ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भट्ठेन्दुराजचरणाम्बजकृताधिवास- हृद्यश्रुतोऽभिनवगुप्तपदाभिधोऽहम् । यत्किंचिदप्यनुरणन्स्फुटयामि काव्या- लोकं स्वलोचननियोजनया जनस्य ॥ भट्ट इन्दुराज के चरण-कमलों में रहकर शास्त्रों को हृदयस्थ करके मैं अभिनवगुप्त- पाद अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा जो कुछ भी कथन करके लोगों के समक्ष 'काव्या- लोक' (ध्वन्यालोक) को स्पष्ट करने जा रहा हूँ।१
सृष्टि उपादान कारणों के द्वारा होती है, इस दृश्यमान सृष्टि के कर्ता में यह सामर्थ्य नहीं कि बिना किसी कारण-सामग्री के सृष्टि कर दे, वह पदे-पदे नियति के नियमों से नियन्त्रित रहता है और दूसरे यह कि उसकी सृष्टि 'अपूर्व' नहीं होती, वही देखी-सुनी वस्तुएँ पैदा करता रहता है। उदाहरणार्थ, दृश्यमान कमल जल के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता किन्तु काव्य में मुखकमल का, जल के बिना ही अपूर्व रूप में उत्पन्न होना प्रसिद्ध है। काव्य की दूसरी विशेषता यह है कि दृश्यमान जगत्, जो पत्थर की भाँति नीरस और कठोर लगता है, को अपनी रस-सम्पत्ति से सारवान् बना देता है तथा अपनी तीसरी विशेषता से, जो प्रतिभा (प्रख्या) और वचन (उपाख्या) के क्रम में विद्यमान है, अपने सभी अपूर्व और सरस निर्माण को हृद्य बनाती है। यह अपूर्वता, सरसता और हृद्यता कविसहृदयाख्य सरस्वतीत्तत्त्व रूप 'काव्य' में एकान्ततः प्राप्त होती हैं, जब कि दृश्यमान जगत् में इन्हें एकान्ततः प्राप्त करना कदाचित् किसी के लिए भी संभव नहीं। इस प्रकार यहाँ दृश्यमान जगत् से काव्य-जगत् का उत्कर्ष रूप व्यतिरेक व्यङ्ग्य होता है। अभिनवगुप्त के इस मङ्गल-श्लोक का साक्षात् प्रभाव आचार्य मम्मट के 'काव्यप्रकाश' के मङ्गल-श्लोक 'नियतिकृतनियम०' पर पड़ा प्रतीत होता है। क्योंकि उसमें भी कविर्निर्मिति को ब्रह्मनिर्मिति से उत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए उसे अनियन्त्रित, हृद्य, अनन्यपरतन्त्र तथा नवरसरुचिरा कहा है। प्रस्तुत में यह कहना अनुचित न होगा कि आचार्य अभिनवगुप्त के समग्र साहित्य-दर्शन पर उनके स्वनिर्मित प्रत्यभिज्ञादर्शन का पुष्कल प्रभाव पड़ा है। वे 'शिव' में सुन्दर और सत्य के एकनिष्ठ साक्षात्कर्ता थे। सम्भवतः यहाँ 'सरस्वती' के रूप में 'स्वतन्त्र चिति शक्ति' अभिमत हो और 'कविसहृदयाख्य' काव्य स्वयं 'शिव' हो १. आचार्य ने अपने विद्याश्रम को परम्परागत बताते हुए, क्योंकि ऐसा किसी को भ्रम न हो कि इनकी कल्पनाओं, विचारों में परम्परा नहीं है, अपने पूज्यपाद गुरु 'भट्ट इन्दुराज' का उल्लेख किया है। साथ ही अपने मन्तव्यों के पीछे वह अभिनिविष्ट नहीं हैं, बल्कि वह 'यत्किञ्चित्' अर्थात् जो कुछ भी कहते हुए प्रस्तुत ग्रन्थ को 'स्फुट' करने की प्रवृत्ति रखते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' अपने प्राचीन सङ्केत के अनुसार 'काव्यालोक' के नाम से ही अभिहित रूप में प्राप्त होता है, इसकी 'ध्वन्यालोक' संज्ञा अर्वाचीन प्रतीत होती है। अपनी 'लोचन' टीका के अन्त में भी आचार्य ने इस ग्रन्थ का 'काव्यालोक' के ही नाम से उल्लेख किया है। 'स्वलोचननियोजनया' अर्थात् अपने 'लोचन' के नियोजन द्वारा; यहाँ 'लोचन' पद प्रस्तुत टीका, विचार तथा मन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तात्पर्य यह कि मैं 'लोचन' टीका के रूप में अपना 'विचार' या मन को प्रणिहित करके लोगों के समक्ष 'काव्यालोक' को स्फुट या स्पष्ट कर रहा हूँ। दूसरे यह कि 'लोचन' अर्थात् आँख, प्रस्तुत 'लोचन' के रूप में लोगों को 'आँख' दे रहा हूँ, ताकि 'आलोक' में 'काव्य' को वे स्पष्ट रूप से देख सकें। किसी भी विशेष वस्तु को देखने के लिए विशेष 'दृष्टि' की आवश्यकता होती है, बाह्य दृष्टि का उपयोग केवल सामान्य है। इसीलिए 'गीता' में भगवान्
प्रथम उद्योतः ३ ध्वन्यालोकः श्रीनृहरये नमः स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः । त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिच्छिदो नखाः ॥ अपनी इच्छा से केसरी (सिंह) का रूप धारण किये हुये भगवान् मधुरिपु (मधु नामक दैत्य के शत्रु विष्णु) के, स्वच्छ अपनी छाया (कान्ति) से इन्दु को आयासित (खिन्न) करने वाले तथा प्रपन्न (शरणागत) जनों की आर्ति का छेदन करने वाले नख आप लोगों की रक्षा करें। लोचनम् स्वयमव्युच्छिन्नपरमेश्वरनमस्कारसम्पत्तिचरितार्थोऽपि व्याख्यातृश्रोतॄणा- मविघ्नेनाभीष्टव्याख्याश्रवणलक्षणफलसम्पत्तये समुचिताशीःप्रकटनद्वारेण परमे- श्वरसांमुख्यं करोति वृत्तिकारः—स्वेच्छेति । वृत्तिकार¹ स्वयं विच्छेद-रहित (निरन्तर) परमेश्वर के नमस्कार की सम्पत्ति (परम्परा, आधिक्य) से कृतार्थ होने पर भी व्याख्याता और श्रोताओं की बिना किसी विघ्न के अभीष्ट व्याख्या के श्रवण रूप फल-सम्पत्ति के लिये समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का आभिमुख्य करते हैं—अपनी इच्छा—। कृष्ण ने अपने 'ऐश्वर रूप' को दिखाने के लिए अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' देते हुए कहा है—न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ (११।८) इसी प्रकार आचार्य अभिनव ने यहाँ 'लोचन' का एक विशेष 'दृष्टि' के अर्थ में प्रयोग किया है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् किसी को काव्य का रहस्य अदृष्ट नहीं रह जाता ! १. वृत्तिकार अर्थात् मूल कारिकाग्रन्थ के वृत्तिग्रन्थ का रचयिता। प्रस्तुत 'लोचन' का आशय यह है कि वृत्तिकार को मङ्गल-श्लोक द्वारा परमेश्वर का नमस्कार करना प्रस्तुत में अभीष्ट न था, क्योंकि वह तो निरन्तर परमेश्वर को नमस्कार करते रहते हुए स्वयं कृतार्थ हो चुके थे, फिर भी प्रस्तुत ग्रन्थ के व्याख्याताओं और श्रोताओं को अभीष्ट व्याख्याश्रवण की फलसम्पत्ति निर्विघ्न रूप में प्राप्त होती रहे, यह उन्हें परम अभिप्रेत था। इसलिए यहाँ वृत्तिकार समुचित आशीर्वाद के प्रकाशन द्वारा परमेश्वर का साम्मुख्य या आभिमुख्य करते हैं, अर्थात् परमेश्वर से व्याख्याता और श्रोताओं के कल्याण की कामना करते हैं। यह प्राचीन भारतीय परम्परा से चला आ रहा है कि ग्रन्थकार अपनी ओर से किसी भी इष्ट देवता को अपने और अपने श्रोतृवर्ग के कल्याण के लिए मङ्गलाचरण के रूप में नमन करता है। अपने लिए प्रायः ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति उसे अभिप्रेत होती है। यह मङ्गलाचरण तीन प्रकार के होते हैं, आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक और वस्तुनिर्देशात्मक। प्रस्तुत मङ्गलाचरण 'आप लोगों की रक्षा करें' इस रूप में होने के कारण आशीर्वादात्मक शैली का है। इसे ग्रन्थकार अपने मन में भी कर ले सकता था; परन्तु प्राचीनकाल में शिष्यों के शिक्षार्थ मङ्गलाचरण को लिपिबद्ध करना अनिवार्य समझा जाता था। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि लोचनकार मङ्गल-श्लोक को प्रस्तुत करते हुए 'वृत्तिकार' का उल्लेख करते हैं, इससे यह प्रतीत होना स्वाभाविक है कि मङ्गल-श्लोक मूलग्रन्थ का नहीं अपितु वृत्तिग्रन्थ का है। ऐसी स्थिति में आचार्य आनन्दवर्धन यदि मूलग्रन्थकार हैं तो वृत्तिग्रन्थ का रचयिता कौन है अथवा आनन्दवर्धन वृत्तिग्रन्थ के यदि रचयिता हैं तो मूलग्रन्थ
४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मधुरिपोर्नखाः वो युष्मान्व्याख्यातृश्रोतॄंस्त्रायन्ताम्, तेषामेव सम्बोधन- योग्यत्वात् ; सम्बोधनसारो हि युष्मदर्थः, त्राणं चाभीष्टलाभं प्रति साहायका- चरणं, तच्च तत्प्रतिद्वन्द्विविघ्नापसारणादिना भवतीति, इयदत्र त्राणं विवक्षितम्, नित्योद्योगिनश्च भगवतोऽसम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहप्रतीतेर्वीररसो ध्व- न्यते, नखानां प्रहरणत्वेन प्रहरणेन च रक्षणे कर्तव्ये नखानामव्यतिरिक्तत्वेन मधु के शत्रु (विष्णु) के नख आप सभी व्याख्याता और श्रोताओं की रक्षा करें, क्योंकि वे ही (व्याख्याता और श्रोता) सम्बोधन के योग्य हैं। 'सम्बोधन' युष्मत् शब्द के अर्थ का सार (प्राण) है (सम्बोध्या पदार्थ की उपस्थिति में ही 'युष्मत्' यां आप-तुम का प्रयोग होता है)। 1. और, त्राण (रक्षण) अभीष्ट के लाभ के प्रति सहायता प्रदान करना है और वह (सहायताप्रदान) उस (अभीष्ट लाभ) के प्रति- द्वन्द्वी विघ्नों के अपसारण आदि द्वारा होता है, इस रूप में यहाँ त्राण विवक्षित है।^१ नित्य उद्योगशील भगवान् के असम्मोह और अध्यवसाय से युक्त होने के कारण उत्साह की प्रतीति होने से वीररस ध्वनित होता है।