ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् शब्दस्याचष्टे, तदर्थस्य विवादास्पदीभूततया निश्चयाभावेनार्थवत्त्वायोगात् । एतद्विवृणोति—संज्ञित इति । वस्तुतस्तु न तत्संज्ञामात्रेणोक्तम्, अपि त्वस्त्येव ध्वनिशब्दवाच्यं प्रत्युत समस्तसारभूतम् । न ह्यन्यथा बुधास्तादृशमाम्नेयु- रित्यभिप्रायेण विवृणोति—तस्य सहृदयेत्यादिना । एवं तु युक्ततरम्—इतिशब्दो भिन्नक्रमो वाक्यार्थपरामर्शकः, ध्वनिलक्षणोऽर्थः काव्यस्यात्मेति यः समाम्नात इति । शब्दपदार्थकत्वे हि ध्वनिसंज्ञितोऽर्थ इति का सङ्गतिः ? एवं हि ध्वनि- शब्दः काव्यस्यात्मेत्युक्तं भवेद्, गवित्ययमाहेति यथा । न च विप्रतिपत्तिस्था- नमसदेव, प्रत्युत सत्येव धर्मिणि धर्ममात्रकृता विप्रतिपत्तिरित्यलमप्रस्तुतेन के अर्थ के विवादास्पद होने के कारण निश्चय न होने से अर्थवत्त्व नहीं बनता । इसे विवरण करते हैं—'संज्ञा' दी है—। वास्तव में, उसे संज्ञामात्र से नहीं कहा है, अपितु है ही ध्वनि शब्द का वाच्य, प्रत्युत वह सब का सारभूत (भी) है । अन्यथा बुध जन उस प्रकार के (ध्वनि-तत्त्व को) आम्नात नहीं करते, इस अभिप्राय से विवरण करते हैं—सहृदय जनों में—इत्यादि से । परन्तु इस तरह का व्याख्यान ज़्यादातर ठीक होगा—'यह' (इति) शब्द भिन्न क्रम से पठित होकर वाक्यार्थ का परामर्शक है, अर्थ होगा—ध्वनि रूप अर्थ 'काव्य का आत्मा' यह जो समाम्नात है । यदि ('ध्वनि' शब्द को 'ध्वनि' इस) संज्ञा मात्र के अर्थ में मानते हैं तो 'ध्वनि, इस संज्ञा वाला अर्थ है' यह क्या सङ्गति बैठेगी ? क्योंकि इस प्रकार, 'ध्वनि शब्द काव्य का आत्मा है' ऐसा कहा जायगा, जैसे 'गौ' ऐसा यह कहता है । यह नहीं कि विप्रतिपत्ति (आशङ्का) का स्थान बिल्कुल है ही नहीं, बल्कि धर्मी के होते हुये ही धर्मपात्र के सम्बन्ध में विप्रतिपत्ति उत्कृष्ट तत्त्व से भिन्न होता है ! इसलिए वह 'ध्वनि तत्त्व' वैलक्षण्यकारी है, अर्थात् काव्य में वैलक्षण्य उत्पन्न करनेवाला है । वैलक्षण्य यहाँ कमाल या वैशिष्ट्य के अर्थ में ग्राह्य है । १. 'काव्य के आत्मा को 'ध्वनि' यह संज्ञा दी है' इस वृत्तिग्रन्थ पर लोचनकार ने विचार किया है । मूल 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति=काव्य के आत्मा को ध्वनि यह' इस ग्रन्थ का 'यह' शब्द यहाँ 'ध्वनि' शब्द का स्वरूप में तात्पर्य बताता है, क्योंकि अभी तो यह निर्णय नहीं किया गया है कि ध्वनि आखिर किस अर्थ को कहते हैं, ऐसी स्थिति में तत्काल 'ध्वनि' इस संज्ञा शब्द को ही काव्य का आत्मा मान लेना चाहिए, फिर आगे चलकर ध्वन्यर्थ का स्पष्टीकरण होता रहेगा । वृत्तिकार ने मूलग्रन्थ को इसी उद्देश्य से लगाया है । लोचनकार इसी व्याख्यान के समर्थन में यह कहते हैं कि यद्यपि यहाँ संज्ञामात्र से ध्वनि तत्त्व का निर्देश किया गया है, तथापि यह किसी को गलतफहमी न होनी चाहिए कि ध्वनिशब्द का वाच्य कोई है ही नहीं, यदि ऐसा होता तो बुध जन इसे स्वीकार कैसे करते ? परन्तु इस प्रकार के व्याख्यान से स्वयं लोचनकार को सन्तोष नहीं है । यहाँ 'यह' ('इति') शब्द विचारणीय है, उसी के अर्थ का प्रश्न है । ऊपर उसे शब्दपरामर्शक मानकर 'ध्वनि' शब्द का स्वरूप में तात्पर्य बताया गया है, परन्तु लोचनकार कहते हैं कि इसे भिन्नक्रम और वाक्यार्थ- परामर्शक समझना चाहिए । इसके अनुसार 'यह' शब्द 'काव्य का आत्मा' के बाद चला जायगा और 'ध्वनि' का अर्थ होगा 'ध्वनि रूप अर्थ'; पूरा रूप होगा—'ध्वनि रूप अर्थ काव्य का आत्मा है, यह जो समाम्नात है । जैसा कि 'ध्वनि' शब्द को 'ध्वनि' पद का अर्थ स्वीकार कर लिया जाय तो किसी प्रकार ग्रन्थ की सङ्गति नहीं बैठेगी, तब तो 'ध्वनि' शब्द ही 'काव्यात्मा' के रूप में