी कवि को रसमय काव्य के निर्माण में सावधान होना चाहिए ५६९ अङ्गी रस की स्थिति में छायातिशय के प्रसंग में रामायण और महाभारत क्रमशः करुण और शान्तरस के मुख्यत्व का उपपादन ५७० लोचन में गुणीभूतव्यङ्ग्य के विविध व्यङ्ग्य के प्रकारों के आश्रयण से नवत्व के उदाहरण ५८० ६. प्रतिभागुण के कारण काव्यार्थ के विराम के अभाव का प्रतिपादन ५८० ७. देश, काल आदि अवस्थाभेद से शुद्ध वाच्य के भी आनन्त्य का प्रतिपादन ५८३ ८. अवस्थादि से विभिन्न वाच्यों का निबन्धन लक्ष्य में अधिक, रसाश्रय से शोभित ५९३ ९. औचित्यानुसारिणी देशकालादिभेदिनी रसादिसम्बद्ध वस्तुगति ५९३ १०. काव्यस्थिति का अक्षयत्व ५९३ ११. संवादों की बहुलता ५९४ १२. कविवाणी के मिथःसंवाद में भी उनका भिन्नविषयत्व ५९४ १३. संवाद के विभाग ५९५ १४. सदृश वस्तु के प्रतिपादन में भी काव्य का नवत्व ५९६ १५-१६. पूर्वोक्त वस्तु के प्रतिपादन में कवि को दोष नहीं ५९७-८ १७. कवि को भगवती सरस्वती का योग ५९९ १८. उपसंहार ६०० परिशिष्ट १. ध्वनिकारिकार्धसूची ६०५ २. वृत्तिग्रन्थ-पद्यसूची ६०९ ३. लोचन में उद्धृत उदाहरणपद्यों एवं वाक्यों की सूची ६१२, ४. ध्वन्यालोक में उद्धृत ग्रन्थ और ग्रन्थकार ६१६, ५. लोचन व्याख्यान में उद्धृत ग्रन्थ और ग्रन्थकार ६१६, —००;०;००—
॥ श्रीः ॥ ध्वन्यालोकः 'लोचन' 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतः प्रथम उद्योतः लोचनम् श्रीभारत्यै नमः अपूर्वं यद्वस्तु प्रथयति विना कारणकलां जगद्ग्रावप्रख्यं निजरसभरात्सारयति च । क्रमात्प्रख्योपाख्याप्रसरसुभगं भासयति तत् सरस्वत्यास्तत्त्वं कविसहृदयाख्यं विजयते ॥ जो कारण-सामग्री के लेश के बिना, अपूर्व (सर्वथा नवीन) वस्तु को उत्पन्न करता—फैला देता है और पत्थर के समान (नीरस) जगत् को अपने रसभार से सारवान् बना देता है तथा क्रम से प्रख्या (कवि की प्रतिभा) और उपाख्या (वचन) के प्रसर से सुभग (हृद्य) होता हुआ (वस्तुजात को) भासित करता है, वह कवि और सहृदय द्वारा आख्यात सरस्वती का तत्त्व (काव्य) विजयी है (सबसे बढ़कर है) । १. श्रीमन् आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने अपने 'लोचन' व्याख्यान के आरम्भ में नमस्कारात्मक मङ्गल 'सरस्वती के कविसहृदयाख्य तत्त्व' की विजय (उत्कर्ष) के रूप में प्रस्तुत किया है। 'सरस्वती का कविसहृदयाख्य तत्त्व' यहाँ काव्य ही प्रतीत होता है, क्योंकि कवि 'काव्य' का रचयिता होता है और सहृदय उसका विचारक या अनुशीलनकर्ता, इस प्रकार दोनों के अस्तित्व का एकमात्र आधार 'काव्य' है, अतः काव्य क्या है ? 'कविसहृदय' रूप है, 'लोचन' की टिप्पणी 'बालप्रिया' में एक दूसरे ढंग से यह भी कहा है कि कवि और सहृदय, दोनों जिसे आख्यान करते अर्थात् कहते हैं (कविसहृदयैराख्यायते उच्यते इति), अथवा कवि और सहृदय में जिसका 'निरन्तर ख्यान' अर्थात् स्फुरण होता है (कविसहृदययोराख्या, आभीक्ष्ण्येन ख्यानं स्फुरणं यस्य)। वाग्देवता सरस्वती ने अपने आपको 'काव्य' के स्वरूप में प्रकट किया है, जैसा कि राजशेखर की 'काव्यमीमांसा' में सरस्वती के पुत्र 'काव्यपुरुष' के कथानक का भी उल्लेख है। यह परम्परा से भारतीय साहित्य की परिनिष्ठित मान्यता है। इस प्रकार 'काव्य' सरस्वती का तत्त्व या पारमार्थिक रूप है। वह इस कारण उत्कर्ष या विजय को प्राप्त है कि उसकी सृष्टि दृश्यमान सृष्टि से सर्वथा अपूर्व है, इसी बात को आचार्य ने मंगल-श्लोक के पूर्व तीन चरणों से सिद्ध किया है। पहली बात यह कही है कि काव्य (कवि-सहृदय) वस्तुजात को, बिना किसी कारण के सम्बन्ध के, अपूर्व अर्थात् सर्वथा नवीन रूप में सामने ला देता है, परन्तु इससे न्यूनतम दृश्यमान जगत् की