^२ नखों के प्रहरण (प्रहार के साधन) का रचयिता कौन है, ऐसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। यत्र-तत्र लोचनकार ने 'मूलकृत्', 'कारिकाकार' और 'वृत्तिकृत्' रूप में व्याख्यान किया है। लेकिन प्राचीन मान्यता यही रही है कि आनन्दवर्धन ही मूलकार और वृत्तिकार स्वयं हैं। लोचनकार के उल्लेख के अनुसार प्रस्तुत मङ्गलश्लोक को वृत्तिग्रन्थ के रूप में ही छापने की पद्धति चली आ रही है, मूल कारिका ग्रन्थ को मोटे अक्षरों में छापा जाता है। कारिकाकार और वृत्तिकार को अभिन्न मानने वालों का एक तर्क यह भी है कि यदि कारिकाग्रन्थ का कर्ता कोई दूसरा होता तो निश्चय ही वह अपनी ओर से मङ्गलाचरण प्रस्तुत करता। यद्यपि इसके विपरीत एक यह भी युक्ति दी जा सकती है कि 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' इस प्रयोग से कारिकाग्रन्थ का आरम्भ करके निश्चय ही वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गल किया गया है, क्योंकि 'काव्य' भी 'शब्दमूर्तिधर भगवान् विष्णु का अंश' माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह भी एक प्रकार का मङ्गलाचरण हो जाता है। अस्तु, मूल कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न अथवा अभिन्न होने का विचार प्रामाणिक और तर्कपूर्ण ढंग से 'भूमिका' में आकलनीय है। १. अभीष्ट व्याख्याश्रवण ही प्रस्तुत प्रयास का फल है, और यह तभी सम्भव है जब व्याख्याता और श्रोतृवर्ग दोनों त्राण (रक्षा) प्राप्त करें। फलतः त्राण उनके अभीष्ट लाभ का सहायक सिद्ध होता है। वह भी इस अर्थ में कि उसके द्वारा समग्र प्रतिद्वन्द्वी विघ्नों का अपसारण आदि कार्य होते हैं। इस प्रकार यहाँ भगवान् मधुरिपु के नख त्राण या रक्षा करें, अर्थात् अभीष्ट व्याख्याश्रवण के प्रतिद्वन्द्वी रूप में उपस्थित होने वाले सभी प्रकार के विघ्नों का अपसारण करें, यह वृत्तिकार का अभिप्रेत अर्थ लोचनकार के मत में प्रकट होता है। २. प्रस्तुत काव्य आत्मभूत ध्वनितत्त्व का मूलतः प्रतिपादन करता है, अतः यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकार अपने मङ्गलाचरण में ही 'ध्वनि' के प्रधान रूपों का निर्देश करें। इस उद्देश्य से लोचनकार ने यहाँ रस, वस्तु और अलङ्कार के ध्वनित होने का प्रकार बताया है। सर्वप्रथम ध्वनियों में प्रधान रसध्वनि की चर्चा में कहते हैं कि यहाँ वीररस ध्वनित होता है क्योंकि उत्साह की प्रतीति होती है, और उत्साह ही वीररस का स्थायी भाव है। उत्साह इसलिए कि भगवान् मधुरिपु अपने नखों द्वारा त्राण-कार्य में नित्य उद्योगशील हैं, एवं उनमें किसी प्रकार का
प्रथम उद्योतः ५ लोचनम् करणत्वात्सातिशयशक्तिता कर्तृत्वेन सूचिता, ध्वनितश्च परमेश्वरस्य व्यति- रिक्तकरणापेक्षाविरहः, मधुरिपोरित्यनेन तस्य सदैव जगत्त्रासापसारणोद्यम उक्तः, कीदृशस्य मधुरिपोः ? स्वेच्छया केसरिणः, न तु कर्मपारतन्त्र्येण, नाप्यन्यदीयेच्छया, अपि तु विशिष्टदानवहननोचिततथाविधेच्छापरिग्रहाैचि- त्यादेव स्वीकृतसिंहारूपस्येत्यर्थः; कीदृशा नखाः ? प्रपन्नानामार्तिं ये छिन्दन्ति; नखानां हि छेदकत्वमुचितम्; आर्तेः पुनश्छेद्यत्वं नखान्प्रत्यसम्भावनीयमपि तदीयानां नखानां स्वेच्छानिर्माणौचित्यात्सम्भाव्यत एवेति भावः। अथ वा त्रिजगत्कण्टको हिरण्यकशिपुर्विश्वस्योत्क्लेशकर इति स एव वस्तुतः प्रपन्नानां भगवदेकशरणानां जनानामार्तिकारित्वान्मूर्तमार्तिस्तं विनाशयद्भिरार्ति- होने से और प्रहार के साधन द्वारा रक्षण के कर्तव्य होने से, अव्यतिरिक्त (अपृथग्भूत) रूप से करण (आभ्यन्तर करण) होने के कारण कर्त्ता रूप देकर अतिशययुक्त शक्ति- मत्त्व को सूचित किया है। और, परमेश्वर को व्यतिरिक्त (अपने शरीर से पृथग्भूत) करण (साधन) की अपेक्षा नहीं होती है, यह ध्वनित किया। 'मधुरिपु' के द्वारा उस परमेश्वर का उद्योग संसार के त्रास के निवारणार्थ सदैव चलता रहता है, यह कहा है। किस प्रकार के मधुरिपु के ? अर्थात् जो अपनी इच्छा से केसरी (सिंह, नृसिंह) बन गये, न कि (पूर्व) कर्म की परतन्त्रता के कारण; और दूसरे किसी की इच्छा से भी नहीं, अपितु विशिष्ट दानव (हिरण्यकशिपु) के हनन के लिए उचित उस प्रकार की इच्छा के परिग्रह के औचित्य से ही जिन्होंने सिंह का रूप स्वीकार किया। किस प्रकार के नख ? जो प्रपन्नों (शरणागतों) की आर्ति (कष्ट) का छेदन करते-निवारण करते- हैं, क्योंकि नखों का छेदकत्व उचित है; फिर (नखों के द्वारा) छेद्य होना नखों के प्रति असम्भावनीय होकर भी उन (परमेश्वर) के नखों के अपनी इच्छा से निर्मित होने के औचित्य से सम्भावित होगा ही, यह भाव है। अथवा, तीनों जगत् का कंटक हिरण्यकशिपु संसार को क्लेश पहुंचाने वाला था, इस प्रकार वही वस्तुतः प्रपन्न, भगवान् की एकमात्र शरण में आये हुये जनों का
सम्मोह नहीं तथा उन्होंने यही अध्यवसाय या निश्चय भी कर लिया है। 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में मेरे पूज्य गुरुजी ने 'लोचन' के 'उत्साहप्रतीति' प्रयोग को लेकर बताया है कि यहाँ वीररस के स्थायी भाव उत्साह के साथ अन्य विभावादि की नान्तरीयक रूप से पानकरसन्यायेन प्रतीति होती है। क्योंकि यह नियम है कि रस के उद्बोधक किसी एक के विद्यमान रहने पर झटिति अन्य तत्त्वों का आक्षेप कर लिया जाता है- (सद्भावश्च विभावादेर्द्वयोरेकस्य वा भवेत्। झटित्यन्यसमाक्षेपे तदा दोषो न विद्यते॥) इस प्रकार यहाँ उत्साह का आलम्बन मधु दैत्य है, उसके निर्भीकत्वादि का ज्ञान रूप उद्दीपन तथा उसके प्रति अवहेला आदि अनुभाव एवं गर्व आदि सञ्चारियों की प्रतीति उत्साहप्रतीति के साथ हो जाती है। इस प्रकार यहाँ वीररस पूर्णतया ध्वनित होता है। लोचनकार ने 'उत्साह की प्रतीति' को सभी अन्य तत्त्वों की प्रतीति के उपलक्षण रूप में उल्लेख किया है।
६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् रेवोच्छिन्ना भगवतीति परमेश्वरस्य तस्यामप्यवस्थायां परमकारुणिकत्वमुक्तं, किं च ते नखाः स्वच्छेन स्वच्छतागुणेन नैर्मल्येन; स्वच्छमृदुप्रभृतयो हि मुख्य- तया भाववृत्तय एव; स्वच्छायया च वक्रहृद्यरूपयाऽऽकृत्याऽऽयासितः-खेदित इन्दुर्यैः, अत्रार्थशक्तिमूलेन ध्वनिना बालचन्द्रत्वं ध्वन्यते, आयासनेन तत्स- न्निधौ चन्द्रस्य विच्छायत्वप्रतीतिरहृद्यत्वप्रतीतिश्च ध्वन्यते, आयासकारित्वं च आर्तिकारी (दुःखदायी) होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप ही था, उसका विनाश करते हुये (नखों द्वारा) आर्ति ही उच्छिन्न की जाती है, इस प्रकार परमेश्वर का उस अवस्था में भी परमकारुणिकत्व कहा है ।१ और भी, वे नख स्वच्छ अर्थात् स्वच्छता गुण रूप निर्मलता के द्वारा, क्योंकि 'स्वच्छ' 'मृदु' प्रभृति शब्द मुख्य रूप से भाववृत्ति (स्वच्छता आदि धर्म के वाचक ही हैं; और अपनी छाया से, वक्र एवं हृद्य रूप आकृति से आयासित, खेदित (खेद को प्राप्त) इन्दु (चन्द्र) है जिनके द्वारा । यहाँ 'अर्थशक्तिमूलध्वनि' से इन्दु (चन्द्र) का बालत्व ध्वनित होता है । 'आयास पहुँचाने' से नखों के समीप चन्द्र के विच्छायत्व (कान्तिराहित्य) की प्रतीति १. 'नखों के प्रहरण' से आरम्भ करके इस अङ्कित स्थल तक 'वस्तुध्वनि' का निरूपण किया है । श्लोक में ऐसा नहीं कहकर कि मधुरिपु आप लोगों की रक्षा करें, कहा गया है कि मधुरिपु के नख आप लोगों की रक्षा करें, यद्यपि कि मधुरिपु के नख मधुरिपु से भिन्न नहीं, तथापि वे नख मधुरिपु से अपृथक् होने के कारण त्राण के कार्य में असाधारण कारण रूप से प्रस्तुत किये गये हैं, क्योंकि नख एक प्रकार के प्रहरण अर्थात् प्रहार के साधन, किंवा आयुध हैं, आयुध द्वारा अपनी या अन्य की रक्षा ही मुख्य रूप से कर्तव्य होती है। दूसरे यह कि नखों को त्राण का कर्ता बनाकर उनकी सातिशयशक्तित्ता अर्थात् अतिशय शक्तिमान् होना, सूचित किया है। तात्पर्य यह कि भगवान् मधुरिपु के नख स्वयं ही अपने आप में इस प्रकार पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं कि त्राण कर सकें। इससे एक और 'वस्तु' यह भी ध्वनित होती है कि परमेश्वर को जगत के त्राण जैसे कार्य के लिए अपने से अतिरिक्त साधन (व्यतिरिक्त करण) की अपेक्षा नहीं, बल्कि उनका यह कार्य अपने ही शरीर के एक तुच्छ और साधारण तत्त्व नख से ही सम्पन्न हो जाता है । अब इसी प्रसंग में क्रम से श्लोक के विशेषणों से ध्वनित 'वस्तु' का प्रतिपादन करते हैं। स्वयं विशेष्यभूत विशेषण 'मधुरिपु' की व्यञ्जना है कि भगवान् जगत् को त्रस्त करने वाले मधु दैत्य आदि के शत्रु होकर जगत्त्रासापसारणार्थ निरन्तर उद्योगशील हैं, अर्थात् उनका यह स्वभाव ही है कि संसार के भय का निवारण करते रहें । 'अपनी इच्छाशक्ति से केसरी (सिंह) का रूप धारण किए हुए' इस विशेषण की व्यञ्जना के अनुसार उन पर न तो किसी प्रकार कर्म की परतन्त्रता है और न दूसरे किसी की इच्छा का दबाव है, बल्कि हिरण्यकशिपु जैसे विशिष्ट दानव, जिसने किसी समय, किसी स्थान पर तथा किसी व्यक्ति से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया था, के हनन की उचित इच्छा के परिग्रह के औचित्य से ही जिन भगवान् मधुरिपु ने नरसिंह का स्वरूप धारण किया। नखों के विशेषण रूप में कहते हैं 'प्रपन्न जनों की आर्ति का छेदन करने वाले'; नख का उचित कार्य छेदन ही होता है । यद्यपि 'आर्ति' या पीड़ा का छेद्य होना सम्भव नहीं, तथापि परमेश्वर के स्वेच्छानिर्मित नखों द्वारा उसका छेद्य होना भी यहाँ असम्भाव्य नहीं समझना चाहिए । अथवा भगवान् के प्रपन्न प्रह्लाद आदि जनों के आर्तिप्रद होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप उस हिरण्यकशिपु का नखों द्वारा छेदन ही यहाँ अभीष्ट है । इस प्रकार ऐसी
