भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 680 में से

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पृष्ठ 73

प्रथम उद्योतः १३ लोचनम् तद्व्याख्यानायैव सम्भाव्य दूषणं प्रकटयिष्यति । सम्भावनाऽपि नेयमसम्भ- वतो युक्ता, अपि तु सम्भवत एव, अन्यथा सम्भावनानामपर्यवसानं स्यात् दूषणानां च । अतः सम्भावनामभिधापयिष्यमाणां समर्थयितुं पूर्वं सम्भवन्ती- त्याह । सम्भाव्यन्त इति तूच्यमानं पुनरुक्तार्थमेव स्यात् । न च सम्भवस्यापि सम्भावना, अपि तु वर्तमानतैव स्फुटेति वर्तमानेनैव निर्देशः । ननु च सम्भ- वद् वस्तुमूलया सम्भावनया यत्सम्भावितं तद् दूषयितुमशक्यमित्याशङ्क्याह- विकल्पा इति । न तु वस्तु सम्भवति तादृक् यत इयं सम्भावना, अपि तु उस (लिट्) के व्याख्यान के लिये ही (ग्रन्थकार) सम्भावना करके दोष प्रकट करेंगे । यह सम्भावना भी, जो सम्भव नहीं हो रहा है उसकी, नहीं बनती, अपितु सम्भव होते हुये की ही सम्भावना बनती है, अन्यथा¹ सम्भावनाओं का और दोषों का कभी अन्त ही न हो । अतः (ग्रन्थकार) आगे अभिहित कराई जाने वाली सम्भावना के समर्थन के लिये पहले 'सम्भव हो सकते हैं' यह कहते हैं। यदि 'सम्भा- वित होते हैं' ऐसा कहते तो पुनरुक्तार्थ ही² होता, सम्भव पदार्थ की सम्भावना नहीं होती, अपितु उसका वर्तमान होना ही स्पष्ट है, अतः वर्तमान से ही निर्देश किया है । सम्भव होते हुये वस्तुमूल वाली सम्भावना से जो सम्भावित है उसे दूषित करना शक्य नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—विकल्प—उस³ प्रकार की वस्तु सम्भव नहीं है होने के कारण ध्वनि के अभाव-विकल्प का परोक्ष होना उपपन्न हो जाता है । बुद्ध्यारोपित करके सम्भावना को अविषय नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि बुद्ध्यारोपित वही विषय हो सकता है जो भूत में हो, न कि भविष्य में । स्वयं वृत्तिकार ने 'जगदुः' के स्थान पर आगे ही अभाववाद का उपन्यास करते हुए 'आचक्षीरन्' यह सम्भावनार्थक 'लिङ्' का प्रयोग किया है, साथ ही 'सम्भवन्ति' का भी प्रयोग करते हैं। १. यदि यहाँ यही पक्ष स्वीकार्य हो जाय कि सम्भावना असम्भव की होती है तो सम्भावनाओं का कोई पर्यवसान या कोई हद नहीं मिलेगी । और दोषों की भी स्थिति वही होगी । इसलिए सम्भावना उसीकी होती है जो सम्भव होता है, यही सिद्धान्त पक्ष है । इसी कारण वृत्तिकार स्वयं 'सम्भवन्ति' शब्द से सम्भावना का अभिधान कर देते हैं, ताकि ऐसी कोई समस्या उपस्थित न हो । २. वृत्तिकार 'हो सकते हैं' (सम्भवन्ति) कहकर आगे 'आचक्षीरन्' के पश्चात् वक्ष्यमाण सम्भावना का समर्थन करते हैं। तात्पर्य यह कि जो सम्भव है उसीकी सम्भावना हो सकती है, अर्थात् सम्भव सम्भावना का मूल या विषय होता है। ऐसी स्थिति में, यदि 'सम्भावित होते हैं' [सम्भाव्यन्ते] कह देते तो जो सम्भावना [आगे 'आचक्षीरन्' के रूप में] अभिहित होने वाली है वह यहीं उक्त हो जायगी और इस प्रकार पुनरुक्ति होगी । 'सम्भावित होते हैं' का स्पष्ट अर्थ है कि सम्भावना किये जाते हैं । दूसरे, इसके समर्थन में यह कहना भी गलत होगा कि 'सम्भव' की भी सम्भावना क्यों नहीं कर लेते हैं ? बल्कि उस सम्भव का वर्तमान होना ही स्पष्ट है, इसी कारण वृत्तिकार ने उसे वर्तमान रूप (लट् लकार-सम्भवन्ति) से निर्देश किया है । ३. ऊपर जब यह निर्णय हो गया कि सम्भावना सम्भव की ही होती है तब प्रस्तुत में यह आशङ्का होती है कि जो वस्तु सम्भव है उसमें दोष देना कहाँ तक उचित होगा, अर्थात् प्रस्तुत में,