२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भट्ठेन्दुराजचरणाम्बजकृताधिवास- हृद्यश्रुतोऽभिनवगुप्तपदाभिधोऽहम् । यत्किंचिदप्यनुरणन्स्फुटयामि काव्या- लोकं स्वलोचननियोजनया जनस्य ॥ भट्ट इन्दुराज के चरण-कमलों में रहकर शास्त्रों को हृदयस्थ करके मैं अभिनवगुप्त- पाद अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा जो कुछ भी कथन करके लोगों के समक्ष 'काव्या- लोक' (ध्वन्यालोक) को स्पष्ट करने जा रहा हूँ।१
सृष्टि उपादान कारणों के द्वारा होती है, इस दृश्यमान सृष्टि के कर्ता में यह सामर्थ्य नहीं कि बिना किसी कारण-सामग्री के सृष्टि कर दे, वह पदे-पदे नियति के नियमों से नियन्त्रित रहता है और दूसरे यह कि उसकी सृष्टि 'अपूर्व' नहीं होती, वही देखी-सुनी वस्तुएँ पैदा करता रहता है। उदाहरणार्थ, दृश्यमान कमल जल के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता किन्तु काव्य में मुखकमल का, जल के बिना ही अपूर्व रूप में उत्पन्न होना प्रसिद्ध है। काव्य की दूसरी विशेषता यह है कि दृश्यमान जगत्, जो पत्थर की भाँति नीरस और कठोर लगता है, को अपनी रस-सम्पत्ति से सारवान् बना देता है तथा अपनी तीसरी विशेषता से, जो प्रतिभा (प्रख्या) और वचन (उपाख्या) के क्रम में विद्यमान है, अपने सभी अपूर्व और सरस निर्माण को हृद्य बनाती है। यह अपूर्वता, सरसता और हृद्यता कविसहृदयाख्य सरस्वतीत्तत्त्व रूप 'काव्य' में एकान्ततः प्राप्त होती हैं, जब कि दृश्यमान जगत् में इन्हें एकान्ततः प्राप्त करना कदाचित् किसी के लिए भी संभव नहीं। इस प्रकार यहाँ दृश्यमान जगत् से काव्य-जगत् का उत्कर्ष रूप व्यतिरेक व्यङ्ग्य होता है। अभिनवगुप्त के इस मङ्गल-श्लोक का साक्षात् प्रभाव आचार्य मम्मट के 'काव्यप्रकाश' के मङ्गल-श्लोक 'नियतिकृतनियम०' पर पड़ा प्रतीत होता है। क्योंकि उसमें भी कविर्निर्मिति को ब्रह्मनिर्मिति से उत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए उसे अनियन्त्रित, हृद्य, अनन्यपरतन्त्र तथा नवरसरुचिरा कहा है। प्रस्तुत में यह कहना अनुचित न होगा कि आचार्य अभिनवगुप्त के समग्र साहित्य-दर्शन पर उनके स्वनिर्मित प्रत्यभिज्ञादर्शन का पुष्कल प्रभाव पड़ा है। वे 'शिव' में सुन्दर और सत्य के एकनिष्ठ साक्षात्कर्ता थे। सम्भवतः यहाँ 'सरस्वती' के रूप में 'स्वतन्त्र चिति शक्ति' अभिमत हो और 'कविसहृदयाख्य' काव्य स्वयं 'शिव' हो १. आचार्य ने अपने विद्याश्रम को परम्परागत बताते हुए, क्योंकि ऐसा किसी को भ्रम न हो कि इनकी कल्पनाओं, विचारों में परम्परा नहीं है, अपने पूज्यपाद गुरु 'भट्ट इन्दुराज' का उल्लेख किया है। साथ ही अपने मन्तव्यों के पीछे वह अभिनिविष्ट नहीं हैं, बल्कि वह 'यत्किञ्चित्' अर्थात् जो कुछ भी कहते हुए प्रस्तुत ग्रन्थ को 'स्फुट' करने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' अपने प्राचीन सङ्केत के अनुसार 'काव्यालोक' के नाम से ही अभिहित रूप में प्राप्त होता है, इसकी 'ध्वन्यालोक' संज्ञा अर्वाचीन प्रतीत होती है। अपनी 'लोचन' टीका के अन्त में भी आचार्य ने इस ग्रन्थ का 'काव्यालोक' के ही नाम से उल्लेख किया है। 'स्वलोचननियोजनया' अर्थात् अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा; यहाँ 'लोचन' पद प्रस्तुत टीका, विचार तथा मन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तात्पर्य यह कि मैं 'लोचन' टीका के रूप में अपना 'विचार' या मन को प्रणिहित करके लोगों के समक्ष 'काव्यालोक' को स्फुट या स्पष्ट कर रहा हूँ। दूसरे यह कि 'लोचन' अर्थात् आँख, प्रस्तुत 'लोचन' के रूप में लोगों को 'आँख' दे रहा हूँ, ताकि 'आलोक' में 'काव्य' को वे स्पष्ट रूप से देख सकें। किसी भी विशेष वस्तु को देखने के लिए विशेष 'दृष्टि' की आवश्यकता होती है, बाह्य दृष्टि का उपयोग केवल सामान्य है। इसीलिए 'गीता' में भगवान्
