ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १७ ध्वन्यालोकः तत्र केचिदाचक्षीरन्—शब्दार्थशरीरन्तावत्काव्यम् । तत्र च शब्द- गताश्चारुत्वहेतवोऽनुप्रासादयः प्रसिद्धा एव । अर्थगताश्चोपमादयः । वर्णसंघटनाधर्माश्च ये माधुर्यादयस्तेऽपि प्रतीयन्ते । तदनतिरिक्तवृत्तयो वृत्तयोऽपि याः कैश्चिदुपनागरिकाद्याः प्रकाशिताः, ता अपि गताः श्रवणगोचरम् । रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः । तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनि- र्नामेति । वहाँ कुछ लोग कहें—काव्य का शरीर तो शब्द और अर्थ है, और, उसमें शब्दगत चारुत्वहेतु अनुप्रास आदि प्रसिद्ध ही हैं और अर्थगत उपमा आदि ( प्रसिद्ध ही हैं ) । और, वर्णसंघटनधर्म जो माधुर्य आदि ( गुण ) हैं वे भी प्रतीत होते हैं । उन ( अलंकार और गुणों ) से अभिन्न रहने वाली वृत्तियाँ भी, जो किन्हीं के द्वारा उपनागरिका आदि ( नामों से ) प्रकाशित की गई हैं, वे भी सुनने में आई हैं और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ भी ( सुनने में आई हैं ) । उनके अतिरिक्त कौन यह ‘ध्वनि’ नाम का ( नया पदार्थ ) है ? लोचनम् तानेव क्रमेणाह—शब्दार्थशरीरं तावदित्यादिना । तावद्ग्रहणेन कस्याप्यत्र न विप्रतिपत्तिरिति दर्शयति । तत्र शब्दार्थौ न तावद् ध्वनिः, यतः संज्ञामात्रेण उन्हीं ( विकल्पों ) को क्रम से कहते हैं—काव्य का शरीर शब्द और अर्थ है इत्यादि द्वारा । ( मूल-वृत्तिग्रन्थ में ) ‘तावत्’ इस शब्द के ग्रहण से दिखाते हैं कि यहाँ किसी की भी विप्रतिपत्ति ( विरुद्ध आशङ्का ) नहीं १ है । शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है, क्योंकि संज्ञामात्र २ से क्या लाभ ? यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !; मात्र से यह गौरव का अनुभव करना कि हमने नई कल्पना की, अत्यन्त उपहसनीय बात है । यहाँ लोचनकार ने ‘विच्छित्ति’ और ‘वैचित्र्य’ का प्रयोग किया है, ये शब्द एक ही अर्थ के द्योतक हैं, अलङ्कारों का भेद-निर्णय विशेष रूप से विच्छित्ति या वैचित्र्य के आधार पर ही साहित्य-शास्त्र में किया गया है । १. अर्थात् सभी लोग इस सिद्धान्त के पक्षपाती हैं कि शब्द और अर्थ ही काव्य के शरीर हैं लोचनकार का कहना है कि यह तात्पर्य वृत्तिग्रन्थ में प्रयुक्त ‘तावत्’ शब्द से प्रकट होता है । यह भिन्न बात है कि आगे चलकर किसी आचार्य ने विशिष्ट शब्द को ही काव्य माना है और किसी ने विशिष्ट अर्थ को । कुछ आचार्यों ने शब्द-अर्थ उभय को काव्य माना है । इस प्रकार काव्य-स्वरूप के सम्बन्ध में विभिन्न मतवादों के बावजूद भी, प्रायः काव्य के शरीर के रूप में शब्द और अर्थ को सभी ने स्वीकार किया है । २. ध्वनि या व्यङ्ग्य तत्त्व का प्रतिपादन सर्वथा काव्य के आत्मा के रूप में अभीष्ट है अतः काव्य के शरीरभूत शब्द और अर्थ तो किसी प्रकार ‘ध्वनि’ नहीं कहला सकते, क्योंकि यह पक्ष स्वयं ध्वनिवादी आचार्य के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध होगा । ऐसी स्थिति में भी यदि ‘ध्वनि’ के २ ध्व०