प्रथम उद्योतः ७ लोचनम् नखानां सुप्रसिद्धम् ; नरहरिनखानां तच्च लोकोत्तरेण रूपेण प्रतिपादितम् , किं च तदीयां स्वच्छतां कुटिलिमानं चावलोक्य बालचन्द्रः स्वात्मनि खेदमनु- भवति; तुल्येऽपि स्वच्छकुटिलाकारयोगेऽमी प्रपन्नार्त्तिनिवारणकुशलाः; न त्वहमिति व्यतिरेकालङ्कारोऽपि ध्वनितः, किञ्चाहं पूर्वमेक एवासाधारणवैशद्य- हृद्याकारयोगात्समस्तजनाभिलषणीयताभाजनमभवम्, अद्य पुनरेवंविधा नखा दश बालचन्द्राकाराः सन्तापार्त्तिच्छेदकुशलाश्चेति तानेव लोको बालेन्दुबहु- मानेन पश्यति, न तु मामित्याकलयन्बालेन्दुरविरतमायासमनुभवतीत्युत्प्रेक्षा- पह्नुतिध्वनिरपि, एवं वस्त्वलङ्काररसभेदेन त्रिधा ध्वनिरत्र श्लोकेऽस्मद्गुरु- भिर्व्याख्यातः । और अहृद्यत्व की प्रतीति होती है। और नखों का आयासकारित्व सुप्रसिद्ध है, और नृसिंह के नखों का वह (आयासकारित्व) लोकोत्तर रूप से प्रतिपादित है। और भी,१ उन नखों की स्वच्छता और कुटिलिमा (टेढ़ापन) को देखकर बालचन्द्र अपने आप में खेद अनुभव करता है, स्वच्छ एवं कुटिल आकार के सम्बन्ध के समान होने पर भी (अर्थात् जैसी स्वच्छता और कुटिलिमा नखों में है वैसी ही मुझ बालचन्द्र में है) ये (नख) प्रपन्न जनों की आर्त्ति के निवारण में कुशल हैं, मैं नहीं, यह 'व्यतिरेक अलङ्कार' भी ध्वनित होता है। और भी, मैं पहले एक अकेले ही असाधारण वैशद्य (स्वच्छता) एवं हृद्य आकार के योग से समस्त जनों की अभिलषणीयता का पात्र था, आज फिर इस प्रकार के नख दस बालचन्द्रों के आकार वाले और सन्ताप तथा आर्त्ति के छेदन में कुशल हैं, उन्हें ही संसार बालचन्द्र के बहुमान से देखता है न कि मुझे, इस प्रकार आकलन करता हुआ बालचन्द्र विरन्तर आयास को जैसे अनुभव करता है, यह 'उत्प्रेक्षा' और 'अपह्नुति' का ध्वनि भी है। इस प्रकार हमारे गुरुजी (भट्ट इन्दुराज) ने वस्तु, अलङ्कार और रस के भेद से तीन प्रकार के 'ध्वनि' का इस श्लोक में व्याख्यान किया है। स्थिति में भी परमेश्वर की परमकारुणिकता अभिहित हो जाती है, जो प्रस्तुत विशेषण का मुख्य तात्पर्य है। फिर नख का एक दूसरा विशेषण 'स्वच्छता और अपनी छाया (आकृति) से इन्दु (चक्र) को आयासित करने वाले'; यहाँ लोचनकार ने 'स्वच्छ' को 'स्वच्छाया' का विशेषण न मान कर स्वतन्त्र अर्थ 'स्वच्छता' या नैर्मल्य किया है, 'छाया' अर्थात् वक्र एवं हृद्य आकृति। इस प्रकार लोचनकार के अनुसार यहाँ अर्थशक्तिमूल ध्वनिव्यापार से नखों का बालचन्द्रत्व ध्वनित होता है, दूसरे, नखों द्वारा इन्दु के आयासन से यह प्रतीति ध्वनित हुई कि उन नखों के समीप चन्द्र शोभाहीन है एवं अहृद्य है; क्योंकि आयासकारी होना नखों के पक्ष में सर्वविदित है। अर्थात् भगवान् नृसिंह के नख अपनी निर्मलता और आकृति से बालचन्द्र को आयासित करते हैं, मतलब यह कि उनके नजदीक बालचन्द्र विच्छाय (फीका) और अहृद्य (दिलकश न लगने वाला) प्रतीत होता है। नृसिंह के नखों के आयासकारित्व की लोकोत्तरता यह है कि अन्य लौकिक नख में उस प्रकार बालचन्द्र को आयासित करने वाली स्वच्छता एवं वक्र-हृद्य आकृति नहीं होती। १. 'अलङ्कारध्वनि' का निर्देश करते हुए आचार्य कहते हैं कि एक तो बालचन्द्र को इस बात का
८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्व- स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये । केचिद्वाचां स्थितमविषये तत्त्वमूचुस्तदीयं तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ॥ १ ॥ बुधजनों ने काव्य के आत्मा को 'ध्वनि' यह पहले से समाम्नात किया है, दूसरे लोगों ने उसका अभाव कहा, अन्य लोगों ने उसे 'भाक्त' कहा, कुछ लोगों ने उसके तत्त्व को वाणी का अगोचर कहा, अतः सहृदय जनों के मन की प्रीति के लिये उस (ध्वनि) का स्वरूप कहते हैं ॥ १ ॥ लोचनम् अथ प्राधान्येनाभिधेयस्वरूपमभिदधदप्रधानतया प्रयोजनप्रयोजनं तत्स- म्बद्धं प्रयोजनं च सामर्थ्यात्प्रकटयन्नादिवाक्यमाह—काव्यस्यात्मेति । अब प्रधान रूप से (इसे ग्रन्थ के) अभिधेय के स्वरूप की चर्चा करते हुये, अप्रधान रूप से प्रयोजन के प्रयोजन को और उससे संम्बद्ध प्रयोजन को सामर्थ्य से प्रकट करते हुये; प्रथम वाक्य कहते हैं—बुध जनों ने काव्य के आत्मा— खेद थी कि नखों जैसी स्वच्छता तथा कुटिलता उसमें नहीं हैं, और इस अंश में यदि किसी प्रकार दोनों की समानता हो भी जाय तब भी बालचन्द्र को अपनी यह कमी खलेगी ही कि नखों की भाँति प्रपन्न जनों की आर्ति के निर्वाण में वह कुशल नहीं हो सका; इस प्रकार उपमानभूत बालचन्द्र से उपमेयभूत नखों के आधिक्य की प्रतीति होने से 'व्यतिरेक' नामक अलङ्कार भी ध्वनित हुआ । 'उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः' (काव्यप्रकाश) । फिर यहीं दूसरे प्रकार से आचार्य ने उत्प्रेक्षा और अपह्नुति अलङ्कारों के ध्वनि का निर्देश किया है। उत्प्रेक्षा यह है कि मानों बालचन्द्र निरन्तर आयास अनुभव करता है और 'अपह्नुति' का स्थल यह हुआ कि उन्हीं नखों को सारा संसार बालचन्द्र के बहुमान या गौरव से देखता है, जब कि मैं (बालचन्द्र) साक्षात् विद्यमान हूँ। यहाँ उत्प्रेक्षा अपह्नुति के बल पर होती है, क्योंकि जब संसार बालचन्द्र को बालचन्द्र न समझकर नखों को बालचन्द्र का गौरव देता है, तभी बालचन्द्र का आयासित होना भी सम्भावित है । इस प्रकार यहाँ दोनों का अङ्गाङ्गिभाव रूप 'संकर' ध्वनित है। १. प्रस्तुत ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' का प्राधान्यतः अभिधेय या प्रतिपाद्य 'ध्वनि' तत्त्व है, ध्वनि के स्वरूप का ज्ञान प्रयोजन है तथा इस प्रयोजन का प्रयोजन सहृदयजनों के मन की प्रतीति या प्रसन्नता है। इस प्रकार दूसरे प्रयोजन 'प्रीति' से सम्बद्ध प्रयोजन 'ध्वनिस्वरूप का ज्ञान' की चर्चा ग्रन्थकार 'मन्दाक्रान्ता' छन्द में निबद्ध प्रथम वाक्य में करते हैं, यह लोचनकार का निर्देश है। यहाँ आकलनीय बात यह है कि प्राचीन ग्रन्थकार ग्रन्थारम्भ करते हुए यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझते थे कि प्रस्तुत ग्रन्थ का विषय क्या है, अधिकारी कौन हैं, सम्बन्ध क्या है तथा प्रयोजन क्या है, इन्हीं विषय-अधिकारी-सम्बन्ध-प्रयोजन को शास्त्रीय भाषा में 'अनुबन्धचतुष्टयं' कहते थे। उन ग्रन्थकारों का ऐसा करने में यह तात्पर्य था कि पहले ही उनका ग्रन्थ उन लोगों से
प्रथम उद्योतः ९
ध्वन्यालोकः
बुधैः काव्यतत्त्वविद्भिः, काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति संज्ञितः, परम्प-
रया यः समाम्नातपूर्वः सम्यक् आसमन्ताद् ज्ञातः प्रकटितः, तस्य सहृद-
यजनमनःप्रकाशमानस्याप्यभावमन्ये जगदुः । तदभाववादिनां चामी
विकल्पाः संभवन्ति ।
बुध अर्थात् काव्य के तत्त्वज्ञ लोगों ने काव्य के आत्मा को 'ध्वनि' यह संज्ञा दी
है और जिसे परम्परा से, पूर्व में ही समाम्नात, सम्यक् आ समन्तात् ज्ञात, प्रकटित
किया है, सहृदय जनों के मन में प्रकाशमान भी उस (ध्वनि) का अन्य लोग अभाव
कहते हैं। उसके अभाववादियों के ये विकल्प सम्भव हैं।
लोचनम्
काव्यात्मशब्दसंनिधानाद् बुधशब्दोऽत्र काव्यात्मावबोधनिमित्तक इत्यभि-
प्रायेण विवृणोति-काव्यतत्त्वविद्भिरिति । आत्मशब्दस्य तत्त्वशब्देनार्थं विवृण्वानः
सारत्वमपरशब्दवैलक्षण्यकारित्वं च दर्शयति । इतिशब्दः स्वरूपपरत्वं ध्वनि-
'काव्य के आत्मा' इस शब्द के समीप में रहने से 'बुध' शब्द यहाँ पर 'काव्य
के आत्मा का अवबोध (ज्ञान)' इस प्रयोग के लिये है, इस अभिप्राय से विवरण करते
हैं—काव्य के तत्त्वज्ञ लोगों ने—। 'आत्मा' शब्द का 'तत्त्व' शब्द से अर्थ-विवरण
करते हुये सारत्व और दूसरे शब्द (प्रतिपाद्यों) से वैलक्षण्यकारित्व को दिखाया है।
'यह' (इति) शब्द 'ध्वनि' का स्वरूप में तात्पर्य बतलाता है, क्योंकि उस (ध्वनि)
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बच जायेगा, जो उसके अधिकारी होने की क्षमता नहीं रखते हैं तथा जो अधिकारी जन हैं उन्हें