प्रथम उद्योतः ३ ध्वन्यालोकः श्रीनृहरये नमः स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः । त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिच्छिदो नखाः ॥ अपनी इच्छा से केसरी (सिंह) का रूप धारण किये हुये भगवान् मधुरिपु (मधु नामक दैत्य के शत्रु विष्णु) के, स्वच्छ अपनी छाया (कान्ति) से इन्दु को आयासित (खिन्न) करने वाले तथा प्रपन्न (शरणागत) जनों की आर्ति का छेदन करने वाले नख आप लोगों की रक्षा करें। लोचनम् स्वयमव्युच्छिन्नपरमेश्वरनमस्कारसम्पत्तिचरितार्थोऽपि व्याख्यातृश्रोतॄणा- मविघ्नेनाभीष्टव्याख्याश्रवणलक्षणफलसम्पत्तये समुचिताशीःप्रकटनद्वारेण परमे- श्वरसांमुख्यं करोति वृत्तिकारः—स्वेच्छेति । वृत्तिकार¹ स्वयं विच्छेद-रहित (निरन्तर) परमेश्वर के नमस्कार की सम्पत्ति (परम्परा, आधिक्य) से कृतार्थ होने पर भी व्याख्याता और श्रोताओं की बिना किसी विघ्न के अभीष्ट व्याख्या के श्रवण रूप फल-सम्पत्ति के लिये समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का आभिमुख्य करते हैं—अपनी इच्छा—। कृष्ण ने अपने 'ऐश्वर रूप' को दिखाने के लिए अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' देते हुए कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ (११।८) इसी प्रकार आचार्य अभिनव ने यहाँ 'लोचन' का एक विशेष 'दृष्टि' के अर्थ में प्रयोग किया है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् किसी को काव्य का रहस्य अदृष्ट नहीं रह जाता ! १. वृत्तिकार अर्थात् मूल कारिकाग्रन्थ के वृत्तिग्रन्थ का रचयिता। प्रस्तुत 'लोचन' का आशय यह है कि वृत्तिकार को मङ्गल-श्लोक द्वारा परमेश्वर का नमस्कार करना प्रस्तुत में अभीष्ट न था, क्योंकि वह तो निरन्तर परमेश्वर को नमस्कार करते रहते हुए स्वयं कृतार्थ हो चुके थे, फिर भी प्रस्तुत ग्रन्थ के व्याख्याताओं और श्रोताओं को अभीष्ट व्याख्याश्रवण की फलसम्पत्ति निर्विघ्न रूप में प्राप्त होती रहे, यह उन्हें परम अभिप्रेत था। इसलिए यहाँ वृत्तिकार समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का साम्मुख्य या आभिमुख्य करते हैं, अर्थात् परमेश्वर से व्याख्याता और श्रोताओं के कल्याण की कामना करते हैं। यह प्राचीन भारतीय परम्परा से चला आ रहा है कि ग्रन्थकार अपनी ओर से किसी भी इष्ट देवता को अपने और अपने श्रोतृवर्ग के कल्याण के लिए मङ्गलाचरण के रूप में नमन करता है। अपने लिए प्रायः ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति उसे अभिप्रेत होती है। यह मङ्गलाचरण तीन प्रकार के होते हैं, आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक और वस्तुनिर्देशात्मक। प्रस्तुत मङ्गलाचरण 'आप लोगों की रक्षा करें' इस रूप में होने के कारण आशीर्वादात्मक शैली का है। इसे ग्रन्थकार अपने मन में भी कर ले सकता था; परन्तु प्राचीनकाल में शिष्यों के शिक्षार्थ मङ्गलाचरण को लिपिबद्ध करना अनिवार्य समझा जाता था। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि लोचनकार मङ्गल-श्लोक को प्रस्तुत करते हुए 'वृत्तिकार' का उल्लेख करते हैं, इससे यह प्रतीत होना स्वाभाविक है कि मङ्गल-श्लोक मूलग्रन्थ का नहीं अपितु वृत्तिग्रन्थ का है। ऐसी स्थिति में आचार्य आनन्दवर्धन यदि मूलग्रन्थकार हैं तो वृत्तिग्रन्थ का रचयिता कौन है अथवा आनन्दवर्धन वृत्तिग्रन्थ के यदि रचयिता हैं तो मूलग्रन्थ
