ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५० ) पृष्ठ ध्वनि के तीन रूप : वस्तु, अलङ्कार और रस ५१ वाच्य से वस्तुव्यङ्ग्य का भेद ५१ विधिरूप वाच्य में प्रतिषेधरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण ५१ ‘भ्रम धार्मिक०’ इस गाथा का व्याख्यान ५३ अभिहितान्वयवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ५४ अन्विताभिधानवादी के अनुसार शङ्का तथा उसका खण्डन ६२ ‘भ्रम धार्मिक०’ पर भट्टनायक के विचार तथा उसका खण्डन ६७ प्रतिषेधरूप वाच्य में विधिरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७१ इस पर भट्टनायक के विचार का खण्डन ७२ विधिरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७३ प्रतिषेधरूप वाच्य में अनुभयरूप व्यङ्ग्य का उदाहरण और व्याख्यान ७४ विषय-भेद से भी व्यङ्ग्य का वाच्य से भेद-प्रतिपादन एवं उदाहरण ७६ रसादि का वाच्यसामर्थ्य से आक्षिप्तत्व-प्रतिपादन ८१ ५. इतिहास के व्याज से रस के काव्यात्मत्व का प्रसाधन ८६ ६. प्रतीयमान रस का सहृदयानुभवसिद्धत्व-प्रतिपादन ९२ ७. प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति काव्यार्थतत्त्वज्ञों को ही ९४ ८. व्यङ्ग्य का प्राधान्य-प्रतिपादन ९७ ९. वाच्य और वाचक के प्रथम उपादान का युक्तिपूर्वक उपपादन ९८ १०. व्यङ्ग्य अर्थ के वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकत्व का उपपादन ९९ ११ १२. पहले वाच्यार्थकी प्रतीति के होने पर भी व्यङ्ग्यार्थ के प्राधान्य की अक्षुण्णता १०१ १३. ध्वनि-काव्य का लक्षण १०२ भट्टनायक के मत का दूषण १०३ चारुत्व-प्रतीति को काव्यात्मा स्वीकार करना १०४ अलंकारादि प्रकारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का निषेध १०७ ‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ का स्पष्टीकरण १०८ ‘समासोक्ति’ में व्यङ्ग्यानुगत वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १०९ ‘आक्षेप’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन १११ चारुत्व का उत्कर्ष ही वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य का आधार ११४ ‘अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति’ में वाच्य के प्राधान्य का प्रतिपादन ११७ ‘पर्यायोक्त’ में ध्वनि के अन्तर्भाव का निराकरण ११८ ‘अपह्नुति’ और ‘दीपक’ में वाच्य के प्राधान्य का निर्देश १२१ सङ्करालङ्कार में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १२२ ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ में भी व्यङ्ग्य के प्राधान्य की अविवक्षा का निर्देश १३३ पूर्वोक्त विषयों का संक्षेप से प्रतिपादन १३५ प्रकारान्तर से अलङ्कार और ध्वनि के तादात्म्य का निराकरण १३६ ‘सूरिभिः कथित’ इस कारिका भाग का व्याख्यान १३७ वैयाकरणों के अनुसार ध्वनि १३८