अपने प्रयोजन तक पहुँचने में सरलता भी हो जायगी । 'लोचन' में इन्हीं बातों को ध्यान में
रखकर प्रस्तुत ग्रन्थ की उपर्युक्त अवतरणिका दी है। यहाँ विषय 'ध्वनि' का स्वरूप है, अधिकारी
सहृदयजन हैं ('सहृदय' की परिभाषा आगे 'लोचने' में स्पष्टता से मिलेगी), (विषय के साथ)
सम्बन्ध प्रतिपाद्य-प्रतिपादक है, और सहृदय के साथ उपकार्योपकारक भाव रूप सम्बन्ध है तथा
प्रयोजन प्रीति है। इस प्रयोजन से सम्बद्ध ध्वनिवरूप-ज्ञान रूप प्रयोजन सामर्थ्य या आक्षेप से
ही प्राप्त होता है, क्योंकि सहृदयों की प्रसन्नता ध्वनिस्ररूप के ज्ञान के बिना नहीं सिद्ध हो सकती ।
१. कारिकाकार 'ध्वनि' के लिए (काव्य की) 'आत्मा' शब्द का प्रयोग करते हैं और
वृत्तिकार ने 'आत्मा' के स्थान पर 'तत्त्व' शब्द रखा है। लोचनकार के अनुसार वृत्ति में 'आत्मा'
की 'तत्त्व' शब्द से अर्थ-विवृति की गई है। इस प्रकार प्रस्तुत 'बुध' शब्द से उन बोध रखनेवाले
लोगों का अर्थ गृहीत है, जो काव्य के 'तत्त्व' को जानते हैं, न कि सभी प्रकार के बुध जन ।
'आत्मा' की विवृति 'तत्त्व' से करके दो विशेष बातें निर्दिष्ट की हैं—एक तो 'सारत्व', अर्थात्
'ध्वनि' काव्य का 'सारभूत' है तथा दूसरे शब्दप्रतिपाद्यों से वैलक्षण्यकारित्व, अर्थात् 'ध्वनि'-
शब्दप्रतिपाद्य वह तत्त्व है जो किसी भी अन्य शब्दप्रतिपाद्य से मेल नहीं खाता, बल्कि उनसे
अत्यन्त वैलक्षण्यकारी है। यह यहाँ ध्यान देने की बात है कि लोचनकार इस 'ध्वनितत्त्व' को
'विलक्षण' न कहकर 'वैलक्षण्यकारी' कहते हैं। 'विलक्षण' कहने से लौकिक-वैदिक-शब्द-प्रतिपाद्यों
से इसकी भिन्नतामात्र सिद्ध होती है और भिन्नता इसलिए अपेक्षित नहीं कि अनुत्कृष्ट तत्त्व भी तो
१० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् शब्दस्याचष्टे, तदर्थस्य विवादास्पदीभूततया निश्चयाभावेनार्थवत्त्वायोगात् । एतद्विवृणोति—संज्ञित इति । वस्तुतस्तु न तत्संज्ञामात्रेणोक्तम्, अपि त्वस्त्येव ध्वनिशब्दवाच्यं प्रत्युत समस्तसारभूतम् । न ह्यन्यथा बुधास्तादृशमाम्नेयु- रित्यभिप्रायेण विवृणोति—तस्य सहृदयेत्यादिना । एवं तु युक्ततरम्—इतिशब्दो भिन्नक्रमो वाक्यार्थपरामर्शकः, ध्वनिलक्षणोऽर्थः काव्यस्यात्मेति यः समाम्नात इति । शब्दपदार्थकत्वे हि ध्वनिसंज्ञितोऽर्थ इति का सङ्गतिः ? एवं हि ध्वनि- शब्दः काव्यस्यात्मेत्युक्तं भवेद्, गवित्ययमाहेति यथा । न च विप्रतिपत्तिस्था- नमसदेव, प्रत्युत सत्येव धर्मिणि धर्ममात्रकृता विप्रतिपत्तिरित्यलमप्रस्तुतेन के अर्थ के विवादास्पद होने के कारण निश्चय न होने से अर्थवत्त्व नहीं बनता । इसे विवरण करते हैं—'संज्ञा' दी है—। वास्तव में, उसे संज्ञामात्र से नहीं कहा है, अपितु है ही ध्वनि शब्द का वाच्य, प्रत्युत वह सब का सारभूत (भी) है । अन्यथा बुध जन उस प्रकार के (ध्वनि-तत्त्व को) आम्नात नहीं करते, इस अभिप्राय से विवरण करते हैं—सहृदय जनों में—इत्यादि से । परन्तु इस तरह का व्याख्यान ज़्यादातर ठीक होगा—'यह' (इति) शब्द भिन्न क्रम से पठित होकर वाक्यार्थ का परामर्शक है, अर्थ होगा—ध्वनि रूप अर्थ 'काव्य का आत्मा' यह जो समाम्नात है । यदि ('ध्वनि' शब्द को 'ध्वनि' इस) संज्ञा मात्र के अर्थ में मानते हैं तो 'ध्वनि, इस संज्ञा वाला अर्थ है' यह क्या सङ्गति बैठेगी ? क्योंकि इस प्रकार, 'ध्वनि शब्द काव्य का आत्मा है' ऐसा कहा जायगा, जैसे 'गौ' ऐसा यह कहता है । यह नहीं कि विप्रतिपत्ति (आशङ्का) का स्थान बिल्कुल है ही नहीं, बल्कि धर्मी के होते हुये ही धर्मपात्र के सम्बन्ध में विप्रतिपत्ति उत्कृष्ट तत्त्व से भिन्न होता है ! इसलिए वह 'ध्वनि तत्त्व' वैलक्षण्यकारी है, अर्थात् काव्य में वैलक्षण्य उत्पन्न करनेवाला है । वैलक्षण्य यहाँ कमाल या वैशिष्ट्य के अर्थ में ग्राह्य है । १. 'काव्य के आत्मा को 'ध्वनि' यह संज्ञा दी है' इस वृत्तिग्रन्थ पर लोचनकार ने विचार किया है । मूल 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति=काव्य के आत्मा को ध्वनि यह' इस ग्रन्थ का 'यह' शब्द यहाँ 'ध्वनि' शब्द का स्वरूप में तात्पर्य बताता है, क्योंकि अभी तो यह निर्णय नहीं किया गया है कि ध्वनि आखिर किस अर्थ को कहते हैं, ऐसी स्थिति में तत्काल 'ध्वनि' इस संज्ञा शब्द को ही काव्य का आत्मा मान लेना चाहिए, फिर आगे चलकर ध्वन्यर्थ का स्पष्टीकरण होता रहेगा । वृत्तिकार ने मूलग्रन्थ को इसी उद्देश्य से लगाया है । लोचनकार इसी व्याख्यान के समर्थन में यह कहते हैं कि यद्यपि यहाँ संज्ञामात्र से ध्वनि तत्त्व का निर्देश किया गया है, तथापि यह किसी को गलतफहमी न होनी चाहिए कि ध्वनिशब्द का वाच्य कोई है ही नहीं, यदि ऐसा होता तो बुध जन इसे स्वीकार कैसे करते ? परन्तु इस प्रकार के व्याख्यान से स्वयं लोचनकार को सन्तोष नहीं है । यहाँ 'यह' ('इति') शब्द विचारणीय है, उसी के अर्थ का प्रश्न है । ऊपर उसे शब्दपरामर्शक मानकर 'ध्वनि' शब्द का स्वरूप में तात्पर्य बताया गया है, परन्तु लोचनकार कहते हैं कि इसे भिन्नक्रम और वाक्यार्थ- परामर्शक समझना चाहिए । इसके अनुसार 'यह' शब्द 'काव्य का आत्मा' के बाद चला जायगा और 'ध्वनि' का अर्थ होगा 'ध्वनि रूप अर्थ'; पूरा रूप होगा—'ध्वनि रूप अर्थ काव्य का आत्मा है, यह जो समाम्नात है । जैसा कि 'ध्वनि' शब्द को 'ध्वनि' पद का अर्थ स्वीकार कर लिया जाय तो किसी प्रकार ग्रन्थ की सङ्गति नहीं बैठेगी, तब तो 'ध्वनि' शब्द ही 'काव्यात्मा' के रूप में
प्रथम उद्योतः ११ लोचनम् भूयसा सहृदयजनोद्वेजनेन । बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाभिधानं स्यात् , न तु भूयसां तद्युक्तम् । तेन बुधैरिति बहुवचनम् । तदेव व्याचष्टे-परम्परयेति । अविच्छिन्नेन प्रवाहेण तैरेतदुक्तं विनाऽपि विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनादि- त्यभिप्रायः। न च बुधा भूयांसोऽनादरणीयं वस्त्वादरेणोपदिशेयुः; एतच्चादरेणो- पदिष्टम् । तदाह-सम्यगाम्नातपूर्वमिति । पूर्वग्रहणेनेदमप्रथमतया नात्र सम्भाव्यत इत्याह, व्याचष्टे च-सम्यगासमन्ताद् ज्ञातः प्रकटित इत्यनेन । तस्येति । यस्यान- धिगमाय प्रत्युत यतनीयं, का तत्राभावसम्भावना । अतः किं कुर्मः, अपारं है, अब सहृदय जनों को उद्विग्न करने वाली यह अप्रासङ्गिक चर्चा व्यर्थ है। एक 'बुध' का उस प्रकार कथन प्रामादिक भी हो सकता था, किन्तु बहुतों का वह (प्रामादिक कथन) नहीं बन सकता । इसलिये 'बुध' में बहुवचन है¹ । उसी की व्याख्या करते हैं-परम्परा से-। अभिप्राय यह कि कभी विच्छिन्न न होने वाले प्रवाह के क्रम से उन (बुधों) ने इसे कहा है, विशिष्ट पुस्तकों में इसका स्थापन भी नहीं किया है। बहुत से बुध जन किसी अनादरणीय वस्तु को आदरपूर्वक उपदेश नहीं करते, इसे तो आदरपूर्वक उपदेश किया है। उसे कहते हैं-पहले से समाम्नात किया है-। 'पहले से' ('पूर्व') इस उल्लेख से, यह पहले-पहल नहीं सम्भावित किया है, यह कहते हैं और व्याख्या करते हैं-सम्यक् आ समन्तात् ज्ञात, प्रकटित-। उसका ।-जिसे प्राप्त करने के लिये प्रत्युत यत्न करना चाहिये उसके अभाव की फिर सम्भावना क्या ? इसलिये क्या करें, गृहीत होने लगेगा, जो सर्वथा अनभीष्ट है। प्रस्तुत को यदि वाक्यार्थपरामर्शक स्वीकार कर लेते हैं तो एक प्रश्न और उठ सकता है जिसकी लोचनकार सम्भावना करके यह निराकरण भी देते हैं। प्रश्न होगा कि ध्वनि के सम्बन्ध में जो विप्रतिपत्तियाँ निर्दिष्ट की गई हैं, 'ध्वनि' रूप अर्थ को प्रस्तुत में स्वीकार करने पर उनकी सम्भावना नहीं रहेगी, क्योंकि जब कि 'ध्वनि' रूप अर्थ को प्रायः विप्रतिपत्तिकारों ने किसी न किसी रूप में स्वीकार किया ही है, इसके समाधान में कहना है कि ध्वनि रूप अर्थ [धर्मी] के निर्विवाद होने पर भी धर्ममात्र में विप्रतिपत्तियाँ उपपन्न होंगी। अर्थात् 'ध्वनि' रूप अर्थ को स्वीकार करते हुए भी विप्रतिपत्तिकारों ने उसे गलत रूप में समझ लिया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उनकी गलतियों के निराकरणार्थ ही ग्रन्थकार प्रयत्नशील हैं। संक्षेप यह कि ध्वनि के सम्बन्ध में किसी को विप्रतिपत्ति नहीं, प्रत्युत ध्वनि के स्वरूप के निर्णय में मतभेद अवश्य है। जिस प्रकार 'शब्द' के सम्बन्ध में किसी को सन्देह या विप्रतिपत्ति नहीं, किन्तु उसके नित्यत्व और अनित्यत्व धर्मों के सम्बन्ध में मतभेद अवश्य है। कोई नित्यत्ववादी है और कोई अनित्यत्ववादी । इसी प्रकार ध्वनि को गुण और अलङ्कार में अन्तर्भूतत्व, भाक्तत्व आदि धर्मों को लेकर विप्रतिपत्तियाँ अवश्य उपपन्न होंगी। १. मूल कारिकाग्रन्थ में प्रयुक्त 'बुधैः' के 'बहुवचन' पर विचार करते हैं। यहाँ यह बात कही जा सकती है कि जब बुध काव्यतत्त्ववेत्ता होकर कुछ भी कहता है तो उसके वचन में अप्रामाण्य की सम्भावना हो ही नहीं सकती, ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं कि काव्यतत्त्ववेत्ता