४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मधुरिपोर्नखाः वो युष्मान्व्याख्यातृश्रोतॄंस्त्रायन्ताम्, तेषामेव सम्बोधन- योग्यत्वात् ; सम्बोधनसारो हि युष्मदर्थः, त्राणं चाभीष्टलाभं प्रति साहायका- चरणं, तच्च तत्प्रतिद्वन्द्विविघ्नापसारणादिना भवतीति, इयदत्र त्राणं विवक्षितम्, नित्योद्योगिनश्च भगवतोऽसम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहप्रतीतेर्वीररसो ध्व- न्यते, नखानां प्रहरणत्वेन प्रहरणेन च रक्षणे कर्तव्ये नखानामव्यतिरिक्तत्वेन मधु के शत्रु (विष्णु) के नख आप सभी व्याख्याता और श्रोताओं की रक्षा करें, क्योंकि वे ही (व्याख्याता और श्रोता) सम्बोधन के योग्य हैं। 'सम्बोधन' युष्मत् शब्द के अर्थ का सार (प्राण) है (सम्बोध्या पदार्थ की उपस्थिति में ही 'युष्मत्' यां आप-तुम का प्रयोग होता है)। 1. और, त्राण (रक्षण) अभीष्ट के लाभ के प्रति सहायता प्रदान करना है और वह (सहायताप्रदान) उस (अभीष्ट लाभ) के प्रति- द्वन्द्वी विघ्नों के अपसारण आदि द्वारा होता है, इस रूप में यहाँ त्राण विवक्षित है।^१ नित्य उद्योगशील भगवान् के असम्मोह और अध्यवसाय से युक्त होने के कारण उत्साह की प्रतीति होने से वीररस ध्वनित होता है।^२ नखों के प्रहरण (प्रहार के साधन) का रचयिता कौन है, ऐसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। यत्र-तत्र लोचनकार ने 'मूलकृत्', 'कारिकाकार' और 'वृत्तिकृत्' रूप में व्याख्यान किया है। लेकिन प्राचीन मान्यता यही रही है कि आनन्दवर्धन ही मूलकार और वृत्तिकार स्वयं हैं। लोचनकार के उल्लेख के अनुसार प्रस्तुत मङ्गलश्लोक को वृत्तिग्रन्थ के रूप में ही छापने की पद्धति चली आ रही है, मूल कारिका ग्रन्थ को मोटे अक्षरों में छापा जाता है। कारिकाकार और वृत्तिकार को अभिन्न मानने वालों का एक तर्क यह भी है कि यदि कारिकाग्रन्थ का कर्ता कोई दूसरा होता तो निश्चय ही वह अपनी ओर से मङ्गलाचरण प्रस्तुत करता। यद्यपि इसके विपरीत एक यह भी युक्ति दी जा सकती है कि 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' इस प्रयोग से कारिकाग्रन्थ का आरम्भ करके निश्चय ही वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गल किया गया है, क्योंकि 'काव्य' भी 'शब्दमूर्तिधर भगवान् विष्णु का अंश' माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह भी एक प्रकार का मङ्गलाचरण हो जाता है। अस्तु, मूल कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न अथवा अभिन्न होने का विचार प्रामाणिक और तर्कपूर्ण ढंग से 'भूमिका' में आकलनीय है। १. अभीष्ट व्याख्याश्रवण ही प्रस्तुत प्रयास का फल है, और यह तभी सम्भव है जब व्याख्याता और श्रोतृवर्ग दोनों त्राण (रक्षा) प्राप्त करें। फलतः त्राण उनके अभीष्ट लाभ का सहायक सिद्ध होता है। वह भी इस अर्थ में कि उसके द्वारा समग्र प्रतिद्वन्द्वी विघ्नों का अपसारण आदि कार्य होते हैं। इस प्रकार यहाँ भगवान् मधुरिपु के नख त्राण या रक्षा करें, अर्थात् अभीष्ट व्याख्याश्रवण के प्रतिद्वन्द्वी रूप में उपस्थित होने वाले सभी प्रकार के विघ्नों का