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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 680 में से

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२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भट्ठेन्दुराजचरणाम्बजकृताधिवास- हृद्यश्रुतोऽभिनवगुप्तपदाभिधोऽहम् । यत्किंचिदप्यनुरणन्स्फुटयामि काव्या- लोकं स्वलोचननियोजनया जनस्य ॥ भट्ट इन्दुराज के चरण-कमलों में रहकर शास्त्रों को हृदयस्थ करके मैं अभिनवगुप्त- पाद अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा जो कुछ भी कथन करके लोगों के समक्ष 'काव्या- लोक' (ध्वन्यालोक) को स्पष्ट करने जा रहा हूँ।१

सृष्टि उपादान कारणों के द्वारा होती है, इस दृश्यमान सृष्टि के कर्ता में यह सामर्थ्य नहीं कि बिना किसी कारण-सामग्री के सृष्टि कर दे, वह पदे-पदे नियति के नियमों से नियन्त्रित रहता है और दूसरे यह कि उसकी सृष्टि 'अपूर्व' नहीं होती, वही देखी-सुनी वस्तुएँ पैदा करता रहता है। उदाहरणार्थ, दृश्यमान कमल जल के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता किन्तु काव्य में मुखकमल का, जल के बिना ही अपूर्व रूप में उत्पन्न होना प्रसिद्ध है। काव्य की दूसरी विशेषता यह है कि दृश्यमान जगत्, जो पत्थर की भाँति नीरस और कठोर लगता है, को अपनी रस-सम्पत्ति से सारवान् बना देता है तथा अपनी तीसरी विशेषता से, जो प्रतिभा (प्रख्या) और वचन (उपाख्या) के क्रम में विद्यमान है, अपने सभी अपूर्व और सरस निर्माण को हृद्य बनाती है। यह अपूर्वता, सरसता और हृद्यता कविसहृदयाख्य सरस्वतीत्तत्त्व रूप 'काव्य' में एकान्ततः प्राप्त होती हैं, जब कि दृश्यमान जगत् में इन्हें एकान्ततः प्राप्त करना कदाचित् किसी के लिए भी संभव नहीं। इस प्रकार यहाँ दृश्यमान जगत् से काव्य-जगत् का उत्कर्ष रूप व्यतिरेक व्यङ्ग्य होता है। अभिनवगुप्त के इस मङ्गल-श्लोक का साक्षात् प्रभाव आचार्य मम्मट के 'काव्यप्रकाश' के मङ्गल-श्लोक 'नियतिकृतनियम०' पर पड़ा प्रतीत होता है। क्योंकि उसमें भी कविर्निर्मिति को ब्रह्मनिर्मिति से उत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए उसे अनियन्त्रित, हृद्य, अनन्यपरतन्त्र तथा नवरसरुचिरा कहा है। प्रस्तुत में यह कहना अनुचित न होगा कि आचार्य अभिनवगुप्त के समग्र साहित्य-दर्शन पर उनके स्वनिर्मित प्रत्यभिज्ञादर्शन का पुष्कल प्रभाव पड़ा है। वे 'शिव' में सुन्दर और सत्य के एकनिष्ठ साक्षात्कर्ता थे। सम्भवतः यहाँ 'सरस्वती' के रूप में 'स्वतन्त्र चिति शक्ति' अभिमत हो और 'कविसहृदयाख्य' काव्य स्वयं 'शिव' हो १. आचार्य ने अपने विद्याश्रम को परम्परागत बताते हुए, क्योंकि ऐसा किसी को भ्रम न हो कि इनकी कल्पनाओं, विचारों में परम्परा नहीं है, अपने पूज्यपाद गुरु 'भट्ट इन्दुराज' का उल्लेख किया है। साथ ही अपने मन्तव्यों के पीछे वह अभिनिविष्ट नहीं हैं, बल्कि वह 'यत्किञ्चित्' अर्थात् जो कुछ भी कहते हुए प्रस्तुत ग्रन्थ को 'स्फुट' करने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' अपने प्राचीन सङ्केत के अनुसार 'काव्यालोक' के नाम से ही अभिहित रूप में प्राप्त होता है, इसकी 'ध्वन्यालोक' संज्ञा अर्वाचीन प्रतीत होती है। अपनी 'लोचन' टीका के अन्त में भी आचार्य ने इस ग्रन्थ का 'काव्यालोक' के ही नाम से उल्लेख किया है। 'स्वलोचननियोजनया' अर्थात् अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा; यहाँ 'लोचन' पद प्रस्तुत टीका, विचार तथा मन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तात्पर्य यह कि मैं 'लोचन' टीका के रूप में अपना 'विचार' या मन को प्रणिहित करके लोगों के समक्ष 'काव्यालोक' को स्फुट या स्पष्ट कर रहा हूँ। दूसरे यह कि 'लोचन' अर्थात् आँख, प्रस्तुत 'लोचन' के रूप में लोगों को 'आँख' दे रहा हूँ, ताकि 'आलोक' में 'काव्य' को वे स्पष्ट रूप से देख सकें। किसी भी विशेष वस्तु को देखने के लिए विशेष 'दृष्टि' की आवश्यकता होती है, बाह्य दृष्टि का उपयोग केवल सामान्य है। इसीलिए 'गीता' में भगवान्