ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· १८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् हि को गुणः ? अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः । तथापि द्विविधं चारुत्वम्— स्वरूपमात्रनिष्ठं संघटनाश्रितं च । तत्र शब्दानां स्वरूपमात्रकृतं चारुत्वं शब्दालङ्कारेभ्यः, संघटनाश्रितं तु शब्दगुणेभ्यः । एवमर्थानां चारुत्वं स्वरूप- मात्रनिष्ठमुपमादिभ्यः । संघटनापर्यवसितं त्वर्थगुणेभ्य इति न गुणालङ्कारव्य- तिरिक्तो ध्वनिः कश्चित् । संघटनाधर्मा इति । शब्दार्थयोरिति शेषः । यद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तं तच्चा- तथापि, चारुत्व' दो प्रकार का होता है—स्वरूपमात्रनिष्ठ और संघटनाश्रित । शब्दों का स्वरूपमात्रकृत चारुत्व शब्दालङ्कारों से और संघटनाश्रित (चारुत्व) शब्दगुणों से (होता है)। इस प्रकार अर्थों का स्वरूपमात्रनिष्ठ चारुत्व उपमादि (अर्थालङ्कारों) से और संघटना में पर्यवसित (चारुत्व) अर्थगुणों से (होता है), इस प्रकार गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त कोई ध्वनि नहीं है । संघटनाधर्म—। 'शब्द और अर्थ के' यह शेष है । जो गुण और अलङ्कार से सद्भाव के प्रति श्रद्धाजाड्य के कारण शब्द-अर्थ को ही 'ध्वनि' संज्ञा देते हों तो यह प्रयास भी व्यर्थ होगा, अर्थात् क्योंकि आत्मा को शरीर का रूप देकर कब तक आत्मा के सच्चे अस्तित्व का समर्थन किया जा सकता है ? १. जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का जिससे 'चारुत्व' हो वह (अर्थात् चारुत्व का हेतु) ध्वनि हो ही सकता है यह पक्ष अभ्युपगम करके अभाववादी का कहना है कि ऐसी स्थिति में चारुत्व-हेतु ध्वनि तत्त्व निर्दिष्ट शब्दालङ्कार-अर्थालङ्कार एवं शब्दगुण-अर्थगुण के अतिरिक्त कोई तत्त्व नहीं सिद्ध होता, क्योंकि शब्द और अर्थ के चारुत्व का विभाजन दो ही भागों में किया जा सकता है एक तो स्वरूप के दृष्टिकोण से, दूसरा सङ्घटना के आधार पर । इसे इस प्रकार समझ सकते हैं— चारुत्व | ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ स्वरूपमात्रनिष्ठ सङ्घटनाश्रित ┌───────────┴───────────┐ ┌───────────┴───────────┐ शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व ( शब्दालङ्कारों से ) ( अर्थालङ्कारों से ) ( शब्दगुणों से ) ( अर्थगुणों से ) [ उपर्युक्त लोचन में जहाँ 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' लिखा है वहाँ सामान्यतः अनुवाद यही होगा कि 'यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !' परन्तु ऐसा ही समझ लेने पर यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का चारुत्व ध्वनि हो सकता है । इस भ्रम से गड़बड़ी यह होती है कि जब इस चारुत्व को यहाँ ध्वनि स्वीकार कर लेते हैं तब आगे चलकर अलङ्कार और गुण, जो स्वयं चारुत्व न होकर चारुत्व के हेतु हैं, उनमें अन्तर्भाव विज्ञात चारुत्व रूप ध्वनि का करने लग जाते हैं । यह न तो मूल का अभीष्ट है न लोचनकार का । इस प्रकार इस भ्रम के निवारणार्थ, जैसा कि 'बालप्रिया' में भी लिखा है, 'लोचन' के उपर्युक्त वाक्य 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' में 'यतश्चारुत्वम्, अर्थात् यश्चारुत्वहेतुः,