अपसारण करें, यह वृत्तिकार का अभिप्रेत अर्थ लोचनकार के मत में प्रकट होता है। २. प्रस्तुत काव्य आत्मभूत ध्वनितत्त्व का मूलतः प्रतिपादन करता है, अतः यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकार अपने मङ्गलाचरण में ही 'ध्वनि' के प्रधान रूपों का निर्देश करें। इस उद्देश्य से लोचनकार ने यहाँ रस, वस्तु और अलङ्कार के ध्वनित होने का प्रकार बताया है। सर्वप्रथम ध्वनियों में प्रधान रसध्वनि की चर्चा में कहते हैं कि यहाँ वीररस ध्वनित होता है क्योंकि उत्साह की प्रतीति होती है, और उत्साह ही वीररस का स्थायी भाव है। उत्साह इसलिए कि भगवान् मधुरिपु अपने नखों द्वारा त्राण-कार्य में नित्य उद्योगशील हैं, एवं उनमें किसी प्रकार का
प्रथम उद्योतः ५ लोचनम् करणत्वात्सातिशयशक्तिता कर्तृत्वेन सूचिता, ध्वनितश्च परमेश्वरस्य व्यति- रिक्तकरणापेक्षाविरहः, मधुरिपोरित्यनेन तस्य सदैव जगत्त्रासापसारणोद्यम उक्तः, कीदृशस्य मधुरिपोः ? स्वेच्छया केसरिणः, न तु कर्मपारतन्त्र्येण, नाप्यन्यदीयेच्छया, अपि तु विशिष्टदानवहननोचिततथाविधेच्छापरिग्रहाैचि- त्यादेव स्वीकृतसिंहारूपस्येत्यर्थः; कीदृशा नखाः ? प्रपन्नानामार्तिं ये छिन्दन्ति; नखानां हि छेदकत्वमुचितम्; आर्तेः पुनश्छेद्यत्वं नखान्प्रत्यसम्भावनीयमपि तदीयानां नखानां स्वेच्छानिर्माणौचित्यात्सम्भाव्यत एवेति भावः। अथ वा त्रिजगत्कण्टको हिरण्यकशिपुर्विश्वस्योत्क्लेशकर इति स एव वस्तुतः प्रपन्नानां भगवदेकशरणानां जनानामार्तिकारित्वान्मूर्तमार्तिस्तं विनाशयद्भिरार्ति- होने से और प्रहार के साधन द्वारा रक्षण के कर्तव्य होने से, अव्यतिरिक्त (अपृथग्भूत) रूप से करण (आभ्यन्तर करण) होने के कारण कर्त्ता रूप देकर अतिशययुक्त शक्ति- मत्त्व को सूचित किया है। और, परमेश्वर को व्यतिरिक्त (अपने शरीर से पृथग्भूत) करण (साधन) की अपेक्षा नहीं होती है, यह ध्वनित किया। 'मधुरिपु' के द्वारा उस परमेश्वर का उद्योग संसार के त्रास के निवारणार्थ सदैव चलता रहता है, यह कहा है। किस प्रकार के मधुरिपु के ? अर्थात् जो अपनी इच्छा से केसरी (सिंह, नृसिंह) बन गये, न कि (पूर्व) कर्म की परतन्त्रता के कारण; और दूसरे किसी की इच्छा से भी नहीं, अपितु विशिष्ट दानव (हिरण्यकशिपु) के हनन के लिए उचित उस प्रकार की इच्छा के परिग्रह के औचित्य से ही जिन्होंने सिंह का रूप स्वीकार किया। किस प्रकार के नख ? जो प्रपन्नों (शरणागतों) की आर्ति (कष्ट) का छेदन करते-निवारण करते- हैं, क्योंकि नखों का छेदकत्व उचित है; फिर (नखों के द्वारा) छेद्य होना नखों के प्रति असम्भावनीय होकर भी उन (परमेश्वर) के नखों के अपनी इच्छा से निर्मित होने के औचित्य से सम्भावित होगा ही, यह भाव है। अथवा, तीनों जगत् का कंटक हिरण्यकशिपु संसार को क्लेश पहुंचाने वाला था, इस प्रकार वही वस्तुतः प्रपन्न, भगवान् की एकमात्र शरण में आये हुये जनों का
सम्मोह नहीं तथा उन्होंने यही अध्यवसाय या निश्चय भी कर लिया है। 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में मेरे पूज्य गुरुजी ने 'लोचन' के 'उत्साहप्रतीति' प्रयोग को लेकर बताया है कि यहाँ वीररस के स्थायी भाव उत्साह के साथ अन्य विभावादि की नान्तरीयक रूप से पानकरसन्यायेन प्रतीति होती है। क्योंकि यह नियम है कि रस के उद्बोधक किसी एक के विद्यमान रहने पर झटिति अन्य तत्त्वों का आक्षेप कर लिया जाता है- (सद्भावश्च विभावादेर्द्वयोरेकस्य वा भवेत्। झटित्यन्यसमाक्षेपे तदा दोषो न विद्यते॥) इस प्रकार यहाँ उत्साह का आलम्बन मधु दैत्य है, उसके निर्भीकत्वादि का ज्ञान रूप उद्दीपन तथा उसके प्रति अवहेला आदि अनुभाव एवं गर्व आदि सञ्चारियों की प्रतीति उत्साहप्रतीति के साथ हो जाती है। इस प्रकार यहाँ वीररस पूर्णतया ध्वनित होता है। लोचनकार ने 'उत्साह की प्रतीति' को सभी अन्य तत्त्वों की प्रतीति के उपलक्षण रूप में उल्लेख किया है।