१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मौर्य्यमभाववादिनामिति भावः । न चास्माभिरभाववादिनां विकल्पाः श्रुताः, किं तु सम्भाव्य दूषयिष्यन्ते, अतः परोक्षत्वम् । न च भविष्यद्वस्तु दूषयितुं युक्तम्, अनुत्पन्नत्वादेव । तदपि बुद्धयारोपितं दूष्यत इति चेत् ; बुद्धयारो- पितत्वादेव भविष्यत्त्वहानिः । अतो भूतकालोन्मेषात् पारोक्ष्याद्विशिष्टाद्यतनत्व- प्रतिभानाभावाच्च लिटा प्रयोगः कृतः-जगदुरिति । अभाववादियों की मूर्खता की कोई सीमा नहीं । हमने अभाववादियों के विकल्प नहीं सुने हैं, किन्तु (उनकी) सम्भावना करके दोष देंगे, इससे (उन विकल्पों का) परोक्षत्व (सिद्ध) होता है । जो भविष्य में होने वाली वस्तु है, उसमें दोष तो दिया नहीं जा सकता, क्योंकि वह सर्वथा उत्पन्न ही नहीं है । अगर कहें कि बुद्धि में आरोपित करके दोष देंगे तो बुद्धि में आरोपित होने के ही कारण भविष्य में होने की बात नहीं बनती । अतः भूतकाल के उन्मेष से, परोक्षत्व के कारण और विशिष्ट (कालविशेष रूप.) अद्यतनत्व के प्रतिभान के न होने के कारण 'लिट् लकार' से प्रयोग किया है— जगदुरिति¹-। अनेक हों। इस पर लोचनकार का कहना है कि यद्यपि बुध 'काव्यतत्त्ववेत्ता' ही यहाँ विवक्षित है, किन्तु सही बात एक मुख से न निकलकर अनेक मुख से कही जाय तो उसकी प्रामाणिकता और भी पुष्ट हो जाती है, दूसरे, किञ्चित् प्रमाद होने की सम्भावना भी जाती रहती है । साथ ही, अन्य शब्द का प्रयोग न करके 'बुध' के प्रयोग का यह तात्पर्य है कि अत्यन्त जड प्रकृति के लोग अगर बहुत भी हों और एक ही बात को कहते हों तब भी उनकी बात आदरणीय नहीं होती, यहाँ ऐसी स्थिति नहीं । बल्कि 'ध्वनि' को 'काव्य का आत्मा' उन लोगों ने स्वीकार किया है जो काव्यतत्त्व के पूर्ण जानकार हैं, बुध हैं तथा एक परम्परा (अविच्छिन्न-प्रवाह) से इस सिद्धान्त को समाम्नात करते आ रहे हैं। इस सिद्धान्त के समर्थन में । बुद्धजनों का कथन इस प्रकार व्यापक था कि किसी ने इसके लेखन का अनावश्यक श्रम स्वीकार नहीं किया। वह बात, जो साक्षात् उपदेशसिद्ध है, लिखकर व्यक्त करने का क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? यह भी आकलनीय है कि अनेक बुध जन किसी अनादरणीय वस्तु का आदर के साथ उपदेश किसी भी अवस्था में नहीं कर सकते। प्रस्तुत ध्वनितत्त्व का उपदेश उन्होंने आदर के साथ किया है, सम्यगाम्नात किया है। यह भी उसके प्रामाणिक और आदरणीय होने का जबर्दस्त तर्क है । १. मूल कारिका-ग्रन्थ 'तस्याभावं जगदुरपरे' के 'जगदुः' इस लिट् लकार के प्रयोग पर विचार करते हैं। व्याकरण-शास्त्र के अनुसार 'लिट्' का प्रयोग भूतानद्यतनपरोक्ष के अर्थ में होता है, अर्थात् क्रिया के बहुत पहले परोक्ष भूतकाल में होने पर लिट् लकार प्रयुक्त होता है । प्रस्तुत में, ध्वनि के अभाववाद का सिद्धान्त भी बहुत पहले भूतकाल में परोक्ष रूप से सम्भावित किया गया है, अतः आचार्य ने 'जगदुः' यह लिट् लकार का प्रयोग किया है (मैंने हिन्दी की प्रकृति में 'लिट्' लकार के कथञ्चित् अनुरूप प्रयोग 'जगदुः' के अनुवाद के रूप में 'कहा' लिखा है) । परोक्षत्व की पुष्टि के लिए सम्भावना के समर्थन में लोचनकार ध्वनिवादी आचार्य की ओर से लिखते हैं कि हमने ध्वनि के अभाव पक्ष को नहीं सुना है, इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि सर्वथा यह विकल्प कभी मौजूद ही नहीं था, ऐसी स्थिति में सम्भावना का आश्रय लेकर उन्हें उद्धृत किया गया है तथा उनमें दोष बताये गये हैं। इस प्रकार सम्भावित
प्रथम उद्योतः १३ लोचनम् तद्व्याख्यानायैव सम्भाव्य दूषणं प्रकटयिष्यति । सम्भावनाऽपि नेयमसम्भ- वतो युक्ता, अपि तु सम्भवत एव, अन्यथा सम्भावनानामपर्यवसानं स्यात् दूषणानां च । अतः सम्भावनामभिधापयिष्यमाणां समर्थयितुं पूर्वं सम्भवन्ती- त्याह । सम्भाव्यन्त इति तूच्यमानं पुनरुक्तार्थमेव स्यात् । न च सम्भवस्यापि सम्भावना, अपि तु वर्तमानतैव स्फुटेति वर्तमानेनैव निर्देशः । ननु च सम्भ- वद् वस्तुमूलया सम्भावनया यत्सम्भावितं तद् दूषयितुमशक्यमित्याशङ्क्याह- विकल्पा इति । न तु वस्तु सम्भवति तादृक् यत इयं सम्भावना, अपि तु उस (लिट्) के व्याख्यान के लिये ही (ग्रन्थकार) सम्भावना करके दोष प्रकट करेंगे । यह सम्भावना भी, जो सम्भव नहीं हो रहा है उसकी, नहीं बनती, अपितु सम्भव होते हुये की ही सम्भावना बनती है, अन्यथा¹ सम्भावनाओं का और दोषों का कभी अन्त ही न हो । अतः (ग्रन्थकार) आगे अभिहित कराई जाने वाली सम्भावना के समर्थन के लिये पहले 'सम्भव हो सकते हैं' यह कहते हैं। यदि 'सम्भा- वित होते हैं' ऐसा कहते तो पुनरुक्तार्थ ही² होता, सम्भव पदार्थ की सम्भावना नहीं होती, अपितु उसका वर्तमान होना ही स्पष्ट है, अतः वर्तमान से ही निर्देश किया है । सम्भव होते हुये वस्तुमूल वाली सम्भावना से जो सम्भावित है उसे दूषित करना शक्य नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—विकल्प—उस³ प्रकार की वस्तु सम्भव नहीं है होने के कारण ध्वनि के अभाव-विकल्प का परोक्ष होना उपपन्न हो जाता है । बुद्ध्यारोपित करके सम्भावना को अविषय नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि बुद्ध्यारोपित वही विषय हो सकता है जो भूत में हो, न कि भविष्य में । स्वयं वृत्तिकार ने 'जगदुः' के स्थान पर आगे ही अभाववाद का उपन्यास करते हुए 'आचक्षीरन्' यह सम्भावनार्थक 'लिङ्' का प्रयोग किया है, साथ ही 'सम्भवन्ति' का भी प्रयोग करते हैं। १. यदि यहाँ यही पक्ष स्वीकार्य हो जाय कि सम्भावना असम्भव की होती है तो सम्भावनाओं का कोई पर्यवसान या कोई हद नहीं मिलेगी । और दोषों की भी स्थिति वही होगी । इसलिए सम्भावना उसीकी होती है जो सम्भव होता है, यही सिद्धान्त पक्ष है । इसी कारण वृत्तिकार स्वयं 'सम्भवन्ति' शब्द से सम्भावना का अभिधान कर देते हैं, ताकि ऐसी कोई समस्या उपस्थित न हो । २. वृत्तिकार 'हो सकते हैं' (सम्भवन्ति) कहकर आगे 'आचक्षीरन्' के पश्चात् वक्ष्यमाण सम्भावना का समर्थन करते हैं। तात्पर्य यह कि जो सम्भव है उसीकी सम्भावना हो सकती है, अर्थात् सम्भव सम्भावना का मूल या विषय होता है। ऐसी स्थिति में, यदि 'सम्भावित होते हैं' [सम्भाव्यन्ते] कह देते तो जो सम्भावना [आगे 'आचक्षीरन्' के रूप में] अभिहित होने वाली है वह यहीं उक्त हो जायगी और इस प्रकार पुनरुक्ति होगी । 'सम्भावित होते हैं' का स्पष्ट अर्थ है कि सम्भावना किये जाते हैं । दूसरे, इसके समर्थन में यह कहना भी गलत होगा कि 'सम्भव' की भी सम्भावना क्यों नहीं कर लेते हैं ? बल्कि उस सम्भव का वर्तमान होना ही स्पष्ट है, इसी कारण वृत्तिकार ने उसे वर्तमान रूप (लट् लकार-सम्भवन्ति) से निर्देश किया है । ३. ऊपर जब यह निर्णय हो गया कि सम्भावना सम्भव की ही होती है तब प्रस्तुत में यह आशङ्का होती है कि जो वस्तु सम्भव है उसमें दोष देना कहाँ तक उचित होगा, अर्थात् प्रस्तुत में,
१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् विकल्पा एव। ते च तत्त्वावबोधवन्ध्यतया स्फुरेयुरपि, अत एव 'आचक्षीरन्' इत्यादयोऽत्र सम्भावनाविषया लिङ्प्रयोगा अतीतपरमार्थे पर्यवस्यन्ति। यथा— यदि नामास्य कायस्य यदन्तस्तद्बहिर्भवेत्। दण्डमादाय लोकोऽयं शुनः काकांश्च वारयेत्॥ इत्यत्र। यद्येवं कायस्य दृष्टता स्यात्तदैवमवलोकयेतेति भूतप्राणतैव। यदि न स्यात्ततः किं स्यादित्यत्रापि, किं वृत्तं यदि पूर्ववन्न भवनस्य सम्भावनेत्यय- मेवार्थ इत्यलमप्रकृतेन बहुना। तत्र समयोपेक्षेण शब्दोऽर्थप्रतिपादक इति कृत्वा वाच्यव्यतिरिक्तं नास्ति व्यङ्ग्यम्, सदपि वा तदभिधावृत्त्याक्षिप्तं शब्दा- वगताथर्बलाकृष्टत्वाद्भाक्तम्, तदनाक्षिप्तमपि वा न वक्तुं शक्यं कुमारीष्विव भर्तृसुखमतद्वित्सु इति त्रय एवैते प्रधानविप्रतिपत्तिप्रकाराः। तत्राभावविकल्पस्ये जिस कारण यह सम्भावना होगी अपितु विकल्प ही हैं। और, वे (विकल्प) तत्त्व के ज्ञान के न होने के कारण ही स्फुरित होते हैं, अतएव 'आचक्षीरन्' इत्यादि यहाँ सम्भावनाविषयक लिङ् के प्रयोग अतीतपरमार्थ में पर्यवसित होते हैं। जैसे— 'यदि इस शरीर के जो भीतर है वह बाहर हो जाय तो यह संसार डंडा लेकर कुत्तों और कौओं को ही डुलाता रहे।' इस स्थल में। यदि शरीर इस प्रकार दृष्टिगोचर होता तो ऐसा देखा जाता— इस प्रकार (यहाँ भी) अतीतपरमार्थता ही है। 