भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ५६ ) चतुर्थ उद्योत पृष्ठ १. ध्वनि के व्युत्पादन में प्रयोजनान्तर कवियों की प्रतिभा का आनन्त्य ५५७ २. ध्वनि के अन्यतम प्रकार से भी वाणी का नवत्व ५५८ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के आश्रयण से वाणी के नवत्व का उदाहरण ५५९ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के समाश्रयण से वाणी के नवत्व का उदाहरण ५६१ विवक्षितान्यपरवाच्य के उक्त प्रकारों के आश्रयण से वाणी के नवत्व के उदाहरण ५६२ ३. इस युक्ति के आश्रयण से रसादि ध्वनि-मार्ग के बहुप्रकारत्व का उपपादन ५६४ ४. रस के परिग्रह से दृष्टपूर्व अर्थों का नवत्व, मधुमास में वृक्षों की भांति ५६७ विवक्षितान्यपरवाच्य के शब्दशक्तिमूल-अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य के समाश्रयण से नवत्व के उदाहरण ५६७ अर्थशक्तिमूलअनुरणनरूप व्यङ्ग्य के कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर होने से नवत्व ५६९ ५. विविध व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के होने पर भी कवि को रसमय काव्य के निर्माण में सावधान होना चाहिए ५६९ अङ्गी रस की स्थिति में छायातिशय के प्रसंग में रामायण और महाभारत क्रमशः करुण और शान्तरस के मुख्यत्व का उपपादन ५७० लोचन में गुणीभूतव्यङ्ग्य के विविध व्यङ्ग्य के प्रकारों के आश्रयण से नवत्व के उदाहरण ५८० ६. प्रतिभागुण के कारण काव्यार्थ के विराम के अभाव का प्रतिपादन ५८० ७. देश, काल आदि अवस्थाभेद से शुद्ध वाच्य के भी आनन्त्य का प्रतिपादन ५८३ ८. अवस्थादि से विभिन्न वाच्यों का निबन्धन लक्ष्य में अधिक, रसाश्रय से शोभित ५९३ ९. औचित्यानुसारिणी देशकालादिभेदिनी रसादिसम्बद्ध वस्तुगति ५९३ १०. काव्यस्थिति का अक्षयत्व ५९३ ११. संवादों की बहुलता ५९४ १२. कविवाणी के मिथःसंवाद में भी उनका भिन्नविषयत्व ५९४ १३. संवाद के विभाग ५९५ १४. सदृश वस्तु के प्रतिपादन में भी काव्य का नवत्व ५९६ १५-१६. पूर्वोक्त वस्तु के प्रतिपादन में कवि को दोष नहीं ५९७-८ १७. कवि को भगवती सरस्वती का योग ५९९ १८. उपसंहार ६०० परिशिष्ट १. ध्वनिकारिकार्धसूची ६०५ २. वृत्तिग्रन्थ-पद्यसूची ६०९ ३. लोचन में उद्धृत उदाहरणपद्यों एवं वाक्यों की सूची ६१२, ४. ध्वन्यालोक में उद्धृत ग्रन्थ और ग्रन्थकार ६१६, ५. लोचन व्याख्यान में उद्धृत ग्रन्थ और ग्रन्थकार ६१६, —००;०;००—