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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 680 में से

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पृष्ठ 64

४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मधुरिपोर्नखाः वो युष्मान्व्याख्यातृश्रोतॄंस्त्रायन्ताम्, तेषामेव सम्बोधन- योग्यत्वात् ; सम्बोधनसारो हि युष्मदर्थः, त्राणं चाभीष्टलाभं प्रति साहायका- चरणं, तच्च तत्प्रतिद्वन्द्विविघ्नापसारणादिना भवतीति, इयदत्र त्राणं विवक्षितम्, नित्योद्योगिनश्च भगवतोऽसम्मोहाध्यवसाययोगित्वेनोत्साहप्रतीतेर्वीररसो ध्व- न्यते, नखानां प्रहरणत्वेन प्रहरणेन च रक्षणे कर्तव्ये नखानामव्यतिरिक्तत्वेन मधु के शत्रु (विष्णु) के नख आप सभी व्याख्याता और श्रोताओं की रक्षा करें, क्योंकि वे ही (व्याख्याता और श्रोता) सम्बोधन के योग्य हैं। 'सम्बोधन' युष्मत् शब्द के अर्थ का सार (प्राण) है (सम्बोध्या पदार्थ की उपस्थिति में ही 'युष्मत्' यां आप-तुम का प्रयोग होता है)। 1. और, त्राण (रक्षण) अभीष्ट के लाभ के प्रति सहायता प्रदान करना है और वह (सहायताप्रदान) उस (अभीष्ट लाभ) के प्रति- द्वन्द्वी विघ्नों के अपसारण आदि द्वारा होता है, इस रूप में यहाँ त्राण विवक्षित है।^१ नित्य उद्योगशील भगवान् के असम्मोह और अध्यवसाय से युक्त होने के कारण उत्साह की प्रतीति होने से वीररस ध्वनित होता है।^२ नखों के प्रहरण (प्रहार के साधन) का रचयिता कौन है, ऐसे प्रश्न उपस्थित होते हैं। यत्र-तत्र लोचनकार ने 'मूलकृत्', 'कारिकाकार' और 'वृत्तिकृत्' रूप में व्याख्यान किया है। लेकिन प्राचीन मान्यता यही रही है कि आनन्दवर्धन ही मूलकार और वृत्तिकार स्वयं हैं। लोचनकार के उल्लेख के अनुसार प्रस्तुत मङ्गलश्लोक को वृत्तिग्रन्थ के रूप में ही छापने की पद्धति चली आ रही है, मूल कारिका ग्रन्थ को मोटे अक्षरों में छापा जाता है। कारिकाकार और वृत्तिकार को अभिन्न मानने वालों का एक तर्क यह भी है कि यदि कारिकाग्रन्थ का कर्ता कोई दूसरा होता तो निश्चय ही वह अपनी ओर से मङ्गलाचरण प्रस्तुत करता। यद्यपि इसके विपरीत एक यह भी युक्ति दी जा सकती है कि 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' इस प्रयोग से कारिकाग्रन्थ का आरम्भ करके निश्चय ही वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गल किया गया है, क्योंकि 'काव्य' भी 'शब्दमूर्तिधर भगवान् विष्णु का अंश' माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह भी एक प्रकार का मङ्गलाचरण हो जाता है। अस्तु, मूल कारिकाकार और वृत्तिकार के भिन्न अथवा अभिन्न होने का विचार प्रामाणिक और तर्कपूर्ण ढंग से 'भूमिका' में आकलनीय है। १. अभीष्ट व्याख्याश्रवण ही प्रस्तुत प्रयास का फल है, और यह तभी सम्भव है जब व्याख्याता और श्रोतृवर्ग दोनों त्राण (रक्षा) प्राप्त करें। फलतः त्राण उनके अभीष्ट लाभ का सहायक सिद्ध होता है। वह भी इस अर्थ में कि उसके द्वारा समग्र प्रतिद्वन्द्वी विघ्नों का अपसारण आदि कार्य होते हैं। इस प्रकार यहाँ भगवान् मधुरिपु के नख त्राण या रक्षा करें, अर्थात् अभीष्ट व्याख्याश्रवण के प्रतिद्वन्द्वी रूप में उपस्थित होने वाले सभी प्रकार के विघ्नों का अपसारण करें, यह वृत्तिकार का अभिप्रेत अर्थ लोचनकार के मत में प्रकट होता है। २. प्रस्तुत काव्य आत्मभूत ध्वनितत्त्व का मूलतः प्रतिपादन करता है, अतः यह स्वाभाविक है कि ग्रन्थकार अपने मङ्गलाचरण में ही 'ध्वनि' के प्रधान रूपों का निर्देश करें। इस उद्देश्य से लोचनकार ने यहाँ रस, वस्तु और अलङ्कार के ध्वनित होने का प्रकार बताया है। सर्वप्रथम ध्वनियों में प्रधान रसध्वनि की चर्चा में कहते हैं कि यहाँ वीररस ध्वनित होता है क्योंकि उत्साह की प्रतीति होती है, और उत्साह ही वीररस का स्थायी भाव है। उत्साह इसलिए कि भगवान् मधुरिपु अपने नखों द्वारा त्राण-कार्य में नित्य उद्योगशील हैं, एवं उनमें किसी प्रकार का