ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३ ) इनके यहाँ पूर्वसिद्ध अनुमान ही थी। व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के स्थान पर ये लिङ्गलिङ्गिभाव के समर्थक थे। इनका पक्ष बहुत कुछ बुद्धिसङ्गत होते हुए भी काव्य के उपयुक्त भावना के बल पर आधारित न होने के कारण इन्हीं तक सीमित रह गया। इन्होंने ध्वनि के उदाहरणों को अनुमान द्वारा सिद्ध किया है। जैसा कि कहा जा चुका है, आनन्दवर्धन ने ध्वनि-विरोधी पक्षों में तीन पक्षों का निर्देश एवं खण्डन प्रस्तुत किया है, वे हैं—अभाववाद, भाक्तवाद एवं अनिर्वचनीयतावाद। फिर साथ ही उन्होंने अलङ्कारवाद का भी निराकरण किया है। इसके अतिरिक्त 'जयरथ' ने 'अलङ्कार-सर्वस्व' पर लिखे अपने व्याख्यान में किसी अनिर्दिष्ट ग्रन्थकार की दो कारिकाओं का उल्लेख किया है, जिनमें ध्वनि के सम्बन्ध में १२ विप्रतिपत्तियां निर्दिष्ट हैं— तात्पर्यशक्तिरभिधा लक्ष्णानुमिती द्विधा। अर्थापत्तिः क्वचित्तन्त्रं समासोक्त्याद्यलङ्कृतिः॥ रसस्य कार्यता भोगो व्यापारान्तरवाधनम्। द्वादशेत्थं ध्वनेरस्य स्थिता विप्रतिपत्तयः॥ इन बारहों को समझने में बड़ी कठिनाई पेश आती है, फिर भी विद्वानों ने इसे संक्षिप्त रूप में इस प्रकार समझाने का प्रयत्न किया है— १. तात्पर्य—मीमांसकों की मान्यता, इसका खण्डन ध्वन्यालोक-लोचन में विस्तार से मिलता है। २. अभिधा—यह अति प्राचीन मीमांसकों की मान्यता के अनुसार है। ३. ४. लक्षणा के दो भेद—जहत्स्वार्था और अजहत्स्वार्था। ५-६. अनुमान के दो भेद—(ये दोनों ज्ञात नहीं)। ७. अर्थापत्ति—यह अनुमान पक्ष का ही परिष्कृत रूप है। ८. तन्त्र—यह श्लेषालङ्कार की मान्यता के सदृश प्रतीत होता है। ९. समासोक्ति आदि अलङ्कार—इसका खण्डन ध्वनिकार ने स्वयं प्रस्तुत किया है। १०. रसकार्यता—यह रस के प्राचीन व्याख्याकारों की मान्यता है। भट्ट लोल्लट आदि का पक्ष। ११. भोग—यह भी रसध्वनि का विरोधी पक्ष है। यह भट्टनायक का पक्ष है। १२. व्यापारान्तरवाधनम्—जैसा कि डॉ० राघवन् का विचार है, यह कुन्तक की वक्रोक्ति का निर्देश करता है, किन्तु प्रो० म० म० कुप्पुस्वामी शास्त्री समझते हैं कि वक्रोक्ति तो अलङ्कार- पक्ष में कह ही दी गई है। यह मान्यता अनिर्वचनीयतावाद की सूचिका है। ध्वनि और अन्य प्रस्थान ध्वनि और रस—ध्वन्यालोक में ध्वनि के तीन प्रकार निर्दिष्ट हैं—वस्तुध्वनि, अलङ्कारध्वनि और रसध्वनि। रस इस प्रकार एक ध्वनि है, किन्तु ध्वनिकार ने जिस ध्वनि को काव्य के आत्मा के रूप में स्वीकार किया है वह मुख्यतया रस ही है ('काव्यस्यात्मा स एवार्थः०', ध्व० १।५)। स्पष्ट ही, जैसा कि लोचनकार 'स एव' पर लिखते हैं—'स एवेति प्रतीयमानमात्रेऽपि प्रक्रान्ते तृतीय