ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) पृष्ठ वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि शुद्ध और अलङ्कारसंकीर्ण ३३३ ४. सङ्घटना के स्वरूप का उपपादन ३३७ ५. माधुर्यादि गुणों के आश्रय से सङ्घटना के रसाभिव्यञ्जकत्व का उपपादन ३३७ गुण और संघटना का भेद-विचार ३३७ ६. सङ्घटना के नियम में हेतु वक्तृ-वाच्यगत औचित्य ३३८ सङ्घटना सामान्य में प्रसाद की आवश्यकता का उपपादन ३५१ ७. सङ्घटना का नियामकान्तर विषयाश्रय औचित्य और उसके भेद ३५२ ८. गद्यबन्ध में भी सङ्घटना का नियामक हेतु वक्तृवाच्यगत औचित्य ३५७ ९. गद्यबन्ध में भी रसबन्धोक्त औचित्य के संश्रित संघटना ३५८ १०-१४. प्रबन्ध का रसादि के व्यञ्जकत्व में निबन्धन ३५९ अनौचित्य और औचित्य ३६२ कथाशरीर का रसमयत्व ३६६ १५. प्रबन्धों में अनुरणनरूप दूसरा प्रभेद भी भासित होता है ३७६ १६. सुप्तिङ््वचनकारकसमासादि से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन ३७९ 'न्यक्कारो ह्ययमेव०' में सुवादि का व्यञ्जकत्व ३८० सुबन्त का व्यञ्जकत्व ३८३ तिङन्त का व्यञ्जकत्व ३८४ सम्बन्ध का व्यञ्जकत्व ३८५ निपातों का व्यञ्जकत्व ३८५ उपसर्गों का व्यञ्जकत्व ३८६ पादपौनरुक्त्य का शोभावहत्व ३८८ काल का व्यञ्जकत्व ३८९ प्रत्यय तथा प्रकृत्यंश का व्यञ्जकत्व ३९० १७. रसमयता के लिए विरोधियों के परिहार की आवश्यकता ३९५ १८-१९. रस के विरोधी तत्त्व ३९६ पूर्व विषयों का संग्रह द्वारा कथन (परिकर-श्लोक) ४०१ २०. बाध्य अथवा अङ्गभाव को प्राप्त विरोधियों के कथन की निर्दोषता ४०२ २१. एक रस का अङ्गीकार ४१५ २२. रसान्तरों के समावेश से प्रस्तुत रस की अङ्गिता उपहत नहीं ४१६ २३. पूर्वोक्त विषय के उपपादनार्थ कथन ४१७ २४. अन्य रस के अङ्गी होने पर अविरोधी-विरोधी रस का परिपोष नहीं चाहिए ४२० २५. विरोधी के विभिन्नाश्रय होने पर परिपोष होने पर भी दोष नहीं ४२७ २६. विरोधी का रसान्तर के व्यवधान से प्रबन्ध में निवेशन ४२९ २७. बीच में दूसरे रस के होने पर दो रसों के विरोध का समाहार ४३५ २८. सभी रसों में, विशेषतः शृङ्गार में, विरोध-अविरोध निरूपणीय ४३६ २९. शृङ्गार रस में अतिशय अवधान की अपेक्षा ४३७ ३०. शृङ्गार-विरुद्ध रस में उसके अङ्गों का स्पर्श दूषित नहीं ४३७