भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ५५ ) पृष्ठ ३१. रसादि के विरोध-अविरोध के ज्ञान का लाभ ४४० ३२. वाच्य और वाचक का औचित्य के साथ योजना महाकवि के लिए आवश्यक ४४१ ३३. रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित वृत्तियों का शोभावहत्व ४४३ रसादि का इतिवृत्तादि के साथ गुणगुणिब्यवहार की शङ्का और उसका समाधान ४४३ वाच्य और व्यङ्ग्य की एक काल में प्रतीति की शङ्का और समाधान ४४६ वाक्य का व्यञ्जकत्व स्वीकार न करने वाले मीमांसक के मत का आक्षेप तथा समाधान ४५४ व्यञ्जकत्व और गौणत्व में स्वरूपतः और विषयतः भेदोपादान ४६४ व्यङ्ग्य और व्यञ्जक का स्वरूप-विवेक ४८० ३४. काव्य का दूसरा प्रकार गुणीभूत व्यङ्ग्य ४९२ त्रिविध गुणीभूतव्यङ्ग्य का निर्देश ४९३ ३५. काव्यबन्धों में गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार की योजनीयता ४९६ ३६. गुणीभूत व्यङ्ग्य के कारण अलङ्कारों की रस्यता का निर्देश ४९७ भामह का अतिशयोक्ति-लक्षण ४९९ ३७. प्रतीयमानकृत छाया और स्त्रियों की लज्जा ५०६ ३८. काकु से अर्थान्तर-प्रतीति के स्थल में गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व ५०८ ३९. गुणीभूतव्यङ्ग्य के विषय में ध्वनि की योजना नहीं करनी चाहिए ५११ ४०. रसादितात्पर्य की पर्यालोचना से गुणीभूतव्यङ्ग्य का भी ध्वनिरूपत्व ५१४ वाच्य-व्यङ्ग्य के प्राधान्याप्राधान्य के विवेक के लिए प्रयत्न का निर्देश ५१७ 'लावण्यद्रविणव्ययो०' में व्यामोह का निर्देश ५१८ अप्रस्तुतप्रशंसा के तीन प्रकार ५२१ ४१. ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के अतिरिक्त चित्र ५२५ ४२. चित्र काव्य के दो भेद ५२५ 'चित्र' शब्द का अर्थ-निरूपण ५२६ पूर्वोक्त विषयों का संग्रह ५२८ कवि का स्वातन्त्र्य ५३० संग्रह द्वारा कथन ५३२ ४३. सङ्कर और संसृष्टि से ध्वनि का अनन्तप्रकारत्व ५३३ ध्वनिप्रभेदसंकीर्णत्व का निरूपण ५३४ गुणीभूतव्यङ्ग्यसंकीर्णत्व का निरूपण ५३६ वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्व का निरूपण ५४० वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्व ५४४ संसृष्टालङ्कारान्तरसंकीर्ण ध्वनि ५४७ संसृष्टालङ्कारसंसृष्ट ध्वनि ५४९ ४४. ध्वनि के प्रभेद और प्रभेद-भेदों की अनन्तता ५५० ४५. सत्काव्य को करने के लिए या जानने के लिए ध्वनि प्रयत्नपूर्वक विवेचनीय ५५१ ४६. रीतियों के प्रवर्तन का कारण ५५१ ४७. शब्दतत्त्वाश्रय और अर्थतत्त्वाश्रय वृत्तियों का प्रकाशन ५५२