भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

॥ श्रीः ॥ ध्वन्यालोकः 'लोचन' 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतः प्रथम उद्योतः लोचनम् श्रीभारत्यै नमः अपूर्वं यद्वस्तु प्रथयति विना कारणकलां जगद्ग्रावप्रख्यं निजरसभरात्सारयति च । क्रमात्प्रख्योपाख्याप्रसरसुभगं भासयति तत् सरस्वत्यास्तत्त्वं कविसहृदयाख्यं विजयते ॥ जो कारण-सामग्री के लेश के बिना, अपूर्व (सर्वथा नवीन) वस्तु को उत्पन्न करता—फैला देता है और पत्थर के समान (नीरस) जगत् को अपने रसभार से सारवान् बना देता है तथा क्रम से प्रख्या (कवि की प्रतिभा) और उपाख्या (वचन) के प्रसर से सुभग (हृद्य) होता हुआ (वस्तुजात को) भासित करता है, वह कवि और सहृदय द्वारा आख्यात सरस्वती का तत्त्व (काव्य) विजयी है (सबसे बढ़कर है) । १. श्रीमन् आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने अपने 'लोचन' व्याख्यान के आरम्भ में नमस्कारात्मक मङ्गल 'सरस्वती के कविसहृदयाख्य तत्त्व' की विजय (उत्कर्ष) के रूप में प्रस्तुत किया है। 'सरस्वती का कविसहृदयाख्य तत्त्व' यहाँ काव्य ही प्रतीत होता है, क्योंकि कवि 'काव्य' का रचयिता होता है और सहृदय उसका विचारक या अनुशीलनकर्ता, इस प्रकार दोनों के अस्तित्व का एकमात्र आधार 'काव्य' है, अतः काव्य क्या है ? 'कविसहृदय' रूप है, 'लोचन' की टिप्पणी 'बालप्रिया' में एक दूसरे ढंग से यह भी कहा है कि कवि और सहृदय, दोनों जिसे आख्यान करते अर्थात् कहते हैं (कविसहृदयैराख्यायते उच्यते इति), अथवा कवि और सहृदय में जिसका 'निरन्तर ख्यान' अर्थात् स्फुरण होता है (कविसहृदययोराख्या, आभीक्ष्ण्येन ख्यानं स्फुरणं यस्य)। वाग्देवता सरस्वती ने अपने आपको 'काव्य' के स्वरूप में प्रकट किया है, जैसा कि राजशेखर की 'काव्यमीमांसा' में सरस्वती के पुत्र 'काव्यपुरुष' के कथानक का भी उल्लेख है। यह परम्परा से भारतीय साहित्य की परिनिष्ठित मान्यता है। इस प्रकार 'काव्य' सरस्वती का तत्त्व या पारमार्थिक रूप है। वह इस कारण उत्कर्ष या विजय को प्राप्त है कि उसकी सृष्टि दृश्यमान सृष्टि से सर्वथा अपूर्व है, इसी बात को आचार्य ने मंगल-श्लोक के पूर्व तीन चरणों से सिद्ध किया है। पहली बात यह कही है कि काव्य (कवि-सहृदय) वस्तुजात को, बिना किसी कारण के सम्बन्ध के, अपूर्व अर्थात् सर्वथा नवीन रूप में सामने ला देता है, परन्तु इससे न्यूनतम दृश्यमान जगत् की