भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

प्रथम उद्योतः ११ लोचनम् भूयसा सहृदयजनोद्वेजनेन । बुधस्यैकस्य प्रामादिकमपि तथाभिधानं स्यात् , न तु भूयसां तद्युक्तम् । तेन बुधैरिति बहुवचनम् । तदेव व्याचष्टे-परम्परयेति । अविच्छिन्नेन प्रवाहेण तैरेतदुक्तं विनाऽपि विशिष्टपुस्तकेषु विनिवेशनादि- त्यभिप्रायः। न च बुधा भूयांसोऽनादरणीयं वस्त्वादरेणोपदिशेयुः; एतच्चादरेणो- पदिष्टम् । तदाह-सम्यगाम्नातपूर्वमिति । पूर्वग्रहणेनेदमप्रथमतया नात्र सम्भाव्यत इत्याह, व्याचष्टे च-सम्यगासमन्ताद् ज्ञातः प्रकटित इत्यनेन । तस्येति । यस्यान- धिगमाय प्रत्युत यतनीयं, का तत्राभावसम्भावना । अतः किं कुर्मः, अपारं है, अब सहृदय जनों को उद्विग्न करने वाली यह अप्रासङ्गिक चर्चा व्यर्थ है। एक 'बुध' का उस प्रकार कथन प्रामादिक भी हो सकता था, किन्तु बहुतों का वह (प्रामादिक कथन) नहीं बन सकता । इसलिये 'बुध' में बहुवचन है¹ । उसी की व्याख्या करते हैं-परम्परा से-। अभिप्राय यह कि कभी विच्छिन्न न होने वाले प्रवाह के क्रम से उन (बुधों) ने इसे कहा है, विशिष्ट पुस्तकों में इसका स्थापन भी नहीं किया है। बहुत से बुध जन किसी अनादरणीय वस्तु को आदरपूर्वक उपदेश नहीं करते, इसे तो आदरपूर्वक उपदेश किया है। उसे कहते हैं-पहले से समाम्नात किया है-। 'पहले से' ('पूर्व') इस उल्लेख से, यह पहले-पहल नहीं सम्भावित किया है, यह कहते हैं और व्याख्या करते हैं-सम्यक् आ समन्तात् ज्ञात, प्रकटित-। उसका ।-जिसे प्राप्त करने के लिये प्रत्युत यत्न करना चाहिये उसके अभाव की फिर सम्भावना क्या ? इसलिये क्या करें, गृहीत होने लगेगा, जो सर्वथा अनभीष्ट है। प्रस्तुत को यदि वाक्यार्थपरामर्शक स्वीकार कर लेते हैं तो एक प्रश्न और उठ सकता है जिसकी लोचनकार सम्भावना करके यह निराकरण भी देते हैं। प्रश्न होगा कि ध्वनि के सम्बन्ध में जो विप्रतिपत्तियाँ निर्दिष्ट की गई हैं, 'ध्वनि' रूप अर्थ को प्रस्तुत में स्वीकार करने पर उनकी सम्भावना नहीं रहेगी, क्योंकि जब कि 'ध्वनि' रूप अर्थ को प्रायः विप्रतिपत्तिकारों ने किसी न किसी रूप में स्वीकार किया ही है, इसके समाधान में कहना है कि ध्वनि रूप अर्थ [धर्मी] के निर्विवाद होने पर भी धर्ममात्र में विप्रतिपत्तियाँ उपपन्न होंगी। अर्थात् 'ध्वनि' रूप अर्थ को स्वीकार करते हुए भी विप्रतिपत्तिकारों ने उसे गलत रूप में समझ लिया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उनकी गलतियों के निराकरणार्थ ही ग्रन्थकार प्रयत्नशील हैं। संक्षेप यह कि ध्वनि के सम्बन्ध में किसी को विप्रतिपत्ति नहीं, प्रत्युत ध्वनि के स्वरूप के निर्णय में मतभेद अवश्य है। जिस प्रकार 'शब्द' के सम्बन्ध में किसी को सन्देह या विप्रतिपत्ति नहीं, किन्तु उसके नित्यत्व और अनित्यत्व धर्मों के सम्बन्ध में मतभेद अवश्य है। कोई नित्यत्ववादी है और कोई अनित्यत्ववादी । इसी प्रकार ध्वनि को गुण और अलङ्कार में अन्तर्भूतत्व, भाक्तत्व आदि धर्मों को लेकर विप्रतिपत्तियाँ अवश्य उपपन्न होंगी। १. मूल कारिकाग्रन्थ में प्रयुक्त 'बुधैः' के 'बहुवचन' पर विचार करते हैं। यहाँ यह बात कही जा सकती है कि जब बुध काव्यतत्त्ववेत्ता होकर कुछ भी कहता है तो उसके वचन में अप्रामाण्य की सम्भावना हो ही नहीं सकती, ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं कि काव्यतत्त्ववेत्ता