ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्प्रेक्षत्वात्। चिरन्तनैर्हि भरतमुनिप्रभृतिभिर्यमकोपमे एव शब्दार्थालङ्कारत्वेनेष्टे, तत्प्रपञ्चदिक्प्रदर्शनं त्वन्यैरलङ्कारकारैः कृतम्। तद्यथा-'कर्मण्यण्' इत्यत्र कुम्भ- काराद्युदाहरणं श्रुत्वा स्वयं नगरकारादिशब्दा उत्प्रेक्ष्यन्ते, तावता क आत्मनि बहुमानः। एवं प्रकृतेऽपीति तृतीयः प्रकारः। एवमेकस्त्रिधा विकल्पः, अन्यौ च द्वाविति पञ्च विकल्पा इति तात्पर्यार्थः। दूसरे वैचित्र्य की भी तो उत्प्रेक्षा हो सकती है? जैसा कि प्राचीन भरतमुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार के रूप में माना है, उनके प्रपंच की दिशा का प्रदर्शन तो दूसरे अलङ्कारकारों ने किया। वह जैसे— 'कर्मण्यण्' इस सूत्र में 'कुम्भकार' आदि उदाहरण को सुनकर स्वयं 'नगरकार' आदि शब्दों की उत्प्रेक्षा कर ली जाती है, केवल उतने से, कौन अपने में बहुत गौरव की बात है? इस प्रकार प्रस्तुत में भी, यह (अभाव-विकल्प का) तीसरा प्रकार' है। इस प्रकार एक विकल्प तीन प्रकार का और दूसरे दो विकल्प मिलकर पाँच विकल्प हैं, यह तात्पर्यार्थ है। अभिधावृत्ति से आक्षिप्त ('बालप्रिया' टिप्पणी के अनुसार अभिधा की पुच्छभूत वृत्ति अर्थात् लक्षणा से आक्षिप्त) होता है। इस प्रकार शब्द से अवगत अर्थ के बल से आकृष्ट होने के कारण 'भाक्त' (या गौण) है। तृतीय अलक्षणीयतावादी विकल्प—किसी प्रकार ('तुष्यतु दुर्जनः' इस न्याय से) उस व्यङ्ग्य अर्थ को लक्षणाशक्ति से आक्षिप्त न भी माना जाय, तथापि उसे शब्द से कहना सम्भव नहीं, वह उस प्रकार जैसे कुमारियों के लिए पति का सुख कहना सम्भव नहीं। १. अब यहाँ अभाव-विकल्प के वृत्तिग्रन्थ में निर्दिष्ट तीन प्रकारों का संक्षेप में लोचनकार ने उपर्युक्त ढंग से निर्देश किया है। अभाव विकल्प के प्रथम प्रकार में यह कहा जाता है कि काव्यशरीर शब्दार्थमय होता है और गुण तथा अलंकार शब्द-और अर्थ के शोभाकारी तत्त्व के रूप में निर्दिष्ट किए गए हैं। इनके अतिरिक्त कोई ऐसा शोभाकारी तत्त्व ही नहीं सम्भव है जिसकी हमने गणना नहीं की है। अभाव विकल्प के दूसरे प्रकार में यह कहते हैं कि जिसकी हमने गणना नहीं की है वह किसी प्रकार शोभाकारी ही नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में, गुण और अलंकार के अतिरिक्त किसी अन्य तत्त्व की चर्चा करने का यहाँ कोई अर्थ ही नहीं निकलेगा। अभाव विकल्प के तृतीय प्रकार के अनुसार यदि ऐसा कोई शोभाकारी तत्त्व मान भी लिया जाय, तब भी उसका गुण तथा अलङ्कार में ही अन्तर्भाव हो जायगा, यदि लेशमात्र भिन्न कुछ विशेषता के कारण उक्त गुण तथा अलङ्कार में उस शोभाकारी तत्त्व का अन्तर्भाव न हुआ तो हम यह स्वीकार करेंगे उपमा आदि के असङ्ख्य विच्छित्ति-प्रकारों में यह भी होगा। फिर ऐसी स्थिति में कोई प्रश्न नहीं उठता जिसके समाधानार्थ किसी भिन्न ही शोभाकारी तत्त्व की कल्पना की जाय। यही क्या, बहुत से अन्य वैचित्र्यों की भी कल्पना की जा सकती है। जैसा कि प्राचीन आलङ्कारिक आचार्यों ने किया भी है। सबसे प्राचीन भरत मुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्द और अर्थ के अलङ्कार रूप से स्वीकार किया था, और फिर बाद में अन्य आलङ्कारिकों ने इस विषय को और भी प्रपञ्चित करके निर्दिष्ट किया। किसी ने अभी तक किसी भिन्न नये तत्त्व की उद्भावना का डिण्डिमघोष नहीं किया है, जैसा कि यहाँ 'ध्वनि' को लेकर किया जा रहा है। यह तो कुछ वैसी ही बात हुई कि किसी 'सूत्र' के निर्दिष्ट उदाहरण के आधार पर कोई दूसरा उदाहरण बना लिया गया (जैसे 'कुम्भकार' को देखकर नगरकार आदि)। इस