'यदि न होता तो क्या होता' इस स्थल में भी; क्या होता यदि पहले की तरह (बाहर) नहीं होने की सम्भावना है (इस प्रकार निषेध पक्ष में भी) यही अर्थ है। बहुत अप्रकृत चर्चा व्यर्थ है। समय (संकेत) की अपेक्षा से शब्द अर्थ का प्रतिपादक होता है, इस कारण वाच्य से अतिरिक्त कोई व्यङ्ग्य नहीं है, होता हुआ भी वह अभिधावृत्ति से आक्षिप्त होकर, शब्द से अवगत अर्थ के बल से आकृष्ट होने के कारण भाक्त (गौण) है, वह आक्षिप्त न हुआ भी किसी प्रकार वाणी से कहा नहीं जा सकता, क्वारियों के लिये पति के सुख के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं, इस प्रकार तीन ही ये विप्रतिपत्ति के प्रधान जब कि 'ध्वनि' के विरुद्ध पक्ष सम्भव हैं तब उनमें दोष दिखाना ठीक नहीं होगा, इस आशङ्का के उत्तर में वृत्तिकार 'विकल्प' शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसा कि लोचनकार कहते हैं : 'उस प्रकार की वस्तु सम्भव नहीं जिससे सम्भावना होगी, अपितु विकल्प ही (सम्भव) हैं' इसका तात्पर्य यह है कि प्रस्तुत में जो वस्तु सम्भावना से सम्भावित है वह यहाँ अभिप्रेत नहीं, बल्कि वह अभिप्रेत है जो तत्त्वज्ञान के अभाव में उभर आई है, अर्थात् 'विकल्प' रूप वस्तु यहाँ सम्भावना कर के दूषणीय हैं और उन्हें ही यहाँ 'सम्भव' कहा गया है--वह तो दूषणीय हो ही सकती हैं। १. 'जगदुः' का व्याख्यान 'आचक्षीरन्' इस लिङ् के प्रयोग से करने से प्रतीत होता है कि सम्भावना के रूप में बुद्ध्यारोपित रूप अतीत (भूत) के तात्पर्य में उन (लिङ् प्रयोगों) का पर्यवसान है। अर्थात् 'ऐसा कुछ लोगों ने कहा हो' ऐसी सम्भावना को बुद्धि में आरोपित करते हैं। इस प्रकार अतीत परमार्थ में लिङ्-प्रयोगों के पर्यवसान में इस विचार का लोचनकार एक उदाहरण देते हैं—यदि इस०—। यहाँ अतीतपरमार्थता इस कारण है कि शरीर के भीतरी भाग के बहिर्भाव को सम्भावना का विषय करके बुद्धि में आरोपित किया गया है और यह निर्विवाद ही
प्रथम उद्योतः १५ लोचनम् त्रयः प्रकाराः-शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दार्थशोभाकारित्वाल्लोकशास्त्रातिरि- क्तसुन्दरशब्दार्थमयस्य काव्यस्य न शोभाहेतुः कश्चिदन्योऽस्ति योऽस्माभिर्न गणित इत्येकः प्रकारः, यो वा न गणितः स शोभाकार्येव न भवतीति द्वितीयः, अथ शोभाकारी भवति तर्ह्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलङ्कारे वाऽन्तर्भवति, नामान्त- रकरणे तु कियदिदं पाण्डित्यम् । अथाप्युक्तेषु गुणेष्वलङ्कारेषु वा नान्तर्भावः, तथापि किंचिद्विशेषलेशमाश्रित्य नामान्तरकरणमुपमाविच्छित्तिप्रकाराणामसंख्यत्वात् । तथापि गुणालङ्कारव्यति- रिक्तत्वाभाव एव । तावन्मात्रेण च किं कृतम् ? अन्यस्यापि वैचित्र्यस्य शक्यो- प्रकार हैं। उनमें अभाव-विकल्प के तीन प्रकार हैं-शब्दगुण और अर्थगुण एवं शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कारों के ही शब्द और अर्थ के शोभाकारी होने से लोक और शास्त्र से अतिरिक्त शब्दार्थमय काव्य का शोभाहेतु कोई दूसरा नहीं है, जिसकी हमने गणना नहीं की है, यह (अभाव-विकल्प का) एक प्रकार है; और जिसकी (हमने) गणना नहीं की है वह शोभाकारी ही नहीं होगा, यह दूसरा (विकल्प) है; और वह शोभाकारी होता है तो हमारे कहे हुए ही गुण अथवा अलङ्कार में अन्तर्भूत हो जाता है। केवल दूसरा नाम बदल देने में यह कितना पाण्डित्य है ! माना कि उक्त गुणों अथवा अलङ्कारों में अन्तर्भाव नहीं है, तथापि कुछ विशेष के लेशमात्र को आश्रयण करके नामान्तरकरण है; क्योंकि उपमा के ही वैचित्र्य- (विच्छित्ति-) प्रकार ही असंख्य हैं। तथापि गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्तत्व (उस शोभाकारी तत्त्व का) नहीं बनता। और उतने मात्र से क्या होता है ! क्योंकि है कि जो वस्तु बुद्ध्यारोपित कर ली जाती है उसमें अतीतत्व आ ही जाता है। लोचनकार इस प्रकार विधिरूप से अतीतपरमार्थत्व का निर्देश करके निषेधरूप से भी निर्देश करते हुए लिखते हैं-‘यदि न होता तो भी क्या होता'; अर्थात् उस प्रकार शरीर के भीतरी भाग के बाहर होने की सम्भावना न होती तो भी क्या होता, तात्पर्य यह कि तथापि शरीर जुगुप्सा और घृणा का पात्र बना ही रहता। सर्वथा शरीर के प्रति आसक्ति के निषेध में इस पद्य का पार्यन्तिक तात्पर्य निहित है। इस प्रकार यहाँ विधि और निषेध दोनों प्रकारों से 'लिङ्' का अर्थ सम्भावना है। 'लिङ्' के सम्भावना रूप अर्थ का प्रतिपादन प्रस्तुत ग्रन्थ के मूल विषय से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। यह केवल लिट्प्रयोग का लिङ्प्रयोग से आचार्य द्वारा किए गए व्याख्यान के समर्थन में लोचनकार ने प्रपञ्चित किया है, अतः स्वयं यह कहते हुए विरत होते हैं कि बहुत अप्रस्तुत चर्चा व्यर्थ है। १. यहाँ लोचनकार ने ध्वनि के सम्बन्ध में मूल कारिकाग्रन्थ में निर्दिष्ट तीन विकल्पों का संक्षेप में पहले इस प्रकार निर्देश किया है :-प्रथम अभाववादी विकल्प-इसके अनुसार 'ध्वनि' कोई तत्त्व नहीं; क्योंकि शब्द से उसी अर्थ का प्रतिपादन होता है जो संकेतित होता है, अर्थात् समय या संकेत के बल या सहकार से ही शब्द अर्थ का प्रतिपादक होता है और वह अर्थ 'वाच्य' कहलाता है। इसके अतिरिक्त जब शब्द का कोई अर्थ नहीं होता तब एक 'व्यङ्ग्य अर्थ' की कल्पना गलत पक्ष होगा। इस प्रकार सर्वथा 'ध्वनि' कोई तत्त्व नहीं। द्वितीय भाक्तवादी विकल्प- इसके अनुसार किसी प्रकार तथाकथित 'व्यङ्ग्य' अर्थ मान भी लिया जाय तो यह कहना होगा
१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्प्रेक्षत्वात्। चिरन्तनैर्हि भरतमुनिप्रभृतिभिर्यमकोपमे एव शब्दार्थालङ्कारत्वेनेष्टे, तत्प्रपञ्चदिक्प्रदर्शनं त्वन्यैरलङ्कारकारैः कृतम्। तद्यथा-'कर्मण्यण्' इत्यत्र कुम्भ- काराद्युदाहरणं श्रुत्वा स्वयं नगरकारादिशब्दा उत्प्रेक्ष्यन्ते, तावता क आत्मनि बहुमानः। एवं प्रकृतेऽपीति तृतीयः प्रकारः। एवमेकस्त्रिधा विकल्पः, अन्यौ च द्वाविति पञ्च विकल्पा इति तात्पर्यार्थः। दूसरे वैचित्र्य की भी तो उत्प्रेक्षा हो सकती है? जैसा कि प्राचीन भरतमुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार के रूप में माना है, उनके प्रपंच की दिशा का प्रदर्शन तो दूसरे अलङ्कारकारों ने किया। वह जैसे— 'कर्मण्यण्' इस सूत्र में 'कुम्भकार' आदि उदाहरण को सुनकर स्वयं 'नगरकार' आदि शब्दों की उत्प्रेक्षा कर ली जाती है, केवल उतने से, कौन अपने में बहुत गौरव की बात है? इस प्रकार प्रस्तुत में भी, यह (अभाव-विकल्प का) तीसरा प्रकार' है। इस प्रकार एक विकल्प तीन प्रकार का और दूसरे दो विकल्प मिलकर पाँच विकल्प हैं, यह तात्पर्यार्थ है। अभिधावृत्ति से आक्षिप्त ('बालप्रिया' टिप्पणी के अनुसार अभिधा की पुच्छभूत वृत्ति अर्थात् लक्षणा से आक्षिप्त) होता है। इस प्रकार शब्द से अवगत अर्थ के बल से आकृष्ट होने के कारण 'भाक्त' (या गौण) है। तृतीय अलक्षणीयतावादी विकल्प—किसी प्रकार ('तुष्यतु दुर्जनः' इस न्याय से) उस व्यङ्ग्य अर्थ को लक्षणाशक्ति से आक्षिप्त न भी माना जाय, तथापि उसे शब्द से कहना सम्भव नहीं, वह उस प्रकार जैसे कुमारियों के लिए पति का सुख कहना सम्भव नहीं। १. अब यहाँ अभाव-विकल्प के वृत्तिग्रन्थ में निर्दिष्ट तीन प्रकारों का संक्षेप में लोचनकार ने उपर्युक्त ढंग से निर्देश किया है। अभाव विकल्प के प्रथम प्रकार में यह कहा जाता है कि काव्यशरीर शब्दार्थमय होता है और गुण तथा अलंकार शब्द-और अर्थ के शोभाकारी तत्त्व के रूप में निर्दिष्ट किए गए हैं। इनके अतिरिक्त कोई ऐसा शोभाकारी तत्त्व ही नहीं सम्भव है जिसकी हमने गणना नहीं की है। अभाव विकल्प के दूसरे प्रकार में यह कहते हैं कि जिसकी हमने गणना नहीं की है वह किसी प्रकार शोभाकारी ही नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में, गुण और अलंकार के अतिरिक्त किसी अन्य तत्त्व की चर्चा करने का यहाँ कोई अर्थ ही नहीं निकलेगा। अभाव विकल्प के तृतीय प्रकार के अनुसार यदि ऐसा कोई शोभाकारी तत्त्व मान भी लिया जाय, तब भी उसका गुण तथा अलङ्कार में ही अन्तर्भाव हो जायगा, यदि लेशमात्र भिन्न कुछ विशेषता के कारण उक्त गुण तथा अलङ्कार में उस शोभाकारी तत्त्व का अन्तर्भाव न हुआ तो हम यह स्वीकार करेंगे उपमा आदि के असङ्ख्य विच्छित्ति-प्रकारों में यह भी होगा। फिर ऐसी स्थिति में कोई प्रश्न नहीं उठता जिसके समाधानार्थ किसी भिन्न ही शोभाकारी तत्त्व की कल्पना की जाय। यही क्या, बहुत से अन्य वैचित्र्यों की भी कल्पना की जा सकती है। जैसा कि प्राचीन आलङ्कारिक आचार्यों ने किया भी है। सबसे प्राचीन भरत मुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्द और अर्थ के अलङ्कार रूप से स्वीकार किया था, और फिर बाद में अन्य आलङ्कारिकों ने इस विषय को और भी प्रपञ्चित करके निर्दिष्ट किया। किसी ने अभी तक किसी भिन्न नये तत्त्व की उद्भावना का डिण्डिमघोष नहीं किया है, जैसा कि यहाँ 'ध्वनि' को लेकर किया जा रहा है। यह तो कुछ वैसी ही बात हुई कि किसी 'सूत्र' के निर्दिष्ट उदाहरण के आधार पर कोई दूसरा उदाहरण बना लिया गया (जैसे 'कुम्भकार' को देखकर नगरकार आदि)। इस
