ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) ननु यत्र काव्ये सहृदयहृदयाह्लादिनः प्रधानभूतस्य स्वशब्दाव्यापारस्पृष्टत्वेन प्रतीय- मानैकरूपस्यार्थस्य सद्भावस्तत्र तथाविधार्थाभिव्यक्तिहेतुः काव्यजीवितभूतः कैश्चित् सहृद- यैर्ध्वनिनीम व्यञ्जकत्वभेदात्मा काव्यधर्मोऽभिहितः । स कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् । ( काव्यालङ्कारसारलघुवृत्ति, पृ० ७९ ) ध्वनि का खण्डन इस प्रकार मुकुलभट्ट और प्रतीहारेन्दुराज द्वारा प्रसङ्गतः हुआ । किन्तु ऐसे भी आलंकारिक हुए जिन्होंने ध्वनि के खण्डन मात्र के उद्देश्य से अपने ग्रन्थ का निर्माण किया । वे थे—भट्टनायक, कुन्तक और महिमभट्ट । ये तीनों काश्मीरी आचार्य थे । भट्टनायक—ये अभिनवगुप्त से कुछ प्राचीन थे । इन्होंने 'हृदयदर्पण' नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जो अब तक प्राप्त नहीं हो सका है । उसका अंशतः उल्लेख 'लोचन' में यत्र-तत्र मिलता है । व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट लिखते हैं कि मेरी बुद्धि दर्पण ( हृदयदर्पण ) को बिना देखे ही सहसा यश की ओर प्रवृत्त हो गई है— सहसा यशोऽभिसर्तुं समुद्यताऽदृष्टदर्पणा मम धीः । स्वालङ्कारविकल्पप्रकल्पने वेत्ति कथमिवावद्यम् ॥ 'व्यक्तिविवेकव्याख्यान' में स्पष्ट ही लिखा है—'दर्पणो हृदयदर्पणाख्यो ध्वनिव्ध्वंसग्रन्थोऽपि'; इस प्रकार 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ ध्वनिव्ध्वंस के उद्देश्य से लिखा गया था, यह बात सिद्ध होती है । लोचन भी इस तथ्य की पूर्णतः पुष्टि करता है । जैसा कि लोचनकार भी भट्टनायक के 'भम धम्मिअ०' इस पद्य पर विचार का खण्डन करते हुए लिखते हैं—'कि च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्राह्यकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिव्ध्वंसोऽयम्' ( पृ० ६९ ) । भट्टनायक को व्यञ्जना शक्ति मान्य न थी, वे अभिधा के अतिरिक्त भावना और भोजकत्व ये दो नये व्यापारों की कल्पना करते थे । भट्टनायक रससिद्धान्त के युक्तिवादी व्याख्याता थे । कुन्तक—इन्होंने अपने ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' का निर्माण ध्वनि की स्थापना के विरोध में अवश्य लिखा था, किन्तु इनका उद्देश्य ध्वनि का खण्डन करना न था बल्कि इनका ग्रन्थ वक्रोक्ति का मण्डन ही करता है । आनन्दवर्धन के प्रति इनका भाव सद्भावपूर्ण था और ध्वनि-सिद्धान्त से इनका पूर्ण परिचय था । इन्हें ध्वनि वक्रोक्ति के प्रकारान्तर के रूप में ही मान्य है और रस की उपयोगिता काव्य में स्वीकार करते हुए भी इन्होंने उसे स्वतन्त्र काव्यतत्त्व न मानकर वक्रोक्ति का भेदमात्र माना है । कुन्तक लोचनकार के सम्भवतः समकालिक थे । महिमभट्ट—लोचनकार अभिनवगुप्त के कुछ ही पीछे इन्होंने 'व्यक्तिविवेक' का निर्माण किया । इनका मूल उद्देश्य ग्रन्थालम्भ के इस पद्य से ही विदित हो जाता है— अनुमानेऽन्तर्भावं सर्वस्यैव ध्वनेः प्रकाशयितुम् । व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम् ॥ अर्थात् महिमभट्ट परा वाणी को प्रणाम करके अनुमान में सभी ध्वनि का अन्तर्भाव करने के लिए 'व्यक्तिविवेक' ( व्यञ्जना का विवेचन ) नाम के ग्रन्थ का निर्माण कर रहा है । ध्वनि के लक्षणवाली कारिका ( 'यत्रार्थः शब्दो वा०' ध्व० १।१३ ) को धज्जी-धज्जी उड़ाने का इन्होंने खूब ही प्रयत्न किया है । ये सर्वथा अभिधावादी थे, और व्यङ्ग्य को अनुमेय मानते थे तथा व्यञ्जना