ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) पृष्ठ ध्वनि, उपमादि अलङ्कार तथा रसवदाद्यलङ्कार का भेदोपसंहार २०९ चेतन वस्तुओं के वाक्यार्थीभाव की स्थिति रसाद्यलङ्कारत्व का खण्डन २११ ६. गुण और अलङ्कार के लक्षण २१६ ७. माधुर्य गुण का आधार २१७ ८. शृङ्गार, विप्रलम्भ शृङ्गार तथा करुण में उत्तरोत्तर माधुर्य की आर्द्रता २१८ ९. ओजस् के आधार ( तथा उदाहरण ) २२० १०. प्रसाद गुण का स्वरूप २२४ ११. श्रुतिदुष्टादि अनित्य दोषों के ध्वन्यात्मक शृङ्गार में हेयत्व का प्रतिपादन २२५ १२. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के अङ्गों के आनन्त्य का प्रतिपादन २२७ शृङ्गार के स्वगतभेद २२८ १३. सचेतस् जनों के लिए दिङ्मात्र कथन २२९ १४. शृङ्गार के प्रभेदों में अनुप्रास के व्यञ्जकत्वाभाव का उपपादन २३० १५. विशेषतः विप्रलम्भ शृङ्गार में यमक आदि का प्रतिषेध २३० १६. ध्वनि में रसाक्षिप्त रूप से बन्ध वाले अलङ्कार का उपपादन २३१ पूर्वोक्त विषयों का संग्रह २३४ १७. रूपकादि अलङ्कारों के शृङ्गारव्यञ्जकत्व का उपपादन २३५ १८-१९. रूपकादि अलङ्कारवर्ग के विनिवेशन में समीक्षा २३६ रस के अङ्गरूप से अलङ्कार की विवक्षा का उदाहरण २३७ रस के तात्पर्य में भी अलङ्कार के अङ्गी रूप से विवक्षित होने का उदाहरण २३८ अङ्ग रूप से विवक्षित होने पर भी अवसर में ग्रहण का उदाहरण २३९ गृहीत अलङ्कार के भी अवसर में त्याग का उदाहरण २४१ संसृष्टि के विषयापहार की स्थिति २४३ इसके निर्वाह के लिए अलङ्कार का पूरा निर्वाह नहीं २४६ निर्वाह के दृष्ट भी अलङ्कार का अङ्ग रूप से प्रत्यवेक्षण २४७ २०. विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के द्वितीय भेद का विभाग २५० २१. शब्दशक्त्युद्भव अनुरणनरूप ध्वनि का स्वरूप २५१ श्लेष का उदाहरण २५१ श्लेष और शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि का विषय-विभाग २५३ लोचन में चार विभिन्न मतों की चर्चा २६० शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अन्य अलङ्कारों के उदाहरण २६४ २२. अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि २६७ २३. कविद्वारा स्वोक्ति से आविष्कृत व्यङ्ग्य का तृतीय प्रकार २७१ २४. अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य का विभाग २७४ कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर का उदाहरण २७५ कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर के उदाहरण २७६ २५. अर्थशक्त्युद्भव में अलङ्कार-ध्वनि २७८ २६. गम्यमान रूपक आदि अलङ्कारवर्ग का विस्तार २७९