भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

प्रथम उद्योतः १९ लोचनम् रुत्वकारि न भवति, नित्यानित्यदोषा असाधुदुःश्रवादय इव । चारुत्वहेतुश्च ध्वनिः, तन्न तद्व्यतिरिक्त इति व्यतिरेकी हेतुः । ननु वृत्तयो रीतयश्च यथा गुणालङ्कारव्यतिरिक्ताश्चारुत्वहेतवश्च, तथा ध्वनिरपि तद्व्यतिरिक्तश्च चारुत्व- हेतुश्च भविष्यतीत्यसिद्धो व्यतिरेक इत्यनेनाभिप्रायेणाह—तदनतिरिक्तवृत्तय इति । नैव वृत्तिरीतीनां तद्व्यतिरिक्तत्वं सिद्धम् । तथा ह्यनुप्रासानामेव दीप्तम- सृणमध्यमवर्णनीयोपयोगितया परुषत्वललितत्वमध्यमत्वस्वरूपविवेचनाय वर्गत्रयसम्पादनार्थं तिस्रोऽनुप्रासजातयो वृत्तय इत्युक्ताः, वर्तन्तेऽनुप्रासभेदा आस्विति । यदाह— व्यतिरिक्त है वह चारुत्वकारी नहीं है, जैसे असाधु और दुःश्रव आदि नित्य-अनित्य दोष । और, ध्वनि चारुत्व का हेतु है अतः वह उनसे व्यतिरिक्त नहीं, यह व्यतिरेकी हेतु¹ है। शङ्का करते हैं कि वृत्तियाँ और रीतियाँ जैसे गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त हैं और साथ ही चारुत्व के हेतु हैं, उसी प्रकार ध्वनि भी गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त और चारुत्व का हेतु होगा । इस प्रकार व्यतिरेक असिद्ध है, इस अभिप्राय से कहते हैं—उनसे अभिन्न रहने वाली—। वृत्तियों और रीतियों का उनसे व्यतिरिक्तत्व सिद्ध² नहीं है । जैसा कि अनुप्रासों के ही दीप्त, मसृण और मध्यम वर्णनीयों की उपयोगिता के अनुसार परुषत्व, ललितत्व और मध्यमत्व ! स्वरूप के विवेचन के लिए तीन वर्गों के सम्पादनार्थ तीन अनुप्रास³-जातियां 'वृत्तियां' कही गई हैं, अर्थात् 'वर्तमान हैं अनुप्रास के भेद इनमें' । क्योंकि कहते हैं— स ध्वनिः' इतना बढ़ाकर पहले ही संगतार्थ कर लेना चाहिए । इस प्रकार चारुत्व-हेतु रूप ध्वनि का चारुत्व-हेतु रूप गुण तथा अलङ्कारों में अन्तर्भाव बन जाता है, जो अभाववादी का पक्ष है ] । १. अभाववादी अपने उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए 'केवलव्यतिरेकी अनुमान' का यहाँ प्रयोग करता है । अनुमान के प्रसङ्ग में तीन प्रकार के लिङ्ग या हेतु न्यायशास्त्र में बताये गये हैं—अन्वय- व्यतिरेकी, केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी । जहाँ केवल व्यतिरेक से व्याप्तिग्रह होता है वह केवलव्यतिरेकी हेतु होता है । जैसे, 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्' यहाँ कहा जायगा—'यद् इतरेभ्यो न भिद्यते न तद् गन्धवत्, यथा जलम् ।' इस प्रकार यहाँ व्यतिरेकदृष्टान्त जल होता है । 'यद् गन्धवत् तदितरभिन्नम्' यहाँ अन्वयदृष्टान्त नहीं प्राप्त हो सकता । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा, जैसा कि मेरे पूज्यपाद गुरुजी ( पं० महादेव शास्त्रीजी ) ने अपनी 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में निर्देश किया है—'ध्वनिः गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान्, चारुत्वहेतुत्वात्, यो हि गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति, यथा असाधुत्वदुःश्रवत्वादिको दोषः ।' २. जैसा कि व्यतिरेक बताया गया कि ऐसा कोई चारुत्व का हेतु नहीं जो गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है इसके विरुद्ध यह शङ्का है कि उपनागरिका प्रभृति वृत्तियाँ और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ तो अवश्य हैं जो गुण एवं अलङ्कार से भिन्न हैं एवं चारुत्व-हेतु हैं । इस परिस्थिति में उपर्युक्त व्यतिरेक कहाँ सिद्ध होता है ? इस आशङ्का के निवारणार्थ कहते हैं वृत्तियाँ और रीतियाँ गुण एवं अलङ्कार से भिन्न नहीं हैं। वह कैसे ? इसे स्वयं लोचनकार आगे की पंक्तियों में स्पष्ट करते हैं । ३. जैसा कि मूल वृत्तिग्रन्थ में वृत्तियों एवं रीतियों को अलङ्कार एवं गुण से अनतिरिक्तवृत्ति