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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ४१ ) अर्थ यह नहीं कि विवाद व्यर्थ है, बल्कि इस प्रश्न पर और भी नवोद्भावित युक्तियों के प्रकाश में विचार करने की आवश्यकता है, हां, आग्रह छोड़ कर । सम्भव है इन सामग्रियों में से किसी एक पक्ष का प्रबल साधक प्रमाण प्राप्त हो जाय । संस्कृत के पण्डित-समाज में आचार्य आनन्द- वर्धन ही कारिकाकार और वृत्तिकार दोनों समझे जाते हैं । ध्वनि की मान्यता, विरोधी आचार्य और सम्प्रदाय जैसा कि स्वयं आनन्दवर्धन ने स्वीकारा है, ध्वनि-सिद्धान्त पूर्ववर्ती आचार्यों के ग्रन्थों में अपने स्वरूप में निर्दिष्ट हो चुका था, यद्यपि उसे इस नाम से अभिहित एवं मौलिक रूप से प्रतिपादित करने का श्रेय ध्वनिकार को है । एक प्रकार के गम्यमान या प्रतीयमान अर्थ की स्वीकृति पूर्ववर्तियों में मिलती है । भामह ने—'गुणसाम्यप्रतीति' ( २।३५ ) का निर्देश किया है, यह सर्वथा गम्यमान औपम्य के सदृश है । 'समासोक्ति' में भी 'यत्रोक्ते गम्यमानोऽर्थः०' बताया है । 'पर्यायोक्त' में तो स्पष्ट लिखते हैं—'यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते' । इस प्रकार इनके और भी अलङ्कारों में अन्य गम्यमान अर्थ की स्वीकृति मिलती है । दण्डी की रचना में भी ध्वनि के सिद्धान्त के संकेत मिलते हैं । 'उदात्त' अलङ्कार में दण्डी लिखते हैं— पूर्वत्राशयमाहात्म्यमत्राभ्युदयगौरवम् । सुव्यञ्जितमिति व्यक्तमुदात्तद्वयमप्यदः ॥ ( काव्या० २।३०३ ) इस प्रकार अन्यत्र भी ध्वनि के संकेत सुविधा से प्राप्त किए जा सकते हैं । उद्भट के 'पर्यायोक्त' में, रुद्रट के परिकर, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि में भी यही स्थिति है । जब आनन्दवर्धन ने प्रतीयमान अर्थ पर आधारित विचार को ध्वनि-सिद्धान्त रूप में स्थापित किया तब विशेष रूप से 'अलङ्कारान्तर्भूत' करने का प्रयत्न हुआ। इस विचार को प्रतीहारेन्दुराज ने उद्भट के 'काव्यालङ्कारसंग्रह' पर लिखे गए अपने व्याख्यान में निर्दिष्ट किया है— 'स ( प्रतीयमानः ) कस्मादिह नोपदिष्टः । उच्यते । एष्वेवालङ्कारेष्वन्तर्भावात् ।' ( पृ० ७९ ) वस्तुध्वनि को पर्यायोक्त अलङ्कार के अन्तर्गत बताते हुए 'रामोऽस्मि सर्वं सहे' को पदध्वनि मानकर पद में पर्यायोक्त का निर्देश किया है—'न खलु पदे पर्यायोक्तेन न भवितव्यमितीयं राज्ञा- माज्ञा, सूत्रकारवचनं वा ।' ( पृ० ८२ ) ध्वन्यालोक के निर्माण के पश्चात् ध्वनि-सिद्धान्त का प्रबल विरोध, उसमें निर्दिष्ट विरोधों के बावजूद भी हुआ । ध्वनि-सिद्धान्त के प्रथम विरोधी आचार्य थे प्रतीहारेन्दुराज । इनके गुरु मुकुलभट्ट ने भी अपनी 'अभिधावृत्तमातृका' में लिखा है—'लक्षणामागर्गावगाहित्वं तु ध्वनेः सहृदयैर्नूतनतयोप- वर्णितस्य विद्यत इति दिशमुन्मोलयितुमिदमत्रोक्तम्' ( पृ० २१ ) । इसके अनुसार मुकुलभट्ट ध्वनि को लक्षणा के अन्तर्गत स्वीकार करते थे, ध्वनि की नूतन उद्भावना उन्हें पसंद न आई । उद्भट के काव्यालङ्कारसंग्रह की टीका में मुकुल के शिष्य प्रतीहारेन्दुराज ने ध्वनि को अलङ्कार के अन्तर्गत माना और उसके तीनों भेदों—वस्तु, अलङ्कार और रस के ध्वन्यालोक में दिए उदाहरणों को अलङ्कारों के उदाहरण सिद्ध किया । प्रतीहारेन्दुराज अलङ्कारवादी आचार्य थे । इस प्रसंग को इस प्रकार वे प्रस्तुत करते हैं—