६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् रेवोच्छिन्ना भगवतीति परमेश्वरस्य तस्यामप्यवस्थायां परमकारुणिकत्वमुक्तं, किं च ते नखाः स्वच्छेन स्वच्छतागुणेन नैर्मल्येन; स्वच्छमृदुप्रभृतयो हि मुख्य- तया भाववृत्तय एव; स्वच्छायया च वक्रहृद्यरूपयाऽऽकृत्याऽऽयासितः-खेदित इन्दुर्यैः, अत्रार्थशक्तिमूलेन ध्वनिना बालचन्द्रत्वं ध्वन्यते, आयासनेन तत्स- न्निधौ चन्द्रस्य विच्छायत्वप्रतीतिरहृद्यत्वप्रतीतिश्च ध्वन्यते, आयासकारित्वं च आर्तिकारी (दुःखदायी) होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप ही था, उसका विनाश करते हुये (नखों द्वारा) आर्ति ही उच्छिन्न की जाती है, इस प्रकार परमेश्वर का उस अवस्था में भी परमकारुणिकत्व कहा है ।१ और भी, वे नख स्वच्छ अर्थात् स्वच्छता गुण रूप निर्मलता के द्वारा, क्योंकि 'स्वच्छ' 'मृदु' प्रभृति शब्द मुख्य रूप से भाववृत्ति (स्वच्छता आदि धर्म के वाचक ही हैं; और अपनी छाया से, वक्र एवं हृद्य रूप आकृति से आयासित, खेदित (खेद को प्राप्त) इन्दु (चन्द्र) है जिनके द्वारा । यहाँ 'अर्थशक्तिमूलध्वनि' से इन्दु (चन्द्र) का बालत्व ध्वनित होता है । 'आयास पहुँचाने' से नखों के समीप चन्द्र के विच्छायत्व (कान्तिराहित्य) की प्रतीति १. 'नखों के प्रहरण' से आरम्भ करके इस अङ्कित स्थल तक 'वस्तुध्वनि' का निरूपण किया है । श्लोक में ऐसा नहीं कहकर कि मधुरिपु आप लोगों की रक्षा करें, कहा गया है कि मधुरिपु के नख आप लोगों की रक्षा करें, यद्यपि कि मधुरिपु के नख मधुरिपु से भिन्न नहीं, तथापि वे नख मधुरिपु से अपृथक् होने के कारण त्राण के कार्य में असाधारण कारण रूप से प्रस्तुत किये गये हैं, क्योंकि नख एक प्रकार के प्रहरण अर्थात् प्रहार के साधन, किंवा आयुध हैं, आयुध द्वारा अपनी या अन्य की रक्षा ही मुख्य रूप से कर्तव्य होती है। दूसरे यह कि नखों को त्राण का कर्ता बनाकर उनकी सातिशयशक्तित्ता अर्थात् अतिशय शक्तिमान् होना, सूचित किया है। तात्पर्य यह कि भगवान् मधुरिपु के नख स्वयं ही अपने आप में इस प्रकार पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं कि त्राण कर सकें। इससे एक और 'वस्तु' यह भी ध्वनित होती है कि परमेश्वर को जगत के त्राण जैसे कार्य के लिए अपने से अतिरिक्त साधन (व्यतिरिक्त करण) की अपेक्षा नहीं, बल्कि उनका यह कार्य अपने ही शरीर के एक तुच्छ और साधारण तत्त्व नख से ही सम्पन्न हो जाता है । अब इसी प्रसंग में क्रम से श्लोक के विशेषणों से ध्वनित 'वस्तु' का प्रतिपादन करते हैं। स्वयं विशेष्यभूत विशेषण 'मधुरिपु' की व्यञ्जना है कि भगवान् जगत् को त्रस्त करने वाले मधु दैत्य आदि के शत्रु होकर जगत्त्रासापसारणार्थ निरन्तर उद्योगशील हैं, अर्थात् उनका यह स्वभाव ही है कि संसार के भय का निवारण करते रहें । 