भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 680 में से

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पृष्ठ 63

प्रथम उद्योतः ३ ध्वन्यालोकः श्रीनृहरये नमः स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः । त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिच्छिदो नखाः ॥ अपनी इच्छा से केसरी (सिंह) का रूप धारण किये हुये भगवान् मधुरिपु (मधु नामक दैत्य के शत्रु विष्णु) के, स्वच्छ अपनी छाया (कान्ति) से इन्दु को आयासित (खिन्न) करने वाले तथा प्रपन्न (शरणागत) जनों की आर्ति का छेदन करने वाले नख आप लोगों की रक्षा करें। लोचनम् स्वयमव्युच्छिन्नपरमेश्वरनमस्कारसम्पत्तिचरितार्थोऽपि व्याख्यातृश्रोतॄणा- मविघ्नेनाभीष्टव्याख्याश्रवणलक्षणफलसम्पत्तये समुचिताशीःप्रकटनद्वारेण परमे- श्वरसांमुख्यं करोति वृत्तिकारः—स्वेच्छेति । वृत्तिकार¹ स्वयं विच्छेद-रहित (निरन्तर) परमेश्वर के नमस्कार की सम्पत्ति (परम्परा, आधिक्य) से कृतार्थ होने पर भी व्याख्याता और श्रोताओं की बिना किसी विघ्न के अभीष्ट व्याख्या के श्रवण रूप फल-सम्पत्ति के लिये समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का आभिमुख्य करते हैं—अपनी इच्छा—। कृष्ण ने अपने 'ऐश्वर रूप' को दिखाने के लिए अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' देते हुए कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ (११।८) इसी प्रकार आचार्य अभिनव ने यहाँ 'लोचन' का एक विशेष 'दृष्टि' के अर्थ में प्रयोग किया है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् किसी को काव्य का रहस्य अदृष्ट नहीं रह जाता ! १. वृत्तिकार अर्थात् मूल कारिकाग्रन्थ के वृत्तिग्रन्थ का रचयिता। प्रस्तुत 'लोचन' का आशय यह है कि वृत्तिकार को मङ्गल-श्लोक द्वारा परमेश्वर का नमस्कार करना प्रस्तुत में अभीष्ट न था, क्योंकि वह तो निरन्तर परमेश्वर को नमस्कार करते रहते हुए स्वयं कृतार्थ हो चुके थे, फिर भी प्रस्तुत ग्रन्थ के व्याख्याताओं और श्रोताओं को अभीष्ट व्याख्याश्रवण की फलसम्पत्ति निर्विघ्न रूप में प्राप्त होती रहे, यह उन्हें परम अभिप्रेत था। इसलिए यहाँ वृत्तिकार समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का साम्मुख्य या आभिमुख्य करते हैं, अर्थात् परमेश्वर से व्याख्याता और श्रोताओं के कल्याण की कामना करते हैं। यह प्राचीन भारतीय परम्परा से चला आ रहा है कि ग्रन्थकार अपनी ओर से किसी भी इष्ट देवता को अपने और अपने श्रोतृवर्ग के कल्याण के लिए मङ्गलाचरण के रूप में नमन करता है। अपने लिए प्रायः ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति उसे अभिप्रेत होती है। यह मङ्गलाचरण तीन प्रकार के होते हैं, आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक और वस्तुनिर्देशात्मक। प्रस्तुत मङ्गलाचरण 'आप लोगों की रक्षा करें' इस रूप में होने के कारण आशीर्वादात्मक शैली का है। इसे ग्रन्थकार अपने मन में भी कर ले सकता था; परन्तु प्राचीनकाल में शिष्यों के शिक्षार्थ मङ्गलाचरण को लिपिबद्ध करना अनिवार्य समझा जाता था। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि लोचनकार मङ्गल-श्लोक को प्रस्तुत करते हुए 'वृत्तिकार' का उल्लेख करते हैं, इससे यह प्रतीत होना स्वाभाविक है कि मङ्गल-श्लोक मूलग्रन्थ का नहीं अपितु वृत्तिग्रन्थ का है। ऐसी स्थिति में आचार्य आनन्दवर्धन यदि मूलग्रन्थकार हैं तो वृत्तिग्रन्थ का रचयिता कौन है अथवा आनन्दवर्धन वृत्तिग्रन्थ के यदि रचयिता हैं तो मूलग्रन्थ

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