प्रथम उद्योतः १७ ध्वन्यालोकः तत्र केचिदाचक्षीरन्—शब्दार्थशरीरन्तावत्काव्यम् । तत्र च शब्द- गताश्चारुत्वहेतवोऽनुप्रासादयः प्रसिद्धा एव । अर्थगताश्चोपमादयः । वर्णसंघटनाधर्माश्च ये माधुर्यादयस्तेऽपि प्रतीयन्ते । तदनतिरिक्तवृत्तयो वृत्तयोऽपि याः कैश्चिदुपनागरिकाद्याः प्रकाशिताः, ता अपि गताः श्रवणगोचरम् । रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः । तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनि- र्नामेति । वहाँ कुछ लोग कहें—काव्य का शरीर तो शब्द और अर्थ है, और, उसमें शब्दगत चारुत्वहेतु अनुप्रास आदि प्रसिद्ध ही हैं और अर्थगत उपमा आदि ( प्रसिद्ध ही हैं ) । और, वर्णसंघटनधर्म जो माधुर्य आदि ( गुण ) हैं वे भी प्रतीत होते हैं । उन ( अलंकार और गुणों ) से अभिन्न रहने वाली वृत्तियाँ भी, जो किन्हीं के द्वारा उपनागरिका आदि ( नामों से ) प्रकाशित की गई हैं, वे भी सुनने में आई हैं और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ भी ( सुनने में आई हैं ) । उनके अतिरिक्त कौन यह ‘ध्वनि’ नाम का ( नया पदार्थ ) है ? लोचनम् तानेव क्रमेणाह—शब्दार्थशरीरं तावदित्यादिना । तावद्ग्रहणेन कस्याप्यत्र न विप्रतिपत्तिरिति दर्शयति । तत्र शब्दार्थौ न तावद् ध्वनिः, यतः संज्ञामात्रेण उन्हीं ( विकल्पों ) को क्रम से कहते हैं—काव्य का शरीर शब्द और अर्थ है इत्यादि द्वारा । ( मूल-वृत्तिग्रन्थ में ) ‘तावत्’ इस शब्द के ग्रहण से दिखाते हैं कि यहाँ किसी की भी विप्रतिपत्ति ( विरुद्ध आशङ्का ) नहीं १ है । शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है, क्योंकि संज्ञामात्र २ से क्या लाभ ? यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !; मात्र से यह गौरव का अनुभव करना कि हमने नई कल्पना की, अत्यन्त उपहसनीय बात है । यहाँ लोचनकार ने ‘विच्छित्ति’ और ‘वैचित्र्य’ का प्रयोग किया है, ये शब्द एक ही अर्थ के द्योतक हैं, अलङ्कारों का भेद-निर्णय विशेष रूप से विच्छित्ति या वैचित्र्य के आधार पर ही साहित्य-शास्त्र में किया गया है । १. अर्थात् सभी लोग इस सिद्धान्त के पक्षपाती हैं कि शब्द और अर्थ ही काव्य के शरीर हैं लोचनकार का कहना है कि यह तात्पर्य वृत्तिग्रन्थ में प्रयुक्त ‘तावत्’ शब्द से प्रकट होता है । यह भिन्न बात है कि आगे चलकर किसी आचार्य ने विशिष्ट शब्द को ही काव्य माना है और किसी ने विशिष्ट अर्थ को । कुछ आचार्यों ने शब्द-अर्थ उभय को काव्य माना है । इस प्रकार काव्य-स्वरूप के सम्बन्ध में विभिन्न मतवादों के बावजूद भी, प्रायः काव्य के शरीर के रूप में शब्द और अर्थ को सभी ने स्वीकार किया है । २. ध्वनि या व्यङ्ग्य तत्त्व का प्रतिपादन सर्वथा काव्य के आत्मा के रूप में अभीष्ट है अतः काव्य के शरीरभूत शब्द और अर्थ तो किसी प्रकार ‘ध्वनि’ नहीं कहला सकते, क्योंकि यह पक्ष स्वयं ध्वनिवादी आचार्य के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध होगा । ऐसी स्थिति में भी यदि ‘ध्वनि’ के २ ध्व०
· १८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् हि को गुणः ? अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः । तथापि द्विविधं चारुत्वम्— स्वरूपमात्रनिष्ठं संघटनाश्रितं च । तत्र शब्दानां स्वरूपमात्रकृतं चारुत्वं शब्दालङ्कारेभ्यः, संघटनाश्रितं तु शब्दगुणेभ्यः । एवमर्थानां चारुत्वं स्वरूप- मात्रनिष्ठमुपमादिभ्यः । संघटनापर्यवसितं त्वर्थगुणेभ्य इति न गुणालङ्कारव्य- तिरिक्तो ध्वनिः कश्चित् । संघटनाधर्मा इति । शब्दार्थयोरिति शेषः । यद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तं तच्चा- तथापि, चारुत्व' दो प्रकार का होता है—स्वरूपमात्रनिष्ठ और संघटनाश्रित । शब्दों का स्वरूपमात्रकृत चारुत्व शब्दालङ्कारों से और संघटनाश्रित (चारुत्व) शब्दगुणों से (होता है)। इस प्रकार अर्थों का स्वरूपमात्रनिष्ठ चारुत्व उपमादि (अर्थालङ्कारों) से और संघटना में पर्यवसित (चारुत्व) अर्थगुणों से (होता है), इस प्रकार गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त कोई ध्वनि नहीं है । संघटनाधर्म—। 'शब्द और अर्थ के' यह शेष है । जो गुण और अलङ्कार से सद्भाव के प्रति श्रद्धाजाड्य के कारण शब्द-अर्थ को ही 'ध्वनि' संज्ञा देते हों तो यह प्रयास भी व्यर्थ होगा, अर्थात् क्योंकि आत्मा को शरीर का रूप देकर कब तक आत्मा के सच्चे अस्तित्व का समर्थन किया जा सकता है ? १. जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का जिससे 'चारुत्व' हो वह (अर्थात् चारुत्व का हेतु) ध्वनि हो ही सकता है यह पक्ष अभ्युपगम करके अभाववादी का कहना है कि ऐसी स्थिति में चारुत्व-हेतु ध्वनि तत्त्व निर्दिष्ट शब्दालङ्कार-अर्थालङ्कार एवं शब्दगुण-अर्थगुण के अतिरिक्त कोई तत्त्व नहीं सिद्ध होता, क्योंकि शब्द और अर्थ के चारुत्व का विभाजन दो ही भागों में किया जा सकता है एक तो स्वरूप के दृष्टिकोण से, दूसरा सङ्घटना के आधार पर । इसे इस प्रकार समझ सकते हैं— चारुत्व | ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ स्वरूपमात्रनिष्ठ सङ्घटनाश्रित ┌───────────┴───────────┐ ┌───────────┴───────────┐ शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व ( शब्दालङ्कारों से ) ( अर्थालङ्कारों से ) ( शब्दगुणों से ) ( अर्थगुणों से ) [ उपर्युक्त लोचन में जहाँ 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' लिखा है वहाँ सामान्यतः अनुवाद यही होगा कि 'यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !' परन्तु ऐसा ही समझ लेने पर यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का चारुत्व ध्वनि हो सकता है । इस भ्रम से गड़बड़ी यह होती है कि जब इस चारुत्व को यहाँ ध्वनि स्वीकार कर लेते हैं तब आगे चलकर अलङ्कार और गुण, जो स्वयं चारुत्व न होकर चारुत्व के हेतु हैं, उनमें अन्तर्भाव विज्ञात चारुत्व रूप ध्वनि का करने लग जाते हैं । यह न तो मूल का अभीष्ट है न लोचनकार का । इस प्रकार इस भ्रम के निवारणार्थ, जैसा कि 'बालप्रिया' में भी लिखा है, 'लोचन' के उपर्युक्त वाक्य 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' में 'यतश्चारुत्वम्, अर्थात् यश्चारुत्वहेतुः,
प्रथम उद्योतः १९ लोचनम् रुत्वकारि न भवति, नित्यानित्यदोषा असाधुदुःश्रवादय इव । चारुत्वहेतुश्च ध्वनिः, तन्न तद्व्यतिरिक्त इति व्यतिरेकी हेतुः । ननु वृत्तयो रीतयश्च यथा गुणालङ्कारव्यतिरिक्ताश्चारुत्वहेतवश्च, तथा ध्वनिरपि तद्व्यतिरिक्तश्च चारुत्व- हेतुश्च भविष्यतीत्यसिद्धो व्यतिरेक इत्यनेनाभिप्रायेणाह—तदनतिरिक्तवृत्तय इति । नैव वृत्तिरीतीनां तद्व्यतिरिक्तत्वं सिद्धम् । तथा ह्यनुप्रासानामेव दीप्तम- सृणमध्यमवर्णनीयोपयोगितया परुषत्वललितत्वमध्यमत्वस्वरूपविवेचनाय वर्गत्रयसम्पादनार्थं तिस्रोऽनुप्रासजातयो वृत्तय इत्युक्ताः, वर्तन्तेऽनुप्रासभेदा आस्विति । यदाह— व्यतिरिक्त है वह चारुत्वकारी नहीं है, जैसे असाधु और दुःश्रव आदि नित्य-अनित्य दोष । और, ध्वनि चारुत्व का हेतु है अतः वह उनसे व्यतिरिक्त नहीं, यह व्यतिरेकी हेतु¹ है। शङ्का करते हैं कि वृत्तियाँ और रीतियाँ जैसे गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त हैं और साथ ही चारुत्व के हेतु हैं, उसी प्रकार ध्वनि भी गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त और चारुत्व का हेतु होगा । इस प्रकार व्यतिरेक असिद्ध है, इस अभिप्राय से कहते हैं—उनसे अभिन्न रहने वाली—। वृत्तियों और रीतियों का उनसे व्यतिरिक्तत्व सिद्ध² नहीं है । जैसा कि अनुप्रासों के ही दीप्त, मसृण और मध्यम वर्णनीयों की उपयोगिता के अनुसार परुषत्व, ललितत्व और मध्यमत्व ! स्वरूप के विवेचन के लिए तीन वर्गों के सम्पादनार्थ तीन अनुप्रास³-जातियां 'वृत्तियां' कही गई हैं, अर्थात् 'वर्तमान हैं अनुप्रास के भेद इनमें' । क्योंकि कहते हैं— स ध्वनिः' इतना बढ़ाकर पहले ही संगतार्थ कर लेना चाहिए । इस प्रकार चारुत्व-हेतु रूप ध्वनि का चारुत्व-हेतु रूप गुण तथा अलङ्कारों में अन्तर्भाव बन जाता है, जो अभाववादी का पक्ष है ] । १. अभाववादी अपने उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए 'केवलव्यतिरेकी अनुमान' का यहाँ प्रयोग करता है । अनुमान के प्रसङ्ग में तीन प्रकार के लिङ्ग या हेतु न्यायशास्त्र में बताये गये हैं—अन्वय- व्यतिरेकी, केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी । जहाँ केवल व्यतिरेक से व्याप्तिग्रह होता है वह केवलव्यतिरेकी हेतु होता है । जैसे, 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्' यहाँ कहा जायगा—'यद् इतरेभ्यो न भिद्यते न तद् गन्धवत्, यथा जलम् ।' इस प्रकार यहाँ व्यतिरेकदृष्टान्त जल होता है । 