ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएव रसध्वनिरिति मन्तव्यम्, इतिहासवलात् प्रक्रान्तवृत्तित्रयन्यार्थबलाच्च । तेन रस एव वस्तुत आत्मा, वस्त्वलङ्कारध्वनी तु सर्वथा रसं प्रति पर्यवस्येते इति वाच्यादुत्कृष्टौ तावित्यभिप्रायेण ध्वनिः काव्यस्यात्मेति सामान्येनोक्तम् ।' (पृ० ८६) इस प्रकार आनन्दवर्धन ने ध्वनि-सिद्धान्त द्वारा रसतत्त्व की काव्य में सबसे उच्च पद पर प्रतिष्ठा की। इसका मात्र कारण यह थ. कि रस केवल व्यङ्ग्य ही होता है, वाच्य से उसका संस्पर्श बन ही नहीं सकता, इसो कारण वह अलौकिक भी है। काव्य के अन्य सभी तत्त्व रस की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में ही आकर आदरणीय होते हैं। रस-सम्प्रदाय में रस को यह प्रतिष्ठा नहीं मिली और अलङ्कारवादियों ने तो इसे एक प्रकार के अलङ्कार के रूप में मान लिया था। ध्वनिकार का तो स्पष्ट कथन है—'अयमेव हि महाकवेर्मुख्यो व्यापारो यद् रसादीनेव मुख्यतया काव्यार्थीकृत्य तद्व्यक्त्यनुगुणत्वेन शब्दानांमर्थानाञ्चोप- निबन्धनम् ।' (पृ० ४४२) ध्वनि और अलङ्कार—प्रतीयमान अर्थ से, जिसके आधार पर ध्वनि-सम्प्रदाय प्रवर्तित हुआ, अलङ्कारवादी भामह, उद्भट प्रभृति आचार्य अपरिचित न थे, साथ ही काव्य का प्राणभूत रस भी उन्हें अविदित न था, फिर भी उसे उन्होंने उचित स्थान न देकर अलङ्कार में ही अन्तर्भुक्त कर लिया। अलङ्कारवादियों ने एक ओर अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति, आक्षेप प्रभृति अलङ्कारों में प्रतीयमान अर्थ के अनेक प्रकारों को अन्तर्निविष्ट कर लिया। जब ध्वनिकार ने रस को काव्य के आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया तब अलङ्कारों की स्थिति कुछ अपने रूप में स्पष्ट हुई। ध्वनिकार के अनुसार अलङ्कारों की सार्थकता अलङ्कार्य की शोभा बढ़ाने में है, जब उनका निवेशन काव्य में रसादि के तात्पर्य से होगा तभी वे 'अलङ्कार' भी कहलाएंगे— रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ पृ० २०८ काव्य में उस अलङ्कार का कुछ भी स्थान नहीं, जो रस की व्यञ्जना में सहयोग नहीं करता । रसाभिनिविष्ट कवि के समक्ष अलङ्कार स्वतः आने लगते हैं। और जब अलङ्कार रसभावादि के तात्पर्य से शून्य होकर कवि द्वारा निबद्ध किया जाता है तब चित्रकाव्य का विषय होता है— रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ पृ० ५२८ ध्वनि और औचित्य—औचित्य-विचार, जो क्षेमेन्द्र में अपना पल्लवित रूप ग्रहण कर एक सम्प्रदाय बन गया, उसके विकास में ध्वनिकार आचार्य आनन्दवर्धन का विशेष योग था। आनन्दवर्धन ने औचित्य को काव्य के प्राणभूत रसध्वनि के साथ सम्बद्ध कर दिया। ध्वन्यालोक में अलङ्कारौचित्य, गुणौचित्य, सङ्घटनौचित्य, विषयौचित्य आदि का विस्तार से निरूपण मिलता है। औचित्यसिद्धान्त के प्रतिष्ठित होने का समग्र श्रेय आनन्दवर्धन के इस श्लोक को दिया जा सकता है— अनौचित्याद् ऋते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् । औचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥ इस प्रकार यदि काव्य की आत्मा रस है तो निश्चय ही रस का परम गूढ़ रहस्य औचित्य है। यहां ध्वन्यालोक की यह कारिका भी उल्लेखनीय है—