'अपनी इच्छाशक्ति से केसरी (सिंह) का रूप धारण किए हुए' इस विशेषण की व्यञ्जना के अनुसार उन पर न तो किसी प्रकार कर्म की परतन्त्रता है और न दूसरे किसी की इच्छा का दबाव है, बल्कि हिरण्यकशिपु जैसे विशिष्ट दानव, जिसने किसी समय, किसी स्थान पर तथा किसी व्यक्ति से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया था, के हनन की उचित इच्छा के परिग्रह के औचित्य से ही जिन भगवान् मधुरिपु ने नरसिंह का स्वरूप धारण किया। नखों के विशेषण रूप में कहते हैं 'प्रपन्न जनों की आर्ति का छेदन करने वाले'; नख का उचित कार्य छेदन ही होता है । यद्यपि 'आर्ति' या पीड़ा का छेद्य होना सम्भव नहीं, तथापि परमेश्वर के स्वेच्छानिर्मित नखों द्वारा उसका छेद्य होना भी यहाँ असम्भाव्य नहीं समझना चाहिए । अथवा भगवान् के प्रपन्न प्रह्लाद आदि जनों के आर्तिप्रद होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप उस हिरण्यकशिपु का नखों द्वारा छेदन ही यहाँ अभीष्ट है । इस प्रकार ऐसी
प्रथम उद्योतः ७ लोचनम् नखानां सुप्रसिद्धम् ; नरहरिनखानां तच्च लोकोत्तरेण रूपेण प्रतिपादितम् , किं च तदीयां स्वच्छतां कुटिलिमानं चावलोक्य बालचन्द्रः स्वात्मनि खेदमनु- भवति; तुल्येऽपि स्वच्छकुटिलाकारयोगेऽमी प्रपन्नार्त्तिनिवारणकुशलाः; न त्वहमिति व्यतिरेकालङ्कारोऽपि ध्वनितः, किञ्चाहं पूर्वमेक एवासाधारणवैशद्य- हृद्याकारयोगात्समस्तजनाभिलषणीयताभाजनमभवम्, अद्य पुनरेवंविधा नखा दश बालचन्द्राकाराः सन्तापार्त्तिच्छेदकुशलाश्चेति तानेव लोको बालेन्दुबहु- मानेन पश्यति, न तु मामित्याकलयन्बालेन्दुरविरतमायासमनुभवतीत्युत्प्रेक्षा- पह्नुतिध्वनिरपि, एवं वस्त्वलङ्काररसभेदेन त्रिधा ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरु- भिर्व्याख्यातः । और अहृद्यत्व की प्रतीति होती है। और नखों का आयासकारित्व सुप्रसिद्ध है, और नृसिंह के नखों का वह (आयासकारित्व) लोकोत्तर रूप से प्रतिपादित है। और भी,१ उन नखों की स्वच्छता और कुटिलिमा (टेढ़ापन) को देखकर बालचन्द्र अपने आप में खेद अनुभव करता है, स्वच्छ एवं कुटिल आकार के सम्बन्ध के समान होने पर भी (अर्थात् जैसी स्वच्छता और कुटिलिमा नखों में है वैसी ही मुझ बालचन्द्र में है) ये (नख) प्रपन्न जनों की आर्त्ति के निवारण में कुशल हैं, मैं नहीं, यह 'व्यतिरेक अलङ्कार' भी ध्वनित होता है। और भी, मैं पहले एक अकेले ही असाधारण वैशद्य (स्वच्छता) एवं हृद्य आकार के योग से समस्त जनों की अभिलषणीयता का पात्र था, आज फिर इस प्रकार के नख दस बालचन्द्रों के आकार वाले और सन्ताप तथा आर्त्ति के छेदन में कुशल हैं, उन्हें ही संसार बालचन्द्र के बहुमान से देखता है न कि मुझे, इस प्रकार आकलन करता हुआ बालचन्द्र विरन्तर आयास को जैसे अनुभव करता है, यह 'उत्प्रेक्षा' और 'अपह्नुति' का ध्वनि भी है। इस प्रकार हमारे गुरुजी (भट्ट इन्दुराज) ने वस्तु, अलङ्कार और रस के भेद से तीन प्रकार के 'ध्वनि' का इस श्लोक में व्याख्यान किया है। स्थिति में भी परमेश्वर की परमकारुणिकता अभिहित हो जाती है, जो प्रस्तुत विशेषण का मुख्य तात्पर्य है। फिर नख का एक दूसरा विशेषण 'स्वच्छता और अपनी छाया (आकृति) से इन्दु (चक्र) को आयासित करने वाले'; यहाँ लोचनकार ने 'स्वच्छ' को 'स्वच्छाया' का विशेषण न मान कर स्वतन्त्र अर्थ 'स्वच्छता' या नैर्मल्य किया है, 'छाया' अर्थात् वक्र एवं हृद्य आकृति। इस प्रकार लोचनकार के अनुसार यहाँ अर्थशक्तिमूल ध्वनिव्यापार से नखों का बालचन्द्रत्व ध्वनित होता है, दूसरे, नखों द्वारा इन्दु के आयासन से यह प्रतीति ध्वनित हुई कि उन नखों के समीप चन्द्र शोभाहीन है एवं अहृद्य है; क्योंकि आयासकारी होना नखों के पक्ष में सर्वविदित है। अर्थात् भगवान् नृसिंह के नख अपनी निर्मलता और आकृति से बालचन्द्र को आयासित करते हैं, मतलब यह कि उनके नजदीक बालचन्द्र विच्छाय (फीका) और अहृद्य (दिलकश न लगने वाला) प्रतीत होता है। नृसिंह के नखों के आयासकारित्व की लोकोत्तरता यह है कि अन्य लौकिक नख में उस प्रकार बालचन्द्र को आयासित करने वाली स्वच्छता एवं वक्र-हृद्य आकृति नहीं होती। १. 'अलङ्कारध्वनि' का निर्देश करते हुए आचार्य कहते हैं कि एक तो बालचन्द्र को इस बात का