'यद् गन्धवत् तदितरभिन्नम्' यहाँ अन्वयदृष्टान्त नहीं प्राप्त हो सकता । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा, जैसा कि मेरे पूज्यपाद गुरुजी ( पं० महादेव शास्त्रीजी ) ने अपनी 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में निर्देश किया है—'ध्वनिः गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान्, चारुत्वहेतुत्वात्, यो हि गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति, यथा असाधुत्वदुःश्रवत्वादिको दोषः ।' २. जैसा कि व्यतिरेक बताया गया कि ऐसा कोई चारुत्व का हेतु नहीं जो गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है इसके विरुद्ध यह शङ्का है कि उपनागरिका प्रभृति वृत्तियाँ और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ तो अवश्य हैं जो गुण एवं अलङ्कार से भिन्न हैं एवं चारुत्व-हेतु हैं । इस परिस्थिति में उपर्युक्त व्यतिरेक कहाँ सिद्ध होता है ? इस आशङ्का के निवारणार्थ कहते हैं वृत्तियाँ और रीतियाँ गुण एवं अलङ्कार से भिन्न नहीं हैं। वह कैसे ? इसे स्वयं लोचनकार आगे की पंक्तियों में स्पष्ट करते हैं । ३. जैसा कि मूल वृत्तिग्रन्थ में वृत्तियों एवं रीतियों को अलङ्कार एवं गुण से अनतिरिक्तवृत्ति
२० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु । पृथक्पृथगनुप्रासमुशन्ति कवयः सदा ॥ इति ॥ पृथक्पृथगिति । परुषानुप्रासा नागरिका । मसृणानुप्रासा उपनागरिका, ललिता । नागरिकाया विदग्धया उपमितेति कृत्वा । मध्यममकोमलपरुष- मित्यर्थः । अत एव वैदग्ध्यविहीनस्वभावासुकुमारापरुषग्राम्यवनितासादृश्यादियं 'इन तीन वृत्तियों में सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों के उपनिबन्ध (के रूप में) पृथक् पृथक् अनुप्रास को सदा कवि लोग चाहते हैं।' पृथक् पृथक्- । परुष¹ अनुप्रास वाली (वृत्ति) नागरिका है, मसृण अनुप्रास वाली वृत्ति उपनागरिका या ललिता है। नागरिका या विदग्धा से उपमित, यह करके । मध्यम अर्थात् अकोमल एवं अपरुष । अत एव वैदग्ध्य से विहीन स्वभाव वाली होने के कारण असुकुमार एवं अपरुष ग्राम्य वनिता के सादृश्य से यह (तृतीया वृत्ति) अर्थात् इन्हें छोड़कर न टिकने वाली बताया है, उन्हीं में पहले यह सिद्ध करते हैं कि किस प्रकार वृत्तियाँ अनुप्रास अलङ्कार की आश्रयभूत जातियाँ हैं। वर्णनीय या वर्णन के विषय अपने स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं—दीप्त (तीव्रता या तीखापन लिए हुए, रौद्र आदि रस में), मसृण (अर्थात् मधुर, जैसे शृङ्गार आदि रस में), मध्यम (दोनों निर्दिष्ट स्वभाव के बीच के स्वभाव का वर्णनीय, जैसे हास्य आदि रस में)। इस प्रकार दीप्त के परुषत्व स्वरूप, मधुर के ललितत्व-स्वरूप एवं मध्यम के मध्यमत्व-स्वरूप के विवेचन के लिए अनुप्रास की तीन जातियाँ बताई गई हैं। इस प्रकार अनुप्रास इन वृत्तियों का आधारित अलङ्कार हैं। इसी कारण 'अनुप्रास' शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखते हैं—'वर्तन्ते अनुप्रासभेदा आसु' अर्थात् वर्तमान हैं अनुप्रास के भेद इनमें। इस तथ्य को लोचनकार ने आचार्य उद्भट के 'काव्यालङ्कार सारसंग्रह' से वचन (१. ८) उद्धृत करके प्रमाणित किया है। आचार्य उद्भट के अनुसार अनुप्रास में वृत्तियों के अनुसार सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों का उपनिबन्धन पृथक्-पृथक् रूप से कवियों का अभिप्रेत होता है, अर्थात् कवि लोग वर्णनीय वस्तु के स्वभाव के अनुसार शब्दचयन करने का प्रयत्न करते हैं। इसी प्रसङ्ग में आचार्य उद्भट ने अपने ग्रन्थ में तीन वृत्तियों में किस-किस प्रकार के सजातीय व्यञ्जन प्रयुक्त होते हैं, इसका निर्देश किया है— शषाभ्यां रेफसंयोगैष्टवर्गेण च योजिता । परुषा नाम वृत्तिः स्याद् ल्हह्लाद्यैश्च संयुता ॥ सरूपसंयोगयुतां मूर्ध्नि वर्गान्त्ययोगिभिः । स्पर्शैर्युतां च मन्यन्त उपनागरिकां बुधाः ॥ शेषैर्वर्णैर्यथायोगं कथितां कोमलाख्यया । ग्राम्यां वृत्तिं प्रशंसन्ति काव्येष्वादृतबुद्धयः ॥ (१. ५-७) इसके अनुसार वृत्तियों में निम्न प्रकार के व्यञ्जनों का प्रयोग होता है— परुषा—श, ष, रेफ के संयोग, टवर्ग, ल्ह, ह्ल, ह्य आदि । उपनागरिका—समानरूप वर्णों के संयोग, वर्ग के अन्त्य अक्षर से शिरोभाग में युक्त स्पर्श वर्ण (क से लेकर म तक के वर्ण)। कोमला अथवा ग्राम्या—यथायोग शेष वर्ण। १. निर्दिष्ट तीन प्रकार की वृत्तियों के नामकरण की सार्थकता का निर्देश करते हैं। वह वृत्ति 'नागरिका' कहलाती है जो परुष वर्णों से आरब्ध होने के कारण परुष अनुप्रास से युक्त होती है। 'परुषा' वृत्ति ही 'नागरिका' कहलाती है। मसृण या स्निग्ध वर्णों के अनुप्रास वाली वृत्ति 'उप- नागरिका' कहलाती है। इसे 'ललिता' भी कहते हैं। 'उपमिता नागरिकया उपनागरिका' इस
प्रथम उद्योतः २१ लोचनम् वृत्तिर्ग्राम्येति । तत्र तृतीयः कोमलानुप्रास इति वृत्तयोऽनुप्रासजातय एव । न चेह वैशेषिकवद् वृत्तिर्विवक्षिता, येन जातौ जातिमतो वर्तमानत्वं न स्यात्, तदनुग्रह एव हि तत्र वर्तमानत्वम् । यथाह कश्चित्— लोकोत्तरे हि गाम्भीर्ये वर्तन्ते पृथिवीभुजः । इति । तस्माद् वृत्तयोऽनुप्रासादिभ्योऽनतिरिक्तवृत्तयो नाभ्यधिकव्यापाराः । अत एव व्यापारभेदाभावान्न पृथगनुमेयस्वरूपा अपीति वृत्तिशब्दस्य व्यापारवा- चिनोऽभिप्रायः । अनतिरिक्तत्वादेव वृत्तिव्यवहारो भामहादिभिर्न कृतः । ग्राम्या है । वहाँ, तीसरा कोमलानुप्रास है । इस प्रकार वृत्तियां अनुप्रास की जातियां ही हैं । यहां वैशेषिक मत की भाँति वृत्ति (वर्तन, आधेयत्वरूप) विवक्षित नहीं है, जिससे जाति में जातिमान् का वर्तमानत्व न होगा, बल्कि उस (वृत्ति रूप जाति) द्वारा अनुग्रह ही वहां वर्तमानत्व है । जैसा किसी ने कहा है— 'लोकोत्तर गाम्भीर्य में राजा लोग रहते हैं' । इसलिए वृत्तियां अनुप्रासादि से अतिरिक्त होकर रहने वाली नहीं हैं एवं अधिक व्यापार वाली नहीं हैं। अत एव व्यापार के भेद के न होने के कारण पृथक् अनुमेय स्वरूप नहीं हैं, यह 'व्यापार' के वाची 'वृत्ति' शब्द का अभिप्राय है । अतिरिक्त न होने के कारण ही भामह आदि आचार्यों ने वृत्ति का व्यवहार नहीं किया । उद्भट आदि प्रकार इसकी संज्ञा अन्वर्थ है । 'मध्यमा' नाम की तृतीया वृत्ति 'ग्राम्या' इसलिए कहलाती है कि ग्राम्य वनिता की भाँति यह भी वैदग्ध्य-विहीन होती है, इसमें न तो सुकुमारता होती है और न परुषता ही । भट्ट उद्भट के अनुसार ग्राम्या वृत्ति की कोमल-संज्ञा भी है जो रूढ है । १. जैसा कि पहले ही से यह कहते आ रहे हैं कि वृत्तियाँ अनुप्रास की जातियाँ हैं और वृत्तियों के लक्षण में वृत्तियों को अनुप्रासों का आश्रय बनाया है; जैसे, जो वृत्ति परुष अनुप्रास को रखती है अर्थात् उसका आश्रयभूत है वह परुषा या नागरिका कहलाती है आदि और 'वर्तमान' हैं अनुप्रास के भेद इनमें' यह भी 'वृत्ति' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है । ऐसी स्थिति में, वैशेषिक- मत, जो जाति में जातिमान् का वर्तमानत्व नहीं स्वीकार करता, से स्पष्ट विरोध होता है (क्यों कि वृत्ति रूप जाति में जातिमान् अनुप्रास का वर्तमानत्व उपपन्न नहीं है) । इस पर लोचनकार लिखते हैं कि प्रस्तुत में वृत्ति या आधेयत्व रूप वर्तन वैशेषिकमतानुसार विवक्षित ही नहीं है बल्कि वहाँ वर्तमानत्ववृत्तिरूप-जातिकर्तृक अनुग्रह ही है। वृत्तियों को 'जाति' इसी लिए कहा है कि वे गवादि से गोत्वादि जातियों की भाँति परुषत्वादि-विशिष्ट अनुप्रासों से अभिव्यक्त होती हैं। 'वृत्ति रूप जाति के द्वारा अनुग्रह' का स्पष्टीकरण यह है कि वृत्तियों के कारण ही अनुप्रास में परुषत्वादिभेदक धर्म एवं रसाभिव्यञ्जन की सामर्थ्य उत्पन्न होती है। इस प्रकार वृत्तियाँ अनुप्रासों के प्राणभूत तत्त्व हैं, अतः वे अनुप्रास की जातियाँ करके मानी गई हैं। यह अनुग्रह उसी प्रकार का है जैसे, 'लोकोत्तर गाम्भीर्य में राजाओं का वर्तमान होना' है। यहाँ गाम्भीर्यकर्तृक अनुग्रह है, बिना 'गाम्भीर्य' के राजा लोग कोई काम नहीं कर सकते। 'गाम्भीर्य' वह भाव है, जिसके प्रभाव से कोई विकार नहीं उत्पन्न होता । इस प्रकार पार्यन्तिक वक्तव्य यह है कि जो रसाभिव्यञ्जनविषयक व्यापार अनुप्रास आदि का है वही वृत्तियों का है। ऐसी स्थिति में वृत्तियों का पृथक् रूप से पूर्वोक्त अनुमान सिद्ध नहीं होता है ।