भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 680 में से

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पृष्ठ 72

१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मौर्य्यमभाववादिनामिति भावः । न चास्माभिरभाववादिनां विकल्पाः श्रुताः, किं तु सम्भाव्य दूषयिष्यन्ते, अतः परोक्षत्वम् । न च भविष्यद्वस्तु दूषयितुं युक्तम्, अनुत्पन्नत्वादेव । तदपि बुद्धयारोपितं दूष्यत इति चेत् ; बुद्धयारो- पितत्वादेव भविष्यत्त्वहानिः । अतो भूतकालोन्मेषात् पारोक्ष्याद्विशिष्टाद्यतनत्व- प्रतिभानाभावाच्च लिटा प्रयोगः कृतः-जगदुरिति । अभाववादियों की मूर्खता की कोई सीमा नहीं । हमने अभाववादियों के विकल्प नहीं सुने हैं, किन्तु (उनकी) सम्भावना करके दोष देंगे, इससे (उन विकल्पों का) परोक्षत्व (सिद्ध) होता है । जो भविष्य में होने वाली वस्तु है, उसमें दोष तो दिया नहीं जा सकता, क्योंकि वह सर्वथा उत्पन्न ही नहीं है । अगर कहें कि बुद्धि में आरोपित करके दोष देंगे तो बुद्धि में आरोपित होने के ही कारण भविष्य में होने की बात नहीं बनती । अतः भूतकाल के उन्मेष से, परोक्षत्व के कारण और विशिष्ट (कालविशेष रूप.) अद्यतनत्व के प्रतिभान के न होने के कारण 'लिट् लकार' से प्रयोग किया है— जगदुरिति¹-। अनेक हों। इस पर लोचनकार का कहना है कि यद्यपि बुध 'काव्यतत्त्ववेत्ता' ही यहाँ विवक्षित है, किन्तु सही बात एक मुख से न निकलकर अनेक मुख से कही जाय तो उसकी प्रामाणिकता और भी पुष्ट हो जाती है, दूसरे, किञ्चित् प्रमाद होने की सम्भावना भी जाती रहती है । साथ ही, अन्य शब्द का प्रयोग न करके 'बुध' के प्रयोग का यह तात्पर्य है कि अत्यन्त जड प्रकृति के लोग अगर बहुत भी हों और एक ही बात को कहते हों तब भी उनकी बात आदरणीय नहीं होती, यहाँ ऐसी स्थिति नहीं । बल्कि 'ध्वनि' को 'काव्य का आत्मा' उन लोगों ने स्वीकार किया है जो काव्यतत्त्व के पूर्ण जानकार हैं, बुध हैं तथा एक परम्परा (अविच्छिन्न-प्रवाह) से इस सिद्धान्त को समाम्नात करते आ रहे हैं। इस सिद्धान्त के समर्थन में । बुद्धजनों का कथन इस प्रकार व्यापक था कि किसी ने इसके लेखन का अनावश्यक श्रम स्वीकार नहीं किया। वह बात, जो साक्षात् उपदेशसिद्ध है, लिखकर व्यक्त करने का क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? यह भी आकलनीय है कि अनेक बुध जन किसी अनादरणीय वस्तु का आदर के साथ उपदेश किसी भी अवस्था में नहीं कर सकते। प्रस्तुत ध्वनितत्त्व का उपदेश उन्होंने आदर के साथ किया है, सम्यगाम्नात किया है। यह भी उसके प्रामाणिक और आदरणीय होने का जबर्दस्त तर्क है । १. मूल कारिका-ग्रन्थ 'तस्याभावं जगदुरपरे' के 'जगदुः' इस लिट् लकार के प्रयोग पर विचार करते हैं। व्याकरण-शास्त्र के अनुसार 'लिट्' का प्रयोग भूतानद्यतनपरोक्ष के अर्थ में होता है, अर्थात् क्रिया के बहुत पहले परोक्ष भूतकाल में होने पर लिट् लकार प्रयुक्त होता है । प्रस्तुत में, ध्वनि के अभाववाद का सिद्धान्त भी बहुत पहले भूतकाल में परोक्ष रूप से सम्भावित किया गया है, अतः आचार्य ने 'जगदुः' यह लिट् लकार का प्रयोग किया है (मैंने हिन्दी की प्रकृति में 'लिट्' लकार के कथञ्चित् अनुरूप प्रयोग 'जगदुः' के अनुवाद के रूप में 'कहा' लिखा है) । परोक्षत्व की पुष्टि के लिए सम्भावना के समर्थन में लोचनकार ध्वनिवादी आचार्य की ओर से लिखते हैं कि हमने ध्वनि के अभाव पक्ष को नहीं सुना है, इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि सर्वथा यह विकल्प कभी मौजूद ही नहीं था, ऐसी स्थिति में सम्भावना का आश्रय लेकर उन्हें उद्धृत किया गया है तथा उनमें दोष बताये गये हैं। इस प्रकार सम्भावित