८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्व- स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये । केचिद्वाचां स्थितमविषये तत्त्वमूचुस्तदीयं तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ॥ १ ॥ बुधजनों ने काव्य के आत्मा को 'ध्वनि' यह पहले से समाम्नात किया है, दूसरे लोगों ने उसका अभाव कहा, अन्य लोगों ने उसे 'भाक्त' कहा, कुछ लोगों ने उसके तत्त्व को वाणी का अगोचर कहा, अतः सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिये उस (ध्वनि) का स्वरूप कहते हैं ॥ १ ॥ लोचनम् अथ प्राधान्येनाभिधेयस्वरूपमभिदधदप्रधानतया प्रयोजनप्रयोजनं तत्स- म्बद्धं प्रयोजनं च सामर्थ्यात्प्रकटयन्नादिवाक्यमाह—काव्यस्यात्मेति । अब प्रधान रूप से (इसे ग्रन्थ के) अभिधेय के स्वरूप की चर्चा करते हुये, अप्रधान रूप से प्रयोजन के प्रयोजन को और उससे संम्बद्ध प्रयोजन को सामर्थ्य से प्रकट करते हुये; प्रथम वाक्य कहते हैं—बुध जनों ने काव्य के आत्मा— खेद थी कि नखों जैसी स्वच्छता तथा कुटिलता उसमें नहीं हैं, और इस अंश में यदि किसी प्रकार दोनों की समानता हो भी जाय तब भी बालचन्द्र को अपनी यह कमी खलेगी ही कि नखों की भाँति प्रपन्न जनों की आर्ति के निर्वाण में वह कुशल नहीं हो सका; इस प्रकार उपमानभूत बालचन्द्र से उपमेयभूत नखों के आधिक्य की प्रतीति होने से 'व्यतिरेक' नामक अलङ्कार भी ध्वनित हुआ । 'उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः' (काव्यप्रकाश) । फिर यहीं दूसरे प्रकार से आचार्य ने उत्प्रेक्षा और अपह्नुति अलङ्कारों के ध्वनि का निर्देश किया है। उत्प्रेक्षा यह है कि मानों बालचन्द्र निरन्तर आयास अनुभव करता है और 'अपह्नुति' का स्थल यह हुआ कि उन्हीं नखों को सारा संसार बालचन्द्र के बहुमान या गौरव से देखता है, जब कि मैं (बालचन्द्र) साक्षात् विद्यमान हूँ। यहाँ उत्प्रेक्षा अपह्नुति के बल पर होती है, क्योंकि जब संसार बालचन्द्र को बालचन्द्र न समझकर नखों को बालचन्द्र का गौरव देता है, तभी बालचन्द्र का आयासित होना भी सम्भावित है । इस प्रकार यहाँ दोनों का अङ्गाङ्गिभाव रूप 'संकर' ध्वनित है। १. प्रस्तुत ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' का प्राधान्यतः अभिधेय या प्रतिपाद्य 'ध्वनि' तत्त्व है, ध्वनि के स्वरूप का ज्ञान प्रयोजन है तथा इस प्रयोजन का प्रयोजन सहृदयजनों के मन की प्रतीति या प्रसन्नता है। इस प्रकार दूसरे प्रयोजन 'प्रीति' से सम्बद्ध प्रयोजन 'ध्वनिस्वरूप का ज्ञान' की चर्चा ग्रन्थकार 'मन्दाक्रान्ता' छन्द में निबद्ध प्रथम वाक्य में करते हैं, यह लोचनकार का निर्देश है। यहाँ आकलनीय बात यह है कि प्राचीन ग्रन्थकार ग्रन्थारम्भ करते हुए यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझते थे कि प्रस्तुत ग्रन्थ का विषय क्या है, अधिकारी कौन हैं, सम्बन्ध क्या है तथा प्रयोजन क्या है, इन्हीं विषय-अधिकारी-सम्बन्ध-प्रयोजन को शास्त्रीय भाषा में 'अनुबन्धचतुष्टयं' कहते थे। उन ग्रन्थकारों का ऐसा करने में यह तात्पर्य था कि पहले ही उनका ग्रन्